अफगानिस्तान की टीम ने जब से क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा है तब से वह इस खेल के प्रशंसकों को चौंकाती आ रही है. ऐसा ही कुछ बीते रविवार को हुआ जब इस एशियाई टीम ने वेस्टइंडीज की सितारों से सजी टीम को टी20 सीरीज में शिकस्त दी. अफगान बल्लेबाज रहमानुल्लाह गुरबेज (79) की दमदार अर्धशतकीय पारी की बदौलत अफगानिस्तान ने तीसरे और अंतिम टी-20 मुकाबले में वेस्टइंडीज को 29 रन से हराकर सीरीज 2-1 से अपने नाम कर ली. लखनऊ के अटल विहारी वाजपेयी स्टेडियम में खेले गए इस निर्णायक मुकाबले में अफगानिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए आठ विकेट के नुकसान पर 156 रन बनाए. जवाब में विंडीज की टीम सात विकेट खोकर 127 रन ही बना सकी.

कबीलों में बंटे और हिंसा से जूझ रहे अफगानिस्तान में क्रिकेट एक उम्मीद की तरह उभरा है. अफगानिस्तान से आने वाली अच्छी खबरों में एक बड़ा हिस्सा उन सुर्खियों का होता है, जब देश क्रिकेट में कोई उपलब्धि हासिल करता है. अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के बतौर टीम खड़े होने की प्रक्रिया देश के बाहर ही चली, लेकिन धीरे-धीरे उसने क्रिकेट की दुनिया में ऐसी हैसियत बना ली है कि उसने न केवल विश्व कप के लिए क्वालिफाई किया,बल्कि जानकार मान रहे हैं कि एशियाई क्रिकेट में उसने श्रीलंका की जगह ले ली है.

अफगानिस्तान में क्रिकेट की जड़ें अब गहरे जा चुकी हैं. 2018 में हुए एशिया कप में अफगानिस्तान पहले ही दौर में बाहर हो गया था, लेकिन उसने अपना दम दिखाया था. कभी विश्व विजेता टीम रही श्रीलंका की टीम को उसने 91 रनों से हराया था. इसके बाद बांग्लादेश पर एकतरफा मुकाबले में 136 रनों से उसने जीत दर्ज की थी. एशिया कप मेें ही एक रोमांचक मुकाबले में भारतीय टीम के खिलाफ अंतिम ओवर में मैच टाई कराके अफगानिस्तान ने बता दिया था कि यह चर्चा दूर की कौड़ी नहीं है. विश्व कप के वार्म अप मैच में पाकिस्तान पर जीत ने उन चर्चाओं को एक बार फिर पर लगा दिए हैं.

कुल मिलाकर अफगानिस्तान अब इस मुहावरे से आगे बढ़ चुका है कि टीम ने मैच भले न जीता हो, लेकिन दिल जीत लिया. क्रिकेट जगत में अफगानिस्तान एक सितारे की तरह उभर रहा है. आज दुनिया भर के क्रिकेट विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान की टीम के पास न केवल दुनिया का सबसे बेहतरीन स्पिन बॉलिंग अटैक है, बल्कि अफगान खिलाड़ियों ने अपने तरीके से इस विधा को एक अलग स्तर पर भी पहुंचाया है.

लेकिन क्या अफगानिस्तान क्रिकेट टीम की यह सफलता एक कबीलाई-इलाकाई संस्कृति में बंटे देश को एक राष्ट्र के तौर पर जोड़ने में भी कोई भूमिका निभा रही है? पिछले चार दशकों से युद्ध-गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहे और बहुत से जातीय समूहों में बंटे लोगों को एक झंडे और एक राष्ट्र के तौर पर इकट्ठा करना कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा अफगानिस्तान में क्रिकेट के विकास और मौजूदा नेशनल टीम के खिलाड़ियों के अतीत से भी लगाया जा सकता है. अफगानी सफलता की यह कहानी पाकिस्तान के शरणार्थी कैंपों से शुरु होकर पहले शारजाह और फिर भारत में लिखी गई है.

