इसी पुस्तक की कहानी ‘कवरेज एरिया से बाहर’ का एक अंश :

‘कबीर को सहसा फेसबुक मित्रों की याद आई. उसने तुरंत कम्प्यूटर ऑन किया. फेसबुक लॉग-इन कर पोस्ट किया, ‘दोस्तों, मैं इस क्षण खुद को बेहद अकेला महसूस कर रहा हूं...मुझे आपका साथ चाहिए. आपमें से कोई भी मेरे घर तुरन्त आ जाए या फोन करे. मैं मर भी सकता हूं. मैं इंतजार कर रहा हूं, मेरा पता है...’

इसे पोस्ट किया. दस मिनट के अन्दर पचासों ने इसे लाइक किया. दस कमेंट भी आ गए...बधाई...नीत्शे ने भी कहा था, आदमी अन्ततः अकेला है, आप इस दुनिया के एक बहुत बड़े सच को अनुभव कर रहे हो बधाई हो...

वह हैरान था. कमेंट्स और लाइक की संख्या बढ़ती जा रही थी...मगर कोई घर नहीं पहुंचा. उसने फिर अगला पोस्ट किया, ‘मैं हैरान हूं, मेरे साढ़े चार हजार मित्रों में मेरे पास किसी का भी फोन नहीं आया, कोई भी घर नहीं आया और अब मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं. मैंने जहर की गोलियां खा ली हैं...जहर असर करने लगा है...मेरी आंखें बंद हो रही हैं...आंखें झपकने लगीं...प्लीज आ जाओ,...मैं जीना चाहता हूं...अब तक की रफ़ जिन्दगी को फेयर करना चाहता हूं. काश...प्लीज...कोई मुझे बचा ले...’ किसी तरह से इसे पोस्ट किया.

इस पोस्ट को भी लोगों ने लाइक करना शुरू किया. संख्या सैकड़ों में पहुंच गई. कमेंट भी आने लगे...तरह-तरह के कमेंट.

अगली सुबह कमरे में लाश पड़ी थी कबीर की. बेकफ़न.’


कहानी संग्रह : फोटो अंकल

लेखक : प्रेम भारद्वाज

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

कीमत : 125 रुपये


हर किसी को प्रेम की तीव्रता हमेशा आकर्षित करती है, फिर चाहे वह किसी व्यक्ति विशेष के प्रति हो या फिर पूरे समाज, देश और मानवता के प्रति. गहन प्रेम करना और पाना दोनों में ही अक्सर एक नशा सा होता है. जो इस नशे की गिरफ्त में गया, वह फिर गहरे डूबता है...और जो जितना गहरे डूबता जाता है, उतना ही उबरता जाता है. जीवन की तरह साहित्य में भी प्रेम की गहन अभिव्यक्ति हमेशा ही पाठकों को आकर्षित करती है. ‘फोटो अंकल’ की कहानियों में प्रेम के व्यक्तिगत और समष्टिगत, दोनों स्वरूपों की वेदना व्याप्त है और यही कारण है कि इस कहानी संग्रह की लगभग सभी कहानियां भी पाठकों को बांधती हैं.

कहते हैं कि अपनी तकलीफ से ज्यादा दर्दनाक, किसी अपने को पीड़ा में देखना होता है. एक मां के लिए अपने बच्चे को लंबी तकलीफ में देखना हमेशा ही असीम दुखदाई होता है. खासतौर से जब बच्चा किसी स्थाई दर्द या असाध्य बीमारी से जूझ रहा हो तो यह और भी त्रासदपूर्ण हो जाता है. प्रेम भारद्वाज की कहानी ‘मम्मा प्लीज किल मी’ एक ऐसी ही मां की मनोस्थिति को गहराई से दर्ज करती है. यहां बेटा एक असाध्य बीमारी से जूझ रहा है और इस कारण मां उसे त्रासदपूर्ण जीवन से मुक्त करना चाहती है. उसी मां की छटपटाहट को दर्ज करती कहानी की कुछ पंक्तियां –

‘मैं लाचार हूं. तू तो नहीं. प्लीज मम्मी किल मी-किल मी मम्मी. प्लीज’

‘नहीं-नहीं-नहीं’

सपना टूटता है. सामने राज अचेत लेटा है. जैसे पिछले सात सालों से. वह आगे बढ़कर उसकी करवट बदलती है. सपने की बातों को झटकने की कोशिश करती है.

लेकिन यह सपना उसे बार-बार आने लगा. रोते बेटे की एक ही गुजारिश ‘प्लीज मम्मी किल मी’,...दिल पर पत्थर रखकर उसने बेटे की इच्छामृत्यु की याचिका अदालत में दाखिल की. महीने-भर बाद इच्छामृत्यु को अपराध और समाजहित में अनुचित बताते हुए अदालत ने अपील ठुकरा दी.

मां परेशान. सोचने लगी. किसी जमाने में इच्छामृत्यु का वरदान मिलता था कठिन तपस्या के बाद. मगर आज वह अपराध है.

मरने का अधिकार नहीं. जीने के हालात नहीं. इन दोनों के बीच फंसी जिंदगी.’

