‘रियासतों की समस्या इतनी बड़ी है कि तुम ही इसका हल कर सकते हो’

कहते हैं कि महात्मा गांधी ने सरदार वल्लभभाई पटेल को ये लफ्ज़ कहे थे. बात सही थी. आज़ादी के कुछ महीने पहले और आने वाले कुछ सालों में सरदार ने वह कारनामा कर दिखाया जिसकी वजह से वे ‘इंडिया के बिस्मार्क’ कहलाए. उन्होंने 550 से ज्यादा रियासतों का एकीकरण कर दिया.

सरदार पटेल के साथ एक दक्षिण भारतीय शख्स वपल पंगुन्नी मेनन उर्फ़ वीपी मेनन का नाम भी लिया जाता है. उन्हें हम भोगौलिक इंडिया का वास्तुकार या आर्किटेक्ट कह सकते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि विभाजित होने के बाद भी एक हिस्से का नाम इंडिया कैसे रह गया? इस पर आगे बात करेंगे. पहले कुछ तथ्य समझने की कोशिश करते हैं.

550 से ज्यादा ये रियासतें मिलकर पूरा इंडिया नहीं बनाती थीं. 1947 में देश की कुल आबादी यानी लगभग 40 करोड़ में से क़रीब नौ करोड़ देशवासी इन रियासतों में रहते थे. ये ब्रिटेन की महारानी की अधीनता स्वीकार करती थीं. यहां से मिलने वाले कर के एवज़ में ब्रिटिश इंडिया से इनके रियासतदारों को एकमुश्त पैसा मिलता था. मिसाल के तौर पर हैदराबाद सबसे बड़ी और बाबरी सबसे छोटी रियासत थी. बाक़ी के इलाक़े और आबादी, सीधे तौर पर ब्रिटिश इंडिया सरकार के अधीन आते थे. सरदार पटेल और वीपी मेनन ने इन रियासतों को इकट्ठा करके ब्रिटिश इंडिया में मिलाया था जो बाद में इंडिया बना. इसलिए मेनन का ज़िक्र पटेल के साथ आता है.

वीपी मेनन ब्रिटिश इंडिया सरकार में बतौर क्लर्क भर्ती हुए थे और बाद में वे आईसीएस के पद तक पहुंचे. उनके जिस कार्यकाल को याद रखा जाता है वह तब का है जब वे आख़िरी तीन वायसरायों - लिनलिथगो, वावेल और माउंटबेटन के संवैधानिक सलाहकार थे. मेनन के दो बड़े योगदान हैं - पहला, ‘माउंटबेटन प्लान’ का बनाना और दूसरा, रियासतों का एकीकरण.

माउंटबेटन प्लान और मेनन

‘माउंटबेटन प्लान’ के तहत भारत के विभाजन को वीपी मेनन ने साकार किया था. जानकार बताते हैं कि संविधान, राज्य और संप्रभुता जैसे मुद्दों पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी और इसीलिए ब्रिटिश इंडिया के अंग्रेज़ अफ़सर उनको बहुत तवज्जो देते थे. मेनन को याद करते हुए ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में लार्ड माउंटबेटन बताया था कि बतौर वायसराय वे अपने क़रीबी स्टाफ़ से मिले जिनमें मेनन भी थे. तब किसी ने उन्हें, यहां तक कि उनके निजी सचिव जॉर्ज एबेल ने भी, यह नहीं बताया कि मेनन एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और उन्हें उनको अपने सलाहकारों में शामिल करना चाहिए. मेनन को जब मालूम हुआ कि वायसराय मिलना चाहते हैं तो उन्हें आश्चर्य हुआ. अगले दिन जब माउंटबेटन मेनन से मिले तो उन्हें यकीन हो गया कि मेनन ही वे अधिकारी हैं जिनमें भारत विभाजन को अंजाम देने की क़ाबिलियत है.

