साल 2018 में राजस्थान का विधानसभा चुनाव अमित शाह का सबसे बड़ा इम्तेहान लेने वाला है. मध्य प्रदेश चुनाव की जिम्मेदारी शिवराज सिंह चौहान संभाल रहे हैं, छत्तीसगढ़ चुनाव प्रचार की कमान भी मुख्यमंत्री रमन सिंह के हाथों में है. लेकिन राजस्थान का चुनाव प्रचार और प्रबंधन दोनों इस वक्त सीधे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की देख-रेख में चल रहा है. जयपुर में बैठने वाले भाजपा के एक प्रदेश अधिकारी बातचीत के दौरान बताते हैं कि अध्यक्षजी यह चुनाव उसी अंदाज़ में लड़ने जा रहे हैं जैसे उन्होंने उत्तर प्रदेश में लोकसभा और फिर विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीता था. उत्तर प्रदेश में भी भाजपा पीछे चल रही थी, संगठन में उत्साह की जबरदस्त कमी थी और सरेआम गुटबाजी हो रही थी और कोई ऐसा नेता नहीं था जो पूरे प्रदेश में लोकप्रिय हो. यहां भी मैडम (वसुंधरा राजे) के खिलाफ पार्टी के कई नेता हैं औऱ पांच साल का एंटी इनकंबेंसी फैक्टर है. लेकिन अमित शाह फिर ऐसा चक्रव्यूह रचने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें भाजपा आमने-सामने की लड़ाई में कांग्रेस को पछाड़ दे. जयपुर से दिल्ली तक जो बातें सुनी-सुनाई जा रही हैं उनमें से सबसे महत्वपूर्ण तीन ये हैं:

भाजपा को सचिन पायलट पसंद हैं

अमित शाह पूरे राजस्थान का दौरा पूरा कर चुके हैं. जब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपनी गौरव यात्रा पर निकलीं हुंई थी उस वक्त अमित शाह भी जयपुर से लेकर जोधपुर, उदयपुर से कोटा तक यात्रा पर निकले. बूथ के कार्यकर्ता हों या सोशल मीडिया टीम पर मैसेज वायरल करने वाले सिपाही या फिर पार्टी के बुद्धजीवी समर्थक, हर वर्ग से शाह ने सीधी मुलाकात की. इतनी लंबी-चौड़ी बातचीत के बाद पार्टी ने तय किया कि राजस्थान में वसुंधरा का मुकाबला सचिन पायलट से दिखाया जाए. राजस्थान में कांग्रेस के दो बड़े नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं - पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट. आज से एक साल पहले तक सचिन पायलट को ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार माना जा रहा था. लेकिन गुजरात चुनाव के बाद अशोक गहलोत की हैसियत राहुल गांधी की टीम में जबरदस्त बढ़ी है.

24 अकबर रोड की खबर रखने वाले पत्रकार साफ-साफ बताते हैं कि इस वक्त गांधी परिवार के बाहर अगर किसी एक नेता की सबसे ज्यादा सुनी जाती है तो वह हैं अशोक गहलोत. लेकिन अशोक गहलोत का मन दिल्ली में कम और जयपुर में ज्यादा लगता है. गहलोत के करीबी एक नेता बताते हैं कि अगर उन्हें दिल्ली में कैबिनेट मंत्री बनने का ऑफर मिले और राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने का मौका तो वे राजस्थान जाना पसंद करेंगे. यह बात सचिन पायलट के समर्थकों को पसंद नहीं आएगी यह तो समझ में आता है, लेकिन भाजपा को भी गहलोत की जयपुर वापसी का आइडिया नहीं भा रहा है. इसलिए अमित शाह अपने हर भाषण में वसुंधरा की तुलना सचिन पायलट से ही करते हैं.

जयपुर में पैठ रखने वाले एक पुरानी कांग्रेसी कहते हैं, ‘अगर अशोक गहलोत को राजस्थान की कमान दे दी गई तो वे अकेले ही वसुंधरा और अमित शाह दोनों का गणित बिगाड़ देंगे. इस वक्त गहलोत ही ऐसे नेता हैं जिनकी राजस्थान के एक-एक गांव में व्यक्तिगत दोस्ती और जान पहचान है. भाजपा में ऐसे नेता भैरो सिंह शेखावत थे. जहां तक वसुंधरा राजे की बात है तो उनमें तल्खी और तेवर तो हैं लेकिन वो आत्मीयता और अपनापन नहीं जो गहलोत की शख्सियत की हिस्सा है.’

