राजस्थान में रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल का शुक्रवार को बारहवां दिन था. अलग-अलग मांगों को लेकर किए जा रहे इस चक्काजाम का असर अब प्रदेश में व्यापक हो चला है. रोडवेज कर्मचारियों ने बीते बुधवार को अपने परिजनों को साथ लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गृह जिले झालावाड़ में भी विरोध प्रदर्शन किया था. ढोल-नगाड़ों के साथ निकली इस रैली में लगे ‘वसुंधरा कहना मान लो, बोरी-बिस्तर बांध लो’ जैसे नारे हर किसी का ध्यान खींच रहे थे. अनुमान के मुताबिक इस हड़ताल से अभी तक राजस्व को करोड़ों रुपए का नुकसान हो चुका है.

राजस्थान सरकार के प्रति यह नाराज़गी सिर्फ रोडवेज कर्मचारियों तक सीमित नहीं है. प्रदेश के हजारों मंत्रालियक कर्मचारी भी अपनी नौ-सूत्रीय मांगों को लेकर पिछले नौ दिन से राजधानी जयपुर के एक खुले मैदान में डटे हैं. इसके चलते प्रदेश के करीब 130 दफ़्तरों में काम-काज ठप है. बदलते मौसम और कई तरह के संक्रमण के चलते इस महापड़ाव में शामिल सैकड़ों आंदोलनकारियों के बीमार होने की ख़बर है. इन्हीं में से एक सुरेंद्र चौधरी की अस्पताल में मौत ने इस आंदोलन और भड़का दिया. कोटा जिले के 197 कर्मचारियों और अधिकारियों ने भी सामूहिक रूप से अपना इस्तीफा सौंपकर आंदोलन को हवा दे दी है. इन कर्मचारियों की मांगें न माने जाने पर ‘राजस्थान राज्य अन्य प्रशासनिक परिसंघ’ के अधिकारियों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का फैसला लिया है.

वेतन विसंगतियों की वजह से नाराज़ प्रदेश के हजारों सूचना सहायक भी सरकार का विरोध कर रहे हैं. प्रशासन द्वारा जयपुर में धरने की जगह उपलब्ध न करवाने की वजह से ये कर्मचारी चार हजार रुपए प्रतिदिन के खर्च़ पर निजी जमीन लेकर महापड़ाव कर रहे हैं. इससे पहले प्रदेश के नर्सिंग कर्मचारियों के सप्ताहभर से ज्यादा चले विरोध प्रदर्शन और करीब दस हजार बिजली कर्मचारियों द्वारा सरकार के विरोध में चलाई गई मुहिम ने भी खूब चर्चाएं बटोरी थीं. जानकारों का कहना है कि कर्मचारियों की इस नाराज़गी ने बीते दिनों वसुंधरा राजे द्वारा जयपुर में बुलाए लाभार्थी शिक्षकों के आयोजन और छह हजार कांस्टेबलों की पदोन्नति जैसी कवायदों पर पानी फेर दिया है. इसके अलावा एक के बाद एक हो रही चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने और अन्य व्यवस्थाएं संभालने जैसी अतिरिक्त व असहज करने वाली जिम्मेदारियां सौंपे जाने की वजह से भी प्रदेश के कर्मचारियों में वसुंधरा सरकार के प्रति खासा आक्रोश देखा जा सकता है.

राजस्थान उन प्रदेशों में शुमार है जहां चुनावों का रुख तय करने में सरकारी कर्मचारी अहम भूमिका निभाते हैं. इन कर्मचारियों को भी अपनी इस ताकत का बखूबी अहसास है. झालावाड़ से आई एक महिला कर्मचारी सत्याग्रह से बातचीत में कहती हैं कि सरकार की सभी योजनाओं और जनता के बीच कर्मचारी ही एक सेतु का काम करते हैं. वे बताती हैं, ‘खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में सरकारी लाभ पहुंचाने की वजह से वहां के लोगों के मन में हम कर्मचारियों के प्रति एक विशेष जुड़ाव और सहानुभूति होती है.’ वे आगे कहती हैं, ‘ग्रामीण हम से कई बार कह चुके हैं कि बहनजी अगर सरकार आपकी बात नहीं मानेगी तो हम उसे वोट नहीं देंगे.’