वायसराय को वीपी मेनन में बेहद समझदार, सच्चा और वास्तविक अफ़सर नज़र आया. माउंटबेटन ने माना था कि मेनन की सलाह ने उन्हें बहुत प्रभावित किया. शुरुआत में वे उन्हें मीटिंगों में न बुलाते, पर उनकी व्यक्तिगत राय ज़रूर लेते. फिर धीरे-धीरे वे उनके इतने ख़ास हो गए कि माउंटबेटन जहां भी जाते, मेनन उनके साथ ज़रूर होते थे. एक बार माउंटबेटन ने उनसे पूछा कि क्या उनसे पहले के वायसरायों ने कभी उनकी सलाह नहीं ली? मेनन ने कहा कि इसके पहले वे किसी वायसराय से मिले तक नहीं थे, सलाह देना तो बहुत दूर की बात है.

जहां तक माउंटबेटन प्लान की बात है, तो यह क़िस्सा इस प्रकार है कि दो, मई, 1947 को लार्ड माउंटबेटन ने अपने अफ़सरों के साथ ‘ट्रांसफर ऑफ़ पॉवर’ का जो मसौदा इंग्लैंड भेजा था उसमें ब्रिटिश संसद ने इतनी तब्दीलियां कर के वापस भारत भेजा कि देश के टुकड़े होने तय थे. लंदन से आये मसौदे पर वीपी मेनन ने अपनी राय रखी कि ट्रांसफर ऑफ़ पॉवर से पहले अगर ब्रिटिश सरकार रियासतों पर से अपना आधिपत्य छोड़ती है तो विभाजन के बाद देश में राजनैतिक और आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा. मेनन ने पहले रियासतों के विलय पर काम करने की सलाह दी.

वायसराय पशोपेश में पड़ गए, पर मेनन की बुद्धिमता पर भरोसा करते हुए उन्होंने अपने इस मातहत को नया ड्राफ्ट बनाने की हरी झंडी दे दी. मेनन ने गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935 को केंद्र में रखकर एक नया प्लान बनाया जो बाद में पारित होकर ‘माउंटबेटन प्लान’ से लागू हुआ. इसके तहत धार्मिक बहुलता के आधार पर विभाजन को मंज़ूरी दी गयी. दोनों देशों को डोमिनियन यानी अधिराज्य का दर्ज़ा दिया गया. रियासतों को किसी भी डोमिनियन के साथ जाने की छूट दी गयी. हालांकि, तब मेनन और पटेल साथ-साथ काम नहीं करते थे, पर फिर भी उन्होंने पटेल को डोमिनियन की बात पर राज़ी कर लिया. कांग्रेस और मुस्लिम लीग भी इस पर कमोबेश राज़ी हो गए. कई जानकारों का मत है कि यह काम मेनन ने अकेले ही किया था, पर ‘माउंटबेटन एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में लार्ड माउंटबेटन इस बात को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि मेनन हर क़दम पर उनकी सलाह ले रहे थे.

रियासतों का एकीकरण

वीपी मेनन की सलाह पर तय हो गया कि रियासतों के भविष्य के फ़ैसले के बाद ही अंग्रेज़ भारत छोड़ेंगे. जून 1947 में राज्य विभाग का गठन हुआ, कमान सरदार पटेल के हाथ में थी और सरदार को अपना सचिव चुनने में मेनन से बेहतर विकल्प नज़र नहीं आया. पर मेनन के मन में कुछ और ही था. नियति ने उनके भाग्य में कुछ और भी लिख छोड़ा था, जो अभी घटित होना बाकी था.

अपनी क़िताब ‘इंटीग्रेशन ऑफ़ दी इंडियन स्टेट्स’ में मेनन लिखते हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवन काल में देश को आज़ाद देख पाऊंगा. पर जब देश आज़ाद हुआ, मुझे लगा कि जीवन का उद्देश्य सफल हो गया. मैंने रिटायर होने का मन बना लिया था. तभी सरदार पटेल, जिनके पास गृह मंत्रालय था ने मुझसे कहा कि चूंकि देश इस समय मुश्किल हालात में है तो मुझ जैसे लोगों को सेवानिवृत्ति का विचार अभी त्यागना होगा. जब मैंने इस बात का ज़िक्र माउंटबेटन से किया तो उन्होंने कहा कि वे मुझे किसी राज्य का गवर्नर बनाने की बात सोच रहे हैं.’ पर पटेल ने उन्हें गवर्नर न बनाने की बजाय अपना सचिव बनने पर राज़ी कर लिया.

