इस साल मई के महीने में सोशल मीडिया पर कश्मीर में एक तस्वीर वायरल हुई. इस तस्वीर में एक लड़की सेब के बागों में सुरक्षा बलों के बीच अपना चेहरा ढके दिखाई दे रही थी. तस्वीर को शेयर करने वाले लोग इस लड़की को सेना का मुखबिर बता रहे थे. काफी खोजबीन के बाद पता चला कि वह लड़की 24 साल की मसरत जहरा हैं और बतौर फोटो पत्रकार काम करती हैं. जिस तस्वीर को लेकर उन्हें ट्रोल किया जा रहा था वह एक एनकाउंटर के दौरान ली गई थी जहां जहरा अपना काम करने पहुंची थीं.

इस वाकये के बारे में जहरा कहती हैं, ‘मैं इसमें लोगों की ज्यादा गलती नहीं मानती क्योंकि कश्मीर में अाम लोगों के लिए यह मानना मुश्किल है कि कोई लड़की भी फोटो जर्नलिस्ट हो सकती है और तस्वीर खींचने के लिए एनकाउंटर साइट पर जा सकती है.’ फ्रीलांस फोटोग्राफी करने वाली जहरा सत्याग्रह से कहती हैं, ‘लेकिन उस एक घटना से भी लोगों में काफी फर्क पड़ा है. धीरे-धीरे लोगों की सोच बदल रही है. वे हमें हैरान होकर नहीं देखते.’

घाटी में पिछले दो-तीन साल में कई लड़कियों ने फोटो पत्रकारिता का रुख किया है. उनके काम को कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में भी जगह मिली है. महिला फोटो पत्रकरों की यह नई पीढ़ी सिर्फ पत्थरबााजी और मुठभेड़ों को ही कवर नहीं कर रही बल्कि इनके कैमरे की नजर कश्मीर के सभी पहलुओं पर है.

फोटो जर्नलिज्म ही क्यों?

सत्याग्रह ने ऐसी महिला पत्रकारों से बातकर यह जानने की कोशिश की कि अाखिर उन्होंने इस तरह का अपारंपरिक व्यवसाय क्यों चुना जिसमें कुछ साल पहले तक अाने से कोई भी कश्मीरी लड़की हिचकती थी? इस काम में क्या मुश्किलें अाती हैं और उनके परिवार का इस पर क्या रुख है? 25 साल की दुर्दाना भट कहती हैं, ‘मैं बचपन से आस-पास हो रही घटनाओं को देखती और सुनती आ रही हूं और मैंने तय कर लिया था कि कश्मीर की घटनाओं को डॉक्यूमेंट करना है. इसके लिए फोटो जर्नलिज्म से अच्छा माध्यम क्या हो सकता था? तस्वीर वह सब भी कह देती है जो शब्द नहीं कह पाते.’

मसरत जहरा
मसरत जहरा

दुर्दाना अभी कश्मीर में ही एक साप्ताहिक अंग्रेजी पत्रिका से जुड़ी हुुई हैं. इसके साथ ही वे कई प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रही हैं. जिनमें से एक कश्मीर के समकालीन इतिहास का दस्तावेजीकरण करना भी है.

24 साल की सन्ना इरशाद मट्टू ने अपने एक करीबी रिश्तेदार को कश्मीर के ख़राब हालात की भेंट चढ़ते देखा था. इसके बाद ही उन्होंने फैसला लिया था कि उन्हें कश्मीर के लोगों के दुख-दर्द को दर्शाना है. सन्ना कहती हैं, ‘मैं उस खौफनाक वाकये के बारे में बात नहीं करना चाहती. लेकिन मैंने तभी फैसला ले लिया था कि मुझे क्या करना है.’

सन्ना एक अंग्रेजी पोर्टल कश्मीरवाला के साथ जुड़ी हुई हैं और फ्रीलांसिंग भी करती हैं. उनकी तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. खतरे की बात पूूछने पर वे कहती हैं, ‘किसी एनकाउंटर साइट पर जितना खतरा लड़कों को होता है उतना ही लड़कियों को होता है. लेकिन जो हमारे अासपास हो रहा है उससे हम अलग-थलग कैसे रह सकते हैं?’

मुश्किलें

कश्मीर के हालात और लड़की होने के नाते क्या फोटोग्राफी करने में कुछ दिक्कतें सामने आती हैं? इस सवाल पर सन्ना कहती हैं, ‘वही मुश्किलें हैं जो इस पेशे में पुरुषों के सामने आती हैं. हां,कभी-कभी आसानी जरूर हो जाती है. लड़की होने की वजह से कभी-कभी हमें एेसी जगह जाने की भी इजाजत मिल जाती है, जहां बहुत सारे पुरुष फोटोग्राफर नहीं जा पाते. लड़कों को कहीं फोटो लेने के लिए जगह बनानी पड़ती है, वहीं हमारे लिए अक्सर जगह बनायी जाती है. लोग इज़्ज़त से पेश आते हैं.’ सन्ना मानती हैं कि सुरक्षा बल पुरुष फोटोग्राफरों से ज्यादा सख्ती से पेश आते हैं. कई बार उनकी पिटाई तक हो जाती है. लेकिन महिला फोटोग्राफर अभी तक इससे बची हुई हैं.