‘राजस्थान राज्य मंत्रलायिक कर्मचारी महासंघ’ के प्रदेशाध्यक्ष मनोज सक्सेना अपनी मांगें न माने जाने तक प्रदर्शन करने और राजस्थान के कर्मचारियों द्वारा सरकार बदल देने के इतिहास का हवाला देते हुए मौजूदा सरकार को चेतावनी देते हैं. उनका इशारा कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दोनों कार्यकालों (1998-2003 और 2008-2013) में हुई सरकारी हड़तालों की तरफ है. 1999-2000 में ग्रेड-पे को लेकर करीब दो महीने तक चली प्रदेश की सबसे बड़ी हड़ताल के बाद तत्कालीन सरकार ने संबंधित कर्मचारियों की तनख्वाह काट ली थी. जानकारों का कहना है कि तब प्रदेश में गहलोत सरकार की वापसी की सभी संभावनाओं पर उसका यह निर्णय भारी पड़ा था.

तब अपने कार्यकाल में गहलोत ने जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों के एक कार्यक्रम में कहा था, ‘हर गलती कीमत मांगती है.’ गहलोत के इस वाक्य का इस्तेमाल कर्मचारियों को सचेत रखने के लिए सरकारी कार्यालयों में स्टीकर के तौर पर भी किया गया था. प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार विजय भंडारी अपनी किताब ‘राजस्थान की राजनीति : सामंतवाद से जातिवाद की ओर’ में इस बारे में लिखते हैं, ‘…पता नहीं राजकर्मियों को इस संदेश का बोध हुआ या नहीं, लेकिन स्वयं गहलोत को अपनी किसी गलती की कीमत 2003 के विधानसभा चुनावों में चुकानी पड़ी.’

इस हड़ताल के बारे में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के हवाले से भंडारी लिखते हैं, ‘अशोक गहलोत के शासन काल में राज्य कर्मचारियों की मांगें स्वीकार न करने से सरकार से उनके संबंध बिगड़ गए और उन्होंने चुनावों में कांग्रेस से बदला ले लिया.’ इसी तरह अगस्त-2013 में भी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले ऐसी ही एक और हड़ताल हुई. हालांकि इस बार कर्मचारियों की मांगें मानने के साथ सरकार ने उनके वेतन में कोई कटौती नहीं की. लेकिन ये मांगे चुनावों तक पूरी नहीं की जा सकीं और कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता से बाहर का रास्ता देखना पड़ा. फिर वसुंधरा राजे की सरकार आने के बाद कांग्रेस के समय हुए इन समझौतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

भाजपा से बागी हो चुके वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी आरोप लगाते हैं क राजस्थान में इस समय सरकार नाम की कोई संस्था नहीं बची है जो इन कर्मचारियों की सुनवाई कर सके. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा राजस्थान में उनकी सरकार को ‘अंगद का पांव’ बताने वाले बयान पर तंज कसते हुए तिवाड़ी कहते हैं, ‘ऐसे कर्मचारी विरोधी अंगद के पांव को राजस्थान की जनता कभी बर्दाश्त नहीं करेगी.’ वहीं, नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी धरने पर बैठे एक सरकारी कर्मचारी मौत के बाद भी सरकार की चुप्पी को संवेदनहीनता की पराकाष्ठा बताते हैं. सत्याग्रह से हुई बातचीत में डूडी कहते हैं, ‘प्रदेश में निजीकरण, भ्रष्टाचार, मनमाने फैसलों और हितों की उपेक्षा जैसे मसलों से आहत लाखों कर्मचारी इस चुनाव में भाजपा को उखाड़ फेंकेंगे.’

