सुप्रीम कोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा में आरोपित पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इनकी गिरफ्तारी में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है. शीर्ष अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजरबंदी चार हफ्ते के लिए बढ़ा दी है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन से भी इनकार कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से इन कार्यकर्ताओं की तुरंत रिहाई की मांग करने वाली याचिका को ठुकरा दिया.

जस्टिस एएम खानविलकर ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और अपनी ओर से बहुमत का निर्णय सुनाया जबकि जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ ने इससे असहमति व्यक्त करते हुये अलग फैसला सुनाया. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पांचों सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी राज्य द्वारा उनकी आवाज को दबाने का प्रयास है.

इसी साल जनवरी में भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के मामले में 28 अगस्त को पुलिस ने देश भर में छापामारी करते हुए पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं - गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, अरुण फरेरा और वेर्नोन गोन्जाल्विस - की गिरफ्तारी की थी. इन पर माओवादियों से सहानुभूति और संबंध रखने का आरोप है. पुलिस के मुताबिक भीमा-कोरेगांव में इन्होंने ही लोगों को हिंसा के लिए उकसाया था.