सन 1851 में अमेरिका में अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना हुई. यह पार्टी उदार लोकतांत्रिक विचारों, ख़ासकर काले लोगों की ग़ुलामी से मुक्ति के विचार के साथ बनी थी जिसका आधार अमेरिका के उत्तरी राज्यों में था. ग़ुलामों की आज़ादी के सवाल पर ही कुछ साल बाद गृहयुद्ध छिड़ गया जिसमें ग़ुलामी के समर्थक दक्षिणी राज्यों ने संयुक्त राज्य अमेरिका से आज़ादी की घोषणा कर दी. लंबे गृहयुद्ध के बाद दक्षिणी राज्यों की हार हुई. दक्षिण के राज्यों में गोरों के वर्चस्व के समर्थक लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई.

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में दोनों पार्टियों की विचारधारा में बदलाव आया. यह क्यों कैसे हुआ यह लंबी कहानी है. बहरहाल हुआ यह कि रिपब्लिकन पार्टी दक्षिणपंथ की ओर झुकाव वाली अनुदार पार्टी बन गई और डेमोक्रेटिक पार्टी मध्यमार्गी उदारवादी पार्टी बन गई. निष्कर्ष यह है कि राजनैतिक पार्टियों या अन्य संगठनों के विचार बदलना कोई अनहोनी बात नहीं है. इतिहास में इस तरह के अनेक उदाहरण मिल जाते हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित संगठन के एक कार्यक्रम में जो विचार व्यक्त किए हैं उन्हें संघ के संदर्भ में काफी क्रांतिकारी माना जा रहा है. संघ से आए भाजपा नेता राम माधव ने इसे ‘पेरेस्त्रोइका’ कहा है. भागवत ने काफी उदार और समावेशी किस्म की बातें की हैं. उन्होंने कांग्रेस का देश की आजादी में बड़ा योगदान बताया है और मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र को अधूरा कहा है. यहां तक कि उन्होंने गुरु गोलवलकर के कई विचारों से असहमति व्यक्त की है. उन विचारों के बारे में संघ आम तौर पर बात करने से बचता है , लेकिन सार्वजनिक तौर पर उससे असहमति व्यक्त करने वाले भागवत पहले सरसंघचालक हैं. इतना ही नहीं, इस कार्यक्रम में उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी रखी और पत्रकारों के सवालों के सीधे जवाब भी दिए. संघ की राजनीतिक इकाई भाजपा के सर्वेसर्वा माने जाने वाले नरेंद्र मोदी ऐसा नहीं करते.

अब सवाल है कि मोहन भागवत ने जो कुछ कहा है उसे कितना गंभीरता से लिया जाए. क्या आरएसएस सचमुच बदल रहा है या यह सिर्फ़ एक रणनीतिक चाल है? इस वक्त देश में जो उग्र हिंदुत्व का माहौल है उसमें मोहन भागवत के विचारों से क्या कुछ नर्मी आएगी. इन सवालों पर इन दिनों चर्चा गर्म है.

अगर इस बात पर इतनी चर्चा हो रही है तो यह भागवत और संघ की एक बड़ी कामयाबी है. संघ ने दिल्ली में इतना भव्य आयोजन किया ही इसलिए था कि इसकी व्यापक चर्चा हो. आम तौर पर संघ प्रचार से अपेक्षाकृत दूर रहने वाला और काफी हद तक गोपनीयता बरतने वाला संगठन है. उसके आयोजन भी सादे और बिना तामझाम के होते हैं.

संघ इस वक्त चर्चा में आना चाहता है , इसकी कई वजहें हो सकती हैं. पहली वजह शायद यह है कि संघ को अपने समर्थकों का दायरा बढ़ाना है. भाजपा के सत्ता में आने के बाद संघ का विस्तार तो हुआ है लेकिन उसकी सीमाएं हैं. इक्कीसवीं सदी का भारतीय युवा लोकप्रिय हिंदुत्व के प्रति तो आकर्षित है लेकिन गणवेश पहनकर शाखा में दक्ष-आरम: करने में उसकी दिलचस्पी नहीं हो सकती. वह वाट्सएप पर हिन्दुत्ववादी संदेश फ़ॉरवर्ड करने वाला और क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की हार पर देशभक्ति से ओतप्रोत होने वाला युवा है. उसे जोड़ने के लिए संघ का थोड़ा तामझाम वाले आयोजन करना ज़रूरी है.