अफगानिस्तान ने जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट खेलना शुरू किया तो वहां न स्टेडियम थे और न सुरक्षा. कबीलाई संस्कृति में जीने वाले इस देश में शुरुआत में क्रिकेट को पश्तो या पश्तून लोगों का खेल माना गया. ताजिक, उजबेक और हजारा समुदाय के लोग इस खेल से दूर रहते थे. लेकिन 2015 में जब अफगानिस्तान ने विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया और विश्व कप में स्काटलैंड को हराकर अपना पहला मैच जीता तो पूरे अफगानिस्तान में जश्न मनाया गया. पिछले 40 सालों से किसी न किसी रूप में हिंसा झेल रहे मुल्क में यह जीत उम्मीद की तरह आई. उम्मीद यह कि राजनीतिक तौर पर लगभग हर बात में असहमत रहने वाले पश्तून, ताजिक, उजबेक और हजारा जैसे जातीय समूहों को खेल में सफलता एक राष्ट्र के तौर पर बांध सकती है. अफगान क्रिकेट की मौजूदा सफलता ने इस उम्मीद को बढ़ाया ही है.

हालांकि, अगर थोड़ा अतीत में जाया जाए तो अफगानिस्तान की खेल संस्कृति में क्रिकेट की कोई खास जगह नहीं थी. इसकी एक सबसे बड़ी वजह यह रही कि मौजूदा अफगानिस्तान पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का असर कम रहा. यानी अफगानिस्तान के पास क्रिकेट खेलने की वैसी कोई विरासत नहीं थी जो भारत और पाकिस्तान के पास थी. अफगानिस्तान में जो लोग इस खेल से थोड़ा बहुत वाकिफ थे वे पख्तून यानी पठान थे क्योंकि ब्रिटिश लोगों से इनका ही आमना-सामना हुआ था.

आज के अफगान क्रिकेट की असली कहानी शुरू होती है अस्सी के दशक से. इस दौर में अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के आने के बाद अफगानिस्तान के दक्षिणी और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों से लोग विस्थापित हुए और इनमें से बहुतों ने पाकिस्तान के पेशावर और इसके आसपास के इलाकों में शरण ली. पाकिस्तान में क्रिकेट की लोकप्रियता ने नई पीढ़ी के अफगानी बच्चों में क्रिकेट के प्रति दिलचस्पी बढाई. आम अफगानी भी इस खेल से वाकिफ हुए. 90 के दशक तक अफगानिस्तान शरणार्थियों की एक पीढ़ी इस खेल से सराबोर हो चुकी थी. 1992 में पाकिस्तान की विश्व विजय ने इस खेल की लोकप्रियता चरम पर पहुंचा दी. रिफ्यूजी कैंपों में कई अफगान बच्चों ने गंभीरता से क्रिकेट खेलना शुरु कर दिया. टेनिस बॉल से खेला जाने वाला यह क्रिकेट पेशवर तो नहीं था लेकिन शौकिया से कुछ ज्यादा था. इन सबने अफगानिस्तान के दक्षिण इलाकों में क्रिकेट के प्रति एक लगाव पैदा कर दिया.

लेकिन, इस खेल की बढ़ती लोकप्रियता के सामाजिक और राजनीतिक नतीजे शुरुआत में ऐसे नहीं थे, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता हो कि क्रिकेट अफगानियों को एक कर रहा है. अफगानिस्तान-सोवियत संघ लड़ाई के समय जो विस्थापित पाकिस्तान आए थे, उनमें से बड़ी संख्या पख्तूनों की थी. इसकी वजह यह थी कि दक्षिण अफगानिस्तान से लगने वाली पाकिस्तानी सीमा में भी उनकी एक बड़ी आबादी थी. दोनों इलाकों के पख्तूनों की परंपरा और इतिहास काफी कुछ मिलता जुलता था. पख्तून अफगानिस्तान में सामाजिक - राजनीतिक तौर पर ताकतवर रहे हैं. ऐसे में जब अफगानिस्तान में क्रिकेट बड़े पैमाने पर खेला जाने लगा तो ताजिक, उजबेक और हजारा जैसे समुदायों ने इसे पख्तूनों का खेल घोषित कर दिया.