जुलाई, 1947 को पटेल ने सभी रियासतों को पत्र लिखकर तीन शर्तों के साथ भारत में विलय का न्यौता दिया. उन्होंने लिखा कि रियासतों की प्रतिरक्षा, विदेश और संचार का ज़िम्मा भारत सरकार का होगा और बाकी के विभाग जैसे राजस्व इत्यादि उनके ज़िम्मे ही रहेंगे. इस काम को अमली जामा पहनाने की ज़िम्मेदारी मेनन पर आ गयी. हालंकि, यह बात भी है कि इसमें माउंटबेटन ने लगभग आधे से ज़्यादा काम कर दिया था. रामचंद्र गुहा, ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि रियासतों का विलय माउंटबेटन का देश के लिए सबसे बड़ा योगदान था.

रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि आज़ादी से दो हफ्ते पहले माउंटबेटन ने ‘चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज’ के राजाओं और नवाबों को संबोधित किया. उन्होंने वहां मौजूद राजाओं से आधिकारिक तौर पर ‘इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट’ के पारित होने की बात कही. माउंटबेटन ने उनसे यह भी कहा कि उनकी ब्रिटेन की महारानी के प्रति वफ़ादारी ख़त्म होती है और अब वे अपने और अपनी रियाया के भविष्य के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. माउंटबेटन ने उन्हें चेतावनी भी दी कि रियासतदारों की हालात अब ‘बिना पतवार की नाव’ जैसी है और अगर उन्होंने भारत में विलय न किया तो इससे उपजी अराजकता के लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे. उनका कहना था, ‘आप अपने सबसे नज़दीकी पड़ोसी यानी आज़ाद भारत से भाग नहीं सकेंगे और न ही लंदन की महारानी आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेंगी.’

इस संबोधन का असर यह हुआ कि 15 अगस्त 1947 आते-आते लगभग सारे राजाओं और नवाबों ने विलय की संधि पर दस्तख़त कर दिए. फिर भी कुछ बड़े राज्य जैसे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद अभी भी आज़ाद रहने का ख़्वाब पाल रहे थे. मेनन ने इन रियासतदारों को साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर अपनी ओर मिलाया.

‘इंटीग्रेशन ऑफ़ दी इंडियन स्टेट्स’ में मेनन ने तफ़सील से एक-एक राज्य के विलय की कहानी बयान की है. इसमें ऐसे तमाम किस्से हैं कि किस तरह से जोधपुर के राजा ने उन पर पिस्तौल तान दी और कैसे जब वे कश्मीर के राजा के साथ विलय की शर्तों पर बात करके दिल्ली वापस आये, तो राजा ने उस रात अपने प्रधानमंत्री से कहा कि वे सोने जा रहे हैं और मेनन का कोई भी जवाब आने की सूरत में उन्हें नींद से उठाया न जाए. मेनन अगर ‘हां’ करते हैं तो मतलब है भारतीय सेना आकर पाकिस्तानी लड़ाकों को कश्मीर से भगा देगी और अगर मेनन ‘न’ करते हैं तो वे उन्हें (राजा) को गोली मार दें.

शुरुआत में हमने ज़िक्र किया था कि आख़िर कैसे विभाजित भारत का नाम ‘इंडिया’ रह गया था. तो इसके पीछे भी मेनन की दूरदर्शिता थी. दरअसल, मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि दोनों मुल्क नए नाम रखें. मेनन ने माउंटबेटन को सलाह दी कि पाकिस्तान इस देश से अलग हुआ है इसलिए इसका नाम ‘इंडिया’ ही रहने दिया जाये और उससे जुड़ी सारी संपत्ति और अधिकार इंडिया के पास ही रह जाएं. माउंटबेटन को यह सलाह पसंद आई. मेनन का मानना था कि इस हालत में पाकिस्तान ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं पायेगा और अंतत फिर इंडिया में आकर मिल जाएगा.

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है कि...