आधार की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है. बुधवार को शीर्ष अदालत ने कहा कि यह संवैधानिक रूप से वैध है. आधार की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने यह फैसला सुनाया. खबरों के मुताबिक अदालत ने कहा कि आधार हाशिये पर पड़े लोगों को ताकत और पहचान देता है. उसका यह भी कहना था कि इसके फायदे नुकसान की तुलना में ज्यादा हैं

‘आधार’ भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा जारी एक खास तरह का पहचान पत्र है. सरकार आपकी आंखों की पुतली (रेटीना) और फिंगर प्रिंट्स स्कैनिंग के आधार पर आपको 12 अंकों की एक विशिष्ट संख्या प्रदान करती है. यह संख्या आपकी खास पहचान बनती है.

आधार लाने के पीछे दो कारण थे. पहला, सरकार द्वारा लागू की गई योजनाओं का फायदा नागरिकों तक सीधे तौर पर बिना किसी बिचौलिए के पहुंचाया जाए. दूसरा, एक समग्र पहचान पत्र की आवश्यकता. वोटर आईडी कार्ड के अलावा बाकी सभी पहचान पत्रों में कुछ न कुछ कमियां होती हैं जिनके कारण उन्हें पूर्ण पहचान पत्र का दर्जा नहीं दिया जा सकता. इसके अलावा वोटर कार्ड 18 वर्ष की उम्र के बाद ही बनता है. ऐसे में आधार अस्तित्व में आया. इसकी शुरूआत केवल गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को सरकारी सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए की गई थी, लेकिन धीरे-धीरे सरकारों ने इसे व्यापक रुप देना शुरू कर दिया.

शुरुआत से ही आधार पर सवाल खड़े होते रहे. इनमें सबसे बड़ा सवाल निजता के अधिकार से जुड़ा था. इसकी संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाए गए. आधार के खिलाफ पिछले साल तक कुल मिलाकर करीब 27 याचिकाएं दाखिल की गई. इसके बाद इस साल जनवरी में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने इन पर सुनवाई शुरू की. 38 दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने मई में इसपर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. आज उसने यह सुना दिया है. आइए नजर डालते हैं आधार के अब तक के सफर पर:

2006 - संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन बिता कर रहे लोगों के लिए एक विशिष्ट पहचान पत्र बनाने को प्रशासनिक मंजूरी दी.

2009 - भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण का गठन किया गया. इसका काम था लोगों के विशिष्ट संख्या वाले पहचान पत्र बनाना और इन्हें उन तक पहुंचाना. इसकी बागडोर योजना आयोग के हाथ में सौंपी गई. इंफोसिस के संस्थापकों में से एक नंदन एम नीलेकणी इस प्राधिकरण के पहले अध्यक्ष बने.

2010-11 - सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण (एनआईएआई) विधेयक संसद में पेश किया. हालांकि इससे पहले ही आधार को प्रायोगिक तौर पर महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में जारी कर दिया गया था. इसके बाद विधेयक पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए इसे वित्तीय विभाग की संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया. समिति की अध्यक्षता यशवंत सिन्हा कर रहे थे. साल 2011 में समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद के सामने पेश की. समिति ने विधेयक को उसके मूल रुप में खारिज कर दिया और कुछ बदलाव के सुझाव दिए. उसने निजता के अधिकार को लेकर चिंता जताते हुए आधार संख्या जारी करने से पहले डेटा संरक्षण और गोपनीयता के कानून पर काम करने का सुझाव दिया. इसके अलावा आधार संख्या जारी करने के लिए निजी कंपनियों का सहारा लेने पर भी समिति ने असहमति जताई.

2012 - तत्कालीन वित्त मंत्री ने आधार के क्रियान्वयन के लिए 14,000 करोड़ रुपये आवंटित कर दिए. लेकिन इसी साल सेवानिवृत्त जज केएस पुत्तास्वामी ने आधार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर दी. उन्होंने दलील दी कि आधार का कोई वैधानिक आधार नहीं है. उनका यह भी कहना था कि यह संविधान द्वारा हर नागरिक को दिए गए निजता और बराबरी के अधिकार के विरुद्ध जाता है. अगले ही साल यानी 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश दिया. इसमें कहा गया था कि किसी भी नागरिक को इस वजह से दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि उसके पास आधार नहीं है.

2015 - अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस सी नागप्पन की पीठ ने आधार की अनिवार्यता को एलपीजी गैस सब्सिडी और सब्सिडी वाले राशन की योजना तक सीमित कर दिया. यह फैसला कोर्ट ने केएस पुत्तास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले की सुनवाई के बाद दिया. इसके बाद अक्टूबर में एक बार फिर से पांच जजों की पीठ ने अगस्त में दिए गए फैसले को स्पष्ट करते हुए इसे बरकरार रखा. साथ ही, अदालत ने आधार का दायरा बढ़ा दिया. यानी उसने एलपीजी गैस सब्सिडी के अलावा, पैन कार्ड, प्रधानमंत्री जनधन योजना, मनरेगा और कर्मचारी भविष्य निधि (पीएफ) के लिए भी इसे जरूरी कर दिया.

2016 - चौतरफा विरोध के बावजूद ‘आधार’ को धन विधेयक यानी मनी बिल की तरह लोकसभा में लाया गया और इसे पारित करके राज्यसभा भेज दिया गया. राज्यसभा से बिल कुछ सुझावों के साथ वापस आया. लोकसभा ने उन सुझावों को खारिज करते हुए विधेयक को उसके मूल रूप में ही पास कर दिया. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद आधार बिल ने कानून का रुप ले लिया. इसी साल इस कानून की अधिसूचना जारी कर दी गई. लेकिन अप्रैल के पहले हफ्ते में ही राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने आधार बिल को संसद में मनी बिल की तरह लाने के खिलाफ याचिका दायर कर दी. सुप्रीम ने इस याचिका को ‘आधार’ के खिलाफ दाखिल अन्य याचिकाओं के साथ मिला दिया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के पास आधार की वैधता और निजता के अधिकार पर प्रहार को लेकर कई याचिकाएं दाखिल की गई.

2017-18 - सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी में ला दिया. इसके बाद आधार को लेकर हो रही बहस ने नये सिरे से जोर पकड़ लिया. इसके बाद इसी साल जनवरी में सर्वोच्च न्यायालय में आधार से जुड़ी 27 याचिकाओं पर 38 दिन तक मैराथन बहस चली. यह भारत के कानूनी इतिहास की दूसरी सबसे लंबी लगातार चलने वाली बहस थी. मई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे आज सुना दिया गया.