अमित शाह का ऐसा आदेश जिसे सुनकर भाजपा के सभी जिलाध्यक्ष हैरान हैं

भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए हर सीट पर दो तरह के कप्तान बनाने का फैसला किया है. इन दोनों कप्तानों के पीछे और भी टीमें होंगी. पहला कप्तान उस सीट का उम्मीदवार होगा जो चुनाव लड़ेगा और दूसरा उस सीट का संगठन प्रभारी. अमित शाह ने इससे जुड़ा आदेश यह जारी किया है कि जो जिलाध्यक्ष है वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगा. अगर चुनाव लड़ने का मन है तो उसे पहले जिलाध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी होगी. भाजपा अध्यक्ष के इस फैसले से परेशान एक जिलाध्यक्ष ने अपने करीबी एक बड़े भाजपा नेता से शिकायती भरे लहजे में कहा, ‘ये क्या बात हुई हुकुम, जब तक टिकट फाइनल नहीं हो जाता हम ये कुर्सी कैसे छोड़ दें. क्या पता ये भी चली जाए और टिकट भी ना मिले.’

पिछली बार भाजपा ने राजस्थान की 200 में से 163 सीटें जीती थीं. ऐसे में नये लोगों को टिकट मिलना बेहद मुश्किल है. अगर यह मान भी लिया जाए कि कुछ के टिकट कट जाएंगे तो उनकी और बाकी बची सीटों पर टिकट चाहने वालों की लाइन इतनी लंबी है कि एडजस्ट करना संभव नहीं है. इसके अलावा राजस्थान की 25 में से 24 सीटों पर भाजपा के ही सांसद हैं. इसलिए बच गये नेताओं के लोकसभा चुनाव में भी एडजस्टमेंट की गुंजाइश बहुत कम है. ऐसे में जिलाध्यक्षों को कहा गया है वे तय कर लें कि चुनाव लड़ाएंगे या घर बैठेंगे. और जिलाध्यक्षों को समझ नहीं आ रहा कि वे इतनी मारा-मारी के बीच चुनाव लड़ने का सपना देखें या जो है उसी में संतोष करें. लेकिन भाजपा जितनी जल्दी हो सके चुनाव की जिम्मेदारी बांट देना चाहती है इसलिए उनके पास सोचने के लिए ज्यादा समय नहीं है.

राजस्थान में भी कर्म पर नहीं धर्म पर चुनाव?

उत्तर प्रदेश का ही एक और प्रयोग राजस्थान में भी हो सकता है. शायद इसीलिए यहां पर अमित शाह बांग्लादेशी मुसलमानों को दीमक कहते सुनाई दिये थे. देश में राजस्थान भी एक ऐसा राज्य है जहां हिंदू आबादी करीब 88 फीसदी है और मुस्लिम आबादी सिर्फ नौ फीसदी. पिछली बार यहां पर कांग्रेस ने 15 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था लेकिन उनमें से एक भी नहीं जीत सका. इस बार सुनी-सुनाई है कि वह भी हिंदू कार्ड ही खेलने वाली है और आठ से ज्यादा मुस्लिम नेताओं को टिकट नहीं देगी. सिर्फ जैसलमेर ऐसा इलाका है जहां 25 फीसदा मुस्लिम आबादी है, यहीं से कांग्रेस मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगी. कुछ मुस्लिम नेताओं को अलवर, भरतपुर और नागौर में मौका मिलेगा. कांग्रेस जानती है मुस्लिम वोटर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे इसलिए उसने भी बहुसंख्यक हिंदू समुदाय को ही साधने का मन बना लिया है.

इसका जवाब देने के लिए अमित शाह ने अभी से अलग-अलग जातियों के नेताओं के साथ गठबंधन करना शुरू कर दिया है. राजस्थान भाजपा के नेताओं को उम्मीद है कि चुनाव की घोषणा के बाद भाजपा की टिकट पर लगभग सभी जातियों के बड़े नेता या उनके बेटा-बेटी चुनावी मैदान में दिखाई दे सकते हैं.

इन बातों से साफ है कि वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री भले हों लेकिन जहां तक अगले चुनाव की बात है यहां के असली कप्तान अमित शाह ही हैं. वसुंधरा के करीबी नेताओं के मन की बात कुछ ऐसे निकलती है, ‘अब तो ऐसा लगता है जैसे अमित भाई के खासम खास भूपेंद्र यादव यहां के सुपर सीएम हैं. मैडम सिर्फ सरकार चला रही हैं, पार्टी तो अध्यक्षजी और यादवजी देख रहे हैं.’