लेखक-निर्देशक: शरत कटारिया

कलाकार: वरुण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुबीर यादव, यामिनी दास

रेटिंग: 3/5

फिल्म रिलीज होने वाले शुक्रवार की सुबह विराट कोहली ने ‘सुई धागा: मेड इन इंडिया’ की तारीफ करते हुए एक ट्वीट किया. इसमें उन्होंने अपनी पत्नी और फिल्म की नायिका अनुष्का को जमकर सराहा है. इस संदेश के आखिर में उन्होंने ‘सो प्राउड माय लव’ लिखते हुए प्रशंसा में प्रेम को मिलाकर अपनी अभिव्यक्ति को खास बना दिया है. इस तरह यह ट्वीट मुफ्त में करवाए गए प्रमोशन से आगे बढ़कर एक सुंदर-सपोर्टिव रिश्ते की मिसाल बन जाता है.

फिल्म के बारे में सबसे पहले कहने वाली बात यही है कि ‘सुई धागा’ के लिए विराट कोहली को अनुष्का शर्मा पर गर्व होना भी चाहिए. क्योंकि फिल्म में किसी भी और चीज से ज्यादा अनुष्का शर्मा ही हैं जिन्हें आप बगैर पलकें झपकाए देखते हैं. ममता-ममता! की हर पुकार पर उठकर भागने वाली अनुष्का को देखकर किसी भी मंझोले शहर की वह बहू-भाभी याद आती है, जिसका पल्ला कभी सर से ढलका नहीं मिलता है. चाय-नाश्ते-खाने में चुपचाप अपने दिन और रात गर्क करने वाली बहू बनकर, वे भारतीय निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों की रीढ़ का पता देती हैं. ऐसा बनते-करते हुए अनुष्का शर्मा इस बात का रत्ती भर ख्याल नहीं करतीं कि वे इतनी बड़ी स्क्रीन पर इस दशा में रोते हुए कितनी साधारण दिख सकती हैं. लेकिन वे शायद दिखना ही ऐसा चाहती थीं. उनकी यह ईमानदारी इस किरदार को जरूरी सच्चाई देती है. बेचारगी और उम्मीद को आंखों में समेटने वाली अनुष्का शर्मा भी सुई की तरह एक पांव पर खड़े होकर ‘सुई धागा’ की बुनावट को थामती हैं.

सुई धागा के नायक वरुण धवन कुछ लोगों को फिल्म में अनुष्का के सामने थोड़े दबे हुए लग सकते हैं. उन्हें देखकर कुछ हद तक ऐसा भी लगता है कि जैसे उनके चेहरे की चमक उन्हें गरीब लगने से थोड़ा पहले ही रोक रही है. लेकिन इसके चलते उनके अभिनय पर सवाल खड़े करना उनके साथ नाइंसाफी होगी. वरुण धवन अलग-अलग तरह की भूमिकाओं से खुद को चैलेंज करते रहने की कोशिश में लगे रहते हैं, ‘सुई धागा’ उनकी ऐसी ही एक सफल कोशिश का नमूना है. उनका किरदार मौजी उन हथकरघा बुनकरों के खानदान से आता है, जो उसकी पिछली पीढ़ी तक पहुंचने से पहले ही रोजगार की दूसरी राह पकड़ चुका है. पैसों की कमी और काम को मिलने वाले असम्मान से जूझने वाले कारीगर-कलाकारों को मौजी एक चेहरा और एक सपना देता है. यह सपना उसे ममता से मिला है. सपनों की यह रंगीन कहानी मौजी और उस जैसे सैकड़ों को सही मायनों में अपने पैरों पर खड़ा करने, या कहिए कि अपने हाथों के बलबूते बड़ा बनने का किस्सा बताती है.

लेकिन ऐसे सपने हमेशा सच नहीं होते और किन वजहों से नहीं होते, फिल्म उनसे होकर भी गुजरती है. जैसे यह उन सारे छोटे-छोटे लालचों से आपको रूबरू करवाती है जिनमें पड़कर कोई बड़ा काम कर पाना अक्सर नामुमकिन हो जाता है. इसके अलावा मौजी के पिता बने रघुबीर यादव उन परिस्थितियों के प्रतीक हैं जो कोई सपना पूरा होने देने में अपना पूरा असहयोग देती हैं. बाज़ार, कॉम्पटीशन, पॉलिटिक्स से लेकर धोखा, जलन तक से गुजरने वाली सुई धागा सोचने से बनने तक का पूरा पैकेज है.

इसके बावजूद शरत कटारिया की ‘सुई धागा’ वह सिनेमाई जादू नहीं चला पाती जो तीन साल पहले आई उनकी ‘दम लगा के हईशा’ ने चलाया था. हालांकि कटारिया की इन दोनों फिल्मों में कुछ समानताएं नजर आती हैं. जैसे, दोनों ही निम्न-मध्यवर्ग के परिवारों की कहानियां हैं, दोनों ही इस तरह के परिवारों में पति-पत्नी के बीच प्रेम और अपनापा पनपने को दिखाती हैं, दोनों ही उम्मीदों को सपने सच करने का समाधान सुझाती हैं. आलोचना करते हुए इसे इस तरह कहा जा सकता है कि ‘दम लगा के हईशा’ बनाते समय बच गई बहुत सारी सामग्री को मिलाकर, उसमें नई छौंक मारकर कटारिया ने सुई धागा तैयार करने की कोशिश की है. फिर भी कमाल के संवाद, रियलिस्टिक सिनेमैटोग्राफी और बढ़िया संगीत के साथ इसे परदे पर देखना बुरा नहीं लगता है, लेकिन ज्यादातर चीजें देखी हुई सी होने का एहसास भी बना ही रहता है.

चलते-चलते: शरत कटारिया की ‘सुई धागा’ में जिस बात की अलग से तारीफ होनी चाहिए, वह है मौजी की मां, और मां और मौजी का रिश्ता. यामिनी दास द्वारा निभाया गया यह किरदार आपको एक अलग तीखी सी गुदगुदाहट का एहसास करवाता है. इसे महसूस करने के लिए भी ‘सुई-धागा’ देखी जा सकती है.