कुछ हद तक यह बात सही भी है कि शुरुआत में क्रिकेट की लोकप्रियता पख्तूनों में ही थी. इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1996 में जब तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आया तो उसने खेलों पर तरह-तरह की पाबंदियां आयद कर दीं. पतंगबाजी तक पर रोक लगा दी गई. लेकिन क्रिकेट के प्रति उसका रवैया नरम ही रहा. इसकी राजनीतिक वजह यह थी कि तालिबान की ताकत का मुख्य आधार पख्तून बहुल इलाके थे और तब तक यह खेल इन इलाकों में खासा लोकप्रिय हो चुका था. तालिबान अफगानिस्तान में पख्तून राष्ट्रवाद को तवज्जो देने वाला कट्टरपंथी आंदोलन था और उसके राजनीतिक नेतृत्व को लगता था कि क्रिकेट से इसमें मदद देगा.

लेकिन इसके चलते ताजिक और हजारा जैसे जातीय समुदाय इस खेल से दूर हो बैठे. यह फर्क कुछ इस तरह का था कि पख्तून बहुल इलाकों में क्रिकेट खेला जाता था और ताजिक बहुल इलाकों में फुटबॉल का जोर था. 1995 मेंं अफगान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड गठित हुआ. इस काम में कुुछ ऐसे लोग भी मददगार रहे जो तालिबान समर्थक थे. अगर सामाजिक-राजनीतिक तौर पर देखें तो क्रिकेट ने तालिबानी के कट्टरपंथी रुख को थोड़ा नरम ही किया. काफी जगहों पर स्थानीय स्तर पर होने वाले मैचों में तालिबान के लोग भी मौजूद रहते थे.

लेकिन, क्रिकेट के एक समग्र-अफगान प्रभाव की शुरुआत तालिबान शासन के खात्मे के बाद हुई. अफगान टीम और क्रिकेट के ढांचे को खड़ा करने के लिए आए पैसे ने परिदृश्य काफी बदला. हालांकि अफगानिस्तान में आज भी ऐसा कोई स्टेडियम नहीं है, जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का मुकाबला खेला जा सके. लेकिन आईसीसी की मदद से इस देश में धीरे-धीरे घरेलू क्रिकेट का एक सशक्त ढांचा खड़ा हो रहा है. तमाम संस्थाएं भी अफगानिस्तान में क्रिकेट के फैलाव में मदद कर रही हैं. यहां क्रिकेट देखने और सुनने वालों की संख्या में खासी बढोत्तरी हुई है.

भारत के खिलाफ खेला गया अफगानिस्तान का पहला टेस्ट मैच देखता एक अफगानी परिवार. एएफपी

आज राशिद खान और नबी जैसे स्टार खिलाड़ी पूरी दुनिया में जाने जाते हैं. राशिद खान आईपीएल केे सबसे उपयोगी खिलाड़ियों में से एक हैं. वे राष्ट्रीय हीरो हैं. ये दोनों पख्तून समुदाय से आते हैं. जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ शुरुआत में पख्तून क्रिकेट खेलते थे और ताजिक समुदाय के लड़के फुटबॉल खेलते थे. अफगानिस्तान में पख्तून करीब 45 फीसद हैं और ताजिक करीब 32 फीसद. राजनीतिक सत्ता की लड़ाई इन्हीं समुदायों में मानी जाती है. लेकिन अब ताजिक बहुुल इलाकों में भी क्रिकेट का खेल लोकप्रिय हो रहा है. स्थानीय स्तर पर होने वाली टी-20 लीग्स इसमें खासी मदद कर रही हैं, जिन्हें देखने के लिए काफी भीड़ जुटती है.