फोटोग्राफी के दौरान फील्ड में अाने वाली दिक्कतों से यह लड़कियां बखूबी निपट रही हैं. लेकिन अपने घर-परिवार को समझाने में इन्हें खासा वक्त लगा. फोटो जर्नलिस्ट जहरा कहती हैं, ‘मेरी मां मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी, लेकिन मैंने जर्नलिज्म किया. और फिर जब तस्वीर खींचते मेरी फोटो फोटो वायरल हुई तो उन्होंने मेरा घर से बाहर जाना बंद करा दिया. उनकी जिद थी कि मैं जर्नलिज्म छोड़ दूं.’ उस दिन एनकाउंटर कवर करते हुुए जहरा को चोट भी लग गई थी जिसने उनके परिवार को और भी चितिंत कर दिया. लेकिन इसके कुछ दिनों बाद ही जहरा को मिले अानलाइन समर्थन से घरवाले कुछ निश्चिंत हुए.

जहरा कहती हैं, ‘परिवार ने देखा कि कैसे लोग मेरे और बाकी महिला फोटो-पत्रकारों के समर्थन में खड़े हुए. तब उन्हें लगा कि मैं अच्छा काम कर रही हूं. इसमें खतरा तो है, लेकिन शर्म नहीं.’ इसके बाद उनके पिता ने उनके लिए स्कूटी भी खरीदी ताकि उन्हें काम में सहूलियत हो.

कश्मीर में लड़कियों का फोटोग्राफी करना नई बात है, लेकिन इन्हें वरिष्ठ फोटोग्राफरों का पूरा सहयोग मिला रहा है. सन्ना कहती हैं, ‘ज्यादातर फोटोग्राफर पुरुष हैं और वरिष्ठ हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे हमें किसी तरह से कम समझते हैं. जहरा भी इससे इत्तेफाक रखती हैं. वे कहती हैं, ‘जब तक मैंने स्कूटी नहीं ली थी साथी फोटोग्राफर्स प्रेस कालोनी में मेरा इंतजार करते थे और साइट पर मुझे साथ ले जाते थे.’

कश्मीरी समाज पारंपरिक ही नहीं प्रगतिशील भी है

कश्मीर की इन महिला पत्रकारों से बातचीत करने पर पता चलता है कि पारंपरिक माने जाने वाले कश्मीरी समाज में प्रगतिशीलता भी है. सन्ना बताती हैं कि एक मिलिटेंट के जनाजे की कवरेज के दौरान कैसे एक बुजुर्ग ने हाथ में डंडा लेकर उनके लिए जगह बनाई ताकि वे आराम से तस्वीर ले सकें. वे कहती हैं, ‘एक दफा एक आंटी मिलीं जिन्होंने मुझे फोटो खींचता देख मुझे पैसे दिए थे और कहा था कुछ खा लूं उन पैसों का, क्योंकि वो मुझे काम करते देख बहुत खुश हुई थीं.’

फोटोग्राफर दुर्दाना कहती हैं, ‘बस हमें अपने काम में लोकल सेंटीमेंट्स का ख्याल रखना पड़ता है. जैसे कि आप ऐसे गांव में जींस पहनकर जाएं जहां हर औरत पर्दे में रहती है तो आप उनका भरोसा कैसे जीत पाएंगे जो कि हमारे काम में बहुत जरूरी है. हम भी उन्हीं में से हैं लेकिन श्रीनगर में रहने की वजह से थोड़ा पहनावा अलग है. इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि जब काम पर जाऊं तो वह फर्क न दिखे.’ जहरा भी सन्ना और दुर्दाना की बात से सहमति जताती हैं. फोटो वायरल होने पर होने वाली ट्रोलिंग के सवाल पर वह कहती हैं, ‘बददिमाग लोग कहां नहीं होते. लेकिन देखना यह होता है कि बहुमत में कैसे लोग हैं.’

सन्ना, ज़हरा और दुर्दाना जैसी लड़कियों को देखकर और लड़कियों का भी मनोबल बढ़ा है. दक्षिणी कश्मीर में एनकाउंटर कवर करती ये फोटोग्राफर्स बहुत सारी लड़कियों की प्रेरणास्रोत बन रही हैं. दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले में रहने वाली 15 साल की सबा वानी कहती हैं, ‘मैंने तय कर लिया है कि मुझे भी फोटोजर्नलिस्ट ही बनना है.’ सोशल मीडिया पर सन्ना और ज़हरा जैसी लड़कियों को मिल रही सराहना भी नई पीढ़ी का मनोबल बढ़ा रही है.