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि कर्मचारियों और जनता की भावनाएं आपस में जुड़ी होती हैं और उनके रुख में प्रदेश के आम वोटर का रुख झलकता है. कर्मचारियों से हुए निजी संवाद के आधार पर उनका कहना है कि सरकारी मुलाज़िम इस सरकार की विदाई तय मान कर बैठे हैं. हालांकि अपने बयान में वे कर्मचारी संगठनों के नेताओं के चुनावी मौसम में ही सक्रिय होने के रुख पर भी सवालिया निशान लगाते हैं. प्रदेश की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रख रहे वरिष्ठ पत्रकार श्रवण सिंह राठौड़ का इस मामले में कहना है कि मांगें पूरी न होने के अलावा प्रदेश के कर्मचारी बीते दिनों हुए तबादलों में बड़े स्तर की धांधली की वजह से भी सरकार से खासे नाराज़ हैं. प्रदेश के कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए राठौड़ इस पूरे भ्रष्टाचार के पीछे उन्हें ही जिम्मेदार बताते हैं. उनके शब्दों में ‘प्रदेश सरकार अपने अधिकारियों की तरफ से आंखे मूंदे बैठी है और शीर्ष नेतृत्व वसुंधरा सरकार के लिए धृतराष्ट्र बन चुका है. इस बात का खामियाज़ा पार्टी को उठाना पड़ेगा.’

लेकिन प्रदेश भाजपा इन सभी कयासों का पुरजोर तरीके से खंडन करती दिखती है. पार्टी के नेताओं का दावा है कि प्रदेश के अधिकतर कर्मचारी उनके कार्यकाल से संतुष्ट हैं. साथ ही वे विरोधियों पर चुनावों से एन पहले कर्मचारियों को भड़काने का आरोप लगाते हैं. भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मुकेश पारिक भैरोसिंह सरकार का हवाला देते हुए सत्याग्रह से कहते हैं, ‘बीजेपी शुरुआत से ही राज्य के कर्मचारियों के हितों के प्रति प्रतिबद्ध है. वसुंधरा सरकार में कर्मचारियों के लिए सबसे ज्यादा पदोन्नति, पदनामों में परिवर्तन और वेतनमानों में बढ़ोतरी की गई है.’ पारिक आगे जोड़ते हैं, ‘जो मांगे पूरी की जा सकती थीं वे सभी मानी गईं और जो पूरी की जा सकती हैं वे विचाराधीन हैं. लेकिन जिन मांगों को पूरा करने में सरकार असमर्थ है, जनहित को ध्यान में रखते हुए कर्मचारी संगठनों को उनके लिए सरकार पर अनावश्यक दबाव नहीं बनाना चाहिए.’

दरअसल, कर्मचारियों की मांगें पूरी न कर पाने के लिए वसुंधरा सरकार बजट की कमी को प्रमुख दलील के तौर पर पेश करती रही है. सरकार का अनुमान है कि आंदोलनरत कर्मचारियों की पांच प्रमुख मांगें माने जाने पर राजकोष पर करीब 15 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा जिससे सूबे की अन्य आर्थिक योजनाओं के गड़बड़ाने का ख़तरा है. लेकिन इसकी काट के तौर पर कर्मचारी तर्क देते हैं कि यदि सरकार को राजकोष की सही मायने में फ़िक्र है तो उसे तुरंत प्रभाव से- सैकड़ों करोड़ का फिज़ूल ख़र्च कर आयोजित की जा रही चुनावी रैलियों के साथ रोज अख़बारों और चैनलों में दिए जा रहे विज्ञापनों और पूरे-पूरे शहरों को पाट देने वाले पोस्टर-बैनरों पर रोक लगानी चाहिए न कि उनके हक़ को मारना चाहिए. ऐसे ही एक कर्मचारी शेख़र अपनी भावनाओं को कविता का रूप देते हुए अपने आंदोलन के मंच से दोहराते हैं.

…संघर्षों की राह कटीली, सरल नहीं है समझो तुम,

आंदोलन को मुखर करो, अब रहो न तुम गुमसुम

‘छत्तीस सौ’ (पे-ग्रेड) गर नहीं मिली तो, राम-कसम हम बाबू हैं

‘रानी’ के ताबूत में कीलें, छत्तीस सौ ठुकी समझो तुम…