क्या किसी की मृत्यु भी सामाजिक सन्दर्भों और राजनैतिक हालात में सकारात्मक बदलावों की वजह बन सकती है? यह प्रश्न चाहे कितना अटपटा लगे, लेकिन उत्तराखंड के लिए डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट के निधन के बाद इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि हां ऐसा हो सकता है. डॉ बिष्ट का निधन पिछले दिनों (21 सितंबर) अल्मोड़ा में हुआ तो उनकी शवयात्रा जनगीतों के साथ शुरू हुई और उनकी चिता जलने तक जनसमूह जनगीतों से उन्हें श्रद्धांजलि देता रहा. ‘हम लड़ते रहे हैं.. हम लड़ते रहेंगे’ का यह घोष अब एक नया रूप ले रहा है. एक नया नारा निकल पड़ा है - ‘शोक को शक्ति में बदल दो’ और इस नारे की गूंज उत्तराखंड के एक किनारे से दूसरे किनारे तक सुनाई देने लगी है.

शमशेर सिंह पिछले 50 वर्षों में सामाजिक जीवन में सक्रिय थे. 1972 में वे अल्मोड़ा छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे जहां तब जनसंघ का प्रभुत्व होता था. इसके बाद लगभग 20 वर्ष तक विश्वविद्यालय की राजनीति में उनकी प्रगतिशील विचारधारा का ही बोलबाला रहा. 1974 के बाद वे उत्तराखंड के सरोकारों, जनसमस्याओं, आम आदमी के इर्द गिर्द के पर्यावरण, हिमालय के सवालों और राष्ट्रीय फलक पर वैकल्पिक राजनीति के मुद्दों पर लगातार आन्दोलन और संघर्ष की राह पर चलते रहे, लड़ते रहे.

छात्रसंघ के दिनों में उन्हें हेमवती नंदन बहुगुणा के जरिए यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने सत्ता की गोद में बैठना स्वीकार नहीं किया. उत्तराखंड में विश्वविद्यालय आंदोलन, टिहरी बांध आंदोलन, वन आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन, उत्तराखंड राज्य आंदोलन, नदी बचाओ आंदोलन से लेकर छोटे बांधों के सवाल, जल, जंगल और जमीन के सवाल तथा आम आदमी से जुड़े छोटे बड़े सवालों से लेकर हिमालय के अस्तित्व के सवालों तक वे बरसों आंदोलन करते रहे, आंदोलनों का नेतृत्व करते रहे.

शमशेर सिंह आजीवन आम आदमी के पक्ष में खड़े रहे और अन्याय व शोषण से लड़ते रहे. इस संघर्ष के दौरान वे जेल भी गए, प्रताड़ित भी हुए, हर तरह का दमन झेला, लेकिन अपनी आवाज हमेशा बुलन्द करते रहे. उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया और न ही कोई लाभ या प्रलोभन उन्हें झुका पाया. पौड़ी में शराब माफिया द्वारा पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या के विरोध में उन्होंने जिस आक्रामकता के साथ सड़क पर आवाज बुलंद की उसने माफिया आतंक की चूलें हिला दी थी.

उनके बेहद करीबी रहे डा. शेखर पाठक कहते हैं, ‘शमशेर के न रहने से एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है. हमारे दौर के उत्तराखंड में शमशेर के बिना किसी आन्दोलन की कल्पना करना असम्भव था. लेकिन अब हम सबको फिर एकजुट होकर उनकी मशाल आगे बढ़ानी होगी.’

समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनन्द स्वरूप वर्मा के लिए शमशेर सिंह बिष्ट की याद इस पत्रिका के प्रकाशन की शुरुआत से लेकर इंडियन पीपुल्स फ्रंट की स्थापना में उनकी भूमिका तक और हाल में अरबन नक्सलाइट के सवाल पर सरकारी रवैय्ये के विरोध तक फैली हुई है. वे कहते हैं, ‘इतना जुझारू और समर्पित जीवन उनका रहा कि इससे लगातार एक प्रेरणा मिलती रही. वे एक पथप्रदर्शक भी थे और एक मित्र भी.’

शमशेर सिंह एक प्रगतिशील विचारधारा के साथ चीजों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में देखते थे इसलिए एक प्रखर आंदोलनकारी होने के साथ साथ वे गंभीर चिंतक भी थे. उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे एक सेतु की तरह चीजों को जोड़ने ओर आगे बढ़ाने में माहिर थे. सुंदर लाल बहुगुणा के साथ 1974 में उन्होने उत्तराखंड को जानने के लिए एक लम्बी पदयात्रा अस्कोट से आराकोट’ तक की थी जो अब भी हर 10 वर्ष के अन्तराल में उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों से की जा रही है. चिपको आंदोलन के दूसरे प्रमुख सूत्रधार चंडी प्रसाद भट्ट के साथ तो वे वर्षों अनेक आंदोलनों में जुड़े रहे.

सत्ता की राजनीति का भले ही शमशेर सिंह ने सदा तिरस्कार किया, लेकिन देश में वैकल्पिक राजनीति के लिए वे सदा क्रियाशील रहे. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के वे संस्थापक अध्यक्ष थे तो इंडियन पीपुल्स फ्रंट के संस्थापकों में भी वे शुमार थे. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए बनी उत्तराखंड लोक वाहिनी के संयोजक अध्यक्ष वे ही बनाए गए थे. स्वामी अग्निवेश जैसे लोग उनके साथी रहे थे तो शंकर गुहा नियोगी जैसे व्यवहारिक काॅमरेड भी उनके उतने ही करीब रहे थे. वे अपनी वैचारिक स्पष्टता से लोगों को जीतते थे और अनेक बार उनका ऐसा ही हस्तक्षेप परिस्थितियों की दिशा बदल देता था.

एक पत्रकार के रूप में उन्होंने ‘जंगल के दावेदार’ का प्रकाशन शुरू किया था जिसका नाम उन्हें महाश्वेता देवी ने स्वयं प्रस्तावित किया था. जनसत्ता और नैनीताल समाचार के लिए वे जनता के सवालों पर लगातार टिप्पणियां लिखते रहे. उनकी आखिरी टिप्पणी ‘अरबन नक्सलाइट’ के नाम पर सत्ता के दमन के विरोध में थी. कवि व पत्रकार मंगलेश डबराल कहते हैं ‘शमशेर उन संघर्षकारी प्रतिबद्ध योद्धाओं मे से थे जिन्होंने उत्तराखंड की जनता, वहां के पर्यावरण, उनकी आजादी और बाद में पृथक पर्वतीय राज्य के लिए लंबे संघर्ष में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई. उन्होंने उत्तराखंड में एक बहुत बड़े परिवर्तन की उम्मीद जगाई थी.’

हाल के वर्षों में खराब स्वास्थ्य के कारण शमशेर सिंह की सक्रियता कम हो गई थी. लेकिन उनके निधन के बाद उत्तराखंड के अलग अलग स्थानों में जितनी भी शोक सभाएं हुईं उन सबमें शामिल जनपक्षधर शक्तियों ने एक सुर में शमशेर की श्रद्धांजलि के रूप में एकजुटता की बात कही है. शमशेर के नाम पर अलग-अलग खांचों में बंटे आंदोलनकारी और संघर्षकारी लोग अगर एक होते हैं तो यह निश्चय ही उत्तराखंड की हालत बदल सकने के लिहाज से एक बहुत बड़ी सकारात्मक पहल होगी.