ताज मलूक को अफगानिस्तान क्रिकेट का पिता माना जाता है. देश में क्रिकेट बोर्ड की स्थापना और शुरुआती राष्ट्रीय टीम बनाने में उनका खासा योगदान रहा है. ताज मलूक बीबीसी से एक बातचीत में कहते हैं, ‘शुरुआत में अफगानिस्तान में क्रिकेट सिर्फ पख्तूनों का खेल था, लेकिन धीरे-धीरे टीम की सफलता के चलते दूसरे समुदाय भी इस खेल में हिस्सा लेने लगे हैं. अब टीम के जीतने पर खुशी मनाने वाले सिर्फ पख्तून नहीं होते हैं, बल्कि ताजिक, उजबेक और हजारा भी होते हैं.’ हालांकि मौजूदा अफगानिस्तान टीम में अभी पख्तूनों का दबदबा है. लेकिन एक पेशेवर टीम बनाने की अपनी दिक्कत होती है. इस बात को इससे समझा जा सकता है कि एक समय भारतीय क्रिकेट टीम मुंबई के खिलाड़ियों की टीम हुआ करती थी. लेकिन बाद में क्रिकेट ने देश में ऐसी जड़ें जमाईं कि देश के कोने-कोने से खिलाड़ी आने लगे.

अफगानिस्तान में क्रिकेट जिस तरह से लोकप्रिय हो रहा है और एक राष्ट्रीय पहचान बना रहा है, उससे यह तय है कि कुछ दिन में दूसरे समुदायों से भी खिलाड़ी आएंगे. अगर टीम में चयन का रवैया पेशेवर रहा और ताजिक, हजारा और उजबेक खिलाड़ियों को भी जगह मिली तो अफगान क्रिकेट टीम में भी वैसी विविधता आ जाएगी जैसी उसके समाज में है. दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में सांस्कृतिक विविधता और उप राष्ट्रीयतायें आपस में टकराती हैं, लेकिन खेलों ने हमेशा इनके बीच सामंजस्य ही बैठाया है. अगर क्रिकेट की ही बात करें तो तमिल और सिंहली उप राष्ट्रीयताओं की टकराहट के बीच श्रीलंका में मुरलीधरन और एंजेलो मैथ्यूज जैसे तमिल खिलाड़ियों ने टीम को एक राष्ट्रीय चरित्र दिया.

अफगानिस्तान को टेस्ट टीम का दर्जा मिल चुका है. वनडे क्रिकेट में टीम शानदार प्रदर्शन कर रही है. 20 ओवर के छोटे फार्मेट देश में इतने लोकप्रिय हैं कि दुबई में अफगानिस्तान क्रिकेट लीग का आयोजन कर चुका है. बीते साल एशिया कप में अफगानिस्तान की टीम ने शानदार प्रदर्शन किया. अफगानिस्तान के सभी हिस्सों में इस प्रदर्शन पर खुशी मनाई गई. यह खबरें अफगानिस्तान के लिए इस मायने में अच्छी हैं कि क्रिकेट देश को एक करने में मददगार हो रहा है. क्रिकेट के अलावा यह संभावना फुटबॉल में भी है जो ताजिक समुदाय के बीच बेहद लोकप्रिय खेल है. खेलों में जीत की खुशी अफगानिस्तान में सड़कों पर फायरिंग करके मनाई जाती है. इसकी वजह शायद कई दशकों की लगातार हिंसा है. उम्मीद की जा सकती है कि क्रिकेट जैसा जेंटलमैन जैसा अफगानिस्तान को बंदूक संस्कृति से मुक्ति देगा और उसका एक राष्ट्रीय चरित्र बनाएगा. विश्व कप में अगर अफगानिस्तान अच्छ प्रदर्शन करता है तो इस उम्मीद में एक और अंकुर फूटेेगा.