प्रेम भारद्वाज ने कई कहानियों में कल्पना और यथार्थ का जादुई मिश्रण किया है. इस संग्रह की शीर्षक कहानी ‘फोटो अंकल’ एक ऐसी ही कहानी है. प्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय ने भोपाल गैस कांड के बाद आधे दफन हुए एक बच्चे के चेहरे की तस्वीर खींची थी, जिसमें उसकी आंखें पूरी और मुंह हल्का सा खुला हुआ था. यह तस्वीर पूरी दुनिया में भोपाल गैस कांड की प्रतिनिधि तस्वीर बन गई थी. इस तस्वीर के लिए उन्हें पुरस्कृत भी किया गया था और कई सम्मान भी मिले थे. उस फोटो वाले बच्चे और फोटोग्राफर रघु राय के आपसी संवाद के माध्यम से लेखक ने बहुत ही मार्मिक कहानी रच दी है. उस मर चुके बच्चे की आत्मा और फोटोग्राफर के आपसी संवाद का एक टुकड़ा –

‘मैं सच बोल रहा हूं.’

‘यह झूठ है.’

‘मैं झूठ क्यों बोलूंगा अंकल?...मेरी आवाज तुमने तब भी नहीं सुनी थी और आज भी झुठला रहे हो मुझे.’

‘कहना क्या चाहते हो?’

‘यही कि जब आप मेरी तस्वीर अपने कैमरे में उतार रहे थे तब मैं अन्तिम सांसें गिन रहा था, मदद का तलबगार था...प्राण अटके थे...डेढ़-दो साल के बच्चे में कितनी ताकत होती है, जरा सोचिए सांसों में घुल गए ज़हर ने आवाज़ निकालने लायक छोड़ा ही कहां था. काश आप उस वक्त पेशेवर फोटोग्राफर से मुनष्य बन गए होते तो शायद बच सकता था मैं.’

परिवार और समाज ने लड़कियों/स्त्रियों को हमेशा ही हर तरह से स्वतंत्र फैसले लेने से रोका है. इसलिए ‘अपने व्यक्तित्व की आजादी’ एक ऐसा पहलू है जिसके प्रति अक्सर वे खुद भी काफी लापरवाह रहती हैं. किंतु जब कोई लड़की/स्त्री आत्मचेतना से उस आजादी की भूख को महसूस करने लगती है, तो फिर वह उस आजादी को पाने के लिए छटपटाने भी लगती है. लेकिन इनके लिए आजादी की राह आसान नहीं होती. क्योंकि एक तरफ तो उनकी आजादी पर कड़े पहरे लगाए जाते हैं और दूसरी तरफ उनकी आजादी को भी पितृसत्तात्मक समाज अपने हित में साधने की कोशिश करने लगता है. ऐसी ही एक स्थिति के बारे में लेखक ‘पिंजड़े वाली मुनिया’ नामक कहानी में नायिका से कहता है –

‘उड़ने से भी ज्यादा मुश्किल और चुनौती भरा होता है उड़ान को महफूज रखना, स्त्री का उड़ना, चिड़ियों का उड़ना नहीं होता...अपनी मर्जी का नहीं होता. स्त्री का उड़ना विमान के उड़ने जैसा है. वह समझती है, वह अपनी मर्जी, अपनी काबिलियत की बदौलत उड़ रही है. मगर उसका नियंत्रण तो किसी कंट्रोल रूम में बैठा कोई और कर रहा होता है - कब उड़ना है, कहां-कहां से उड़ना, कहां उतरना है, यह सब कहीं और से तय होता है कि...बार-बार स्त्री को धरती पर उतारा जाएगा. स्त्री को बार-बार उड़ना होगा. कंट्रोल रूम वाले को यकीन नहीं कि स्त्री में स्वतंत्र रूप से उड़ने की क्षमता है, वह दुर्घटनाग्रस्त न हो... स्त्री पर भरोसा नहीं करना, उसे स्त्री बनाए रखने की सबसे बड़ी साजिश है.’

किसी भी साहित्य या कला को उच्च स्तर तक पहुंचाने में भाषा और कथ्य दोनों का आपसी तालमेल काम करता है. प्रेम भारद्वाज की भाषा की सरलता, सहजता और कथ्य का पैनापन उनकी कहानियों को खास बनाता है. नामवर सिंह के शब्दों में ‘प्रेम भारद्वाज की भाषा काबिले तारीफ है, इनकी अधिकतर कहानियां विषय में वैविध्य के साथ उपन्यास की सी संवेदना लिये रहती हैं.’ इस संग्रह की लगभग सभी कहानियों में प्यार के लिए जुनून, तड़प और छटपटाहट मौजूद है.

इन कहानियों का एक सशक्त पक्ष यह है कि यहां प्यार की निजता भी है और साथ ही ये अपने समय, समाज और दौर की विद्रूपताओं से सीधे-सीधे खुलकर मुठभेड़ भी करती हैं. विषय की विविधता इस संग्रह की लगभग सभी कहानियों को बहुत रोचक बना देती है. अपने दौर की बहुत सारी क्रूरताओं को हम अपनी सुविधा के लिए भुलाने का लगातार प्रयास करते हैं. लेकिन ये कहानियां उन सभी को परत-दर-परत उघाड़कर हमें फिर से शर्मसार करती हैं, पीड़ा देती हैं, टीस जगाती हैं, कसमसाहट पैदा करती हैं, अपराधबोध से भरती हैं. कहानी प्रेमियों के लिए यह एक पठनीय किताब है.