दूसरी बात यह है कि कुछ पढ़े-लिखे और आधुनिक युवा पूरी तरह हिन्दुत्ववादी दिखना नहीं चाहते. वे अंदर भगवा रंग की टीशर्ट पहन कर ऊपर से दूसरे रंग की शर्ट और ज़रूरी हुआ तो टाई-सूट पहनने वाले नौजवान है. उन्हें यह अपेक्षाकृत उदार हिंदुत्व अपने हिंदुत्ववादी होने की वैधता प्रमाणित करने का बहाना देता है. ये वे लोग हैं जो हिंदुत्ववादी तो हैं, लेकिन गाय के नाम पर मॉब लिंचिंग उन्हें असहज बनाती है. अब वे कह सकते हैं कि देखिए संघ मॉबलिंचिंग के ख़िलाफ़ है, वे तो कुछ बहके हुए हाशिये के लोग हैं जो यह सब कर रहे हैं.

एक और मुद्दा यह है कि संघ परिवार के अनेक आनुषंगिक संगठन हैं लेकिन भाजपा के साथ उसका रिश्ता कुछ अलग है. बाक़ी संगठन संघ के नियंत्रण में रहते हैं और अगर कोई गड़बड़ करता भी है तो संघ उसे आसानी से हटा सकता है जैसा उसने प्रवीण तोगड़या के साथ किया. भाजपा चूंकि राजनैतिक पार्टी है इसलिए अक्सर सत्ता में भी रहती है. राजनैतिक सत्ता का मुक़ाबला और कोई सत्ता नहीं कर सकती. इस सत्ता की वजह से अक्सर भाजपा की ताक़त संघ के बराबर या उससे ज्यादा हो जाती है , तब संघ के लिए उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है. कई बार राज्यों में भाजपा के संगठन या मुख्यमंत्री से संघ का टकराव होता रहा है. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब ऐसा हुआ. वसुंधरा राजे सिंधिया से भी अक्सर संघ का टकराव हुआ है. जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उनके राज में यह टकराव लगातार बना रहा.

नरेंद्र मोदी के राज में संघ ताक़तवर ज़रूर हुआ है लेकिन उसके लिए एक चुनौती भी पैदा हो गई है. नरेंद्र मोदी निस्सन्देह देश के सबसे लोकप्रिय नेता और ताक़तवर प्रधानमंत्री हैं. उनकी लोकप्रियता का आधार भी हिंदुत्व और उग्र राष्ट्रवाद है जो कि संघ की विशेषता है. अगर एक ऐसा लोकप्रिय नेता है जिसकी यूएसपी वही है जो संघ की है और उसके पास राजनैतिक और प्रशासनिक सत्ता भी है तो इससे संघ के सामने अस्तित्व और पहचान का संकट पैदा हो जाता है.

ऐसे में संघ के नेताओं के सामने एक तरीक़ा यह बचता है कि वह मोदी और उनकी भाजपा के बरक्स एक अलग लाइन लें ताकि मोदी से उनका फ़र्क़ दिख सके. इतना बड़ा आयोजन करके अपेक्षाकृत उदार छवि को प्रदर्शित करना संघ की अलग पहचान ,स्वतंत्र अस्तित्व और बड़प्पन को रेखांकित करने की कोशिश है. अगर हम याद करें कि जब अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व के दौरान अपेक्षाकृत उदार अर्थव्यवस्था और राजनैतिक कार्यक्रम था तो संघ ने उग्र हिंदुत्व और स्वदेशी की लाइन पकड़ ली थी. उस वक्त बहुत मुखर स्वदेशी जागरण मंच और बजरंग दल जैसे संगठन अभी कहां हैं , यह पता नहीं चल रहा है.

ऐसा नहीं है संघ ने पहली बार यह उदार हिंदुत्व का पत्ता निकाला है. संघ के पास कई सारे पत्ते हर वक्त रहे हैं और संघ उनका इस्तेमाल वक्त-वक्त पर करता रहा है. इस बार चुनौती और संभावना दोनों ही बड़ी थीं इसलिए यह पत्ता बड़ी धूमधाम से निकाला गया है. हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अभी पिछले कुछ वक्त में संघ के अन्य नेताओं के अलावा मोहन भागवत ने भी ऐसे बयान दिए हैं जिनसे पता चलता है कि संघ की विचारधारा में कोई ख़ास बदलाव नहीं हुआ है.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि संघ कभी बदला नहीं या उसमें बदलाव की कोई संभावना नहीं है. पिछले सत्तर साल में संघ बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं और होते भी रहेंगे. लेकिन अभी किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद करना बहुत ज्यादा आशावादिता होगी.