राजस्थान के दिग्गज नेता जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह बीते दिनों भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं. इसके बाद से ही प्रदेश के राजनैतिक गलियारों में विभिन्न कयासों का दौर भी शुरू हो गया है. इनमें से एक यह भी है कि भरे मंच से ‘कमल का फूल, बड़ी भूल’ का नारा देने वाले मानवेंद्र को कांग्रेस विधानसभा चुनाव से पहले अपने साथ जोड़ने से झिझक रही है. यह बात कहने वालों के पास अपने पक्ष में कई तर्क़ हैं. जैसे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नहीं चाहते कि पश्चिमी राजस्थान में उनके सिवाय कोई दूसरा कद्दावर नेता उभरे. या फिर इलाके के जाट मानवेंद्र सिंह के आने से कांग्रेस से नाराज़ हो सकते हैं.

लेकिन सूबे कई राजनीतिकार ऐसे भी हैं जो इन तर्क़ों से सहमत नहीं दिखते. प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार तर्क देते हैं कि अशोक गहलोत सार्वजनिक मंच से जसवंत सिंह के साथ अपनी सहानुभूति जता चुके हैं. उनकी मानें तो हर बात को नाप-तोल कर कहने वाले गहलोत के इस बयान ने मानवेंद्र को लेकर उनके सकारात्मक रुख को स्पष्ट कर दिया था. वे यह भी बताते हैं कि कांग्रेस में अब गहलोत उस क़द पर पहुंच चुके हैं जहां उन्हें मानवेंद्र सिंह से दूर-दूर तक कोई ख़तरा होता नहीं दिखता. सूत्र बताते हैं कि लोकसभा चुनाव-2014 में भाजपा ने जसंवत सिंह को दरकिनार कर बाड़मेर-जैसलमेर की सीट से जिन कर्नल सोनाराम (जाट) को मौका दिया था वे एक बार फिर कांग्रेस में आने का मन बना रहे हैं. उनका दावा है कि ऐसे में गहलोत मानवेंद्र को तवज़्जो देकर सोनाराम की वापसी का दरवाज़ा बंद कर सकते हैं.

रही बात जाटों के नाराज़ होने की तो सूबे के राजनीतिकार बताते हैं कि इस समुदाय से जुड़े अधिकतर मतदाता किसी दल विशेष से नहीं बंधते. बल्कि वे प्रत्याशी (वह भी जीतने वाला) देखकर ही वोट देते हैं. ऐसे में किसी के आने या जाने से जाटों पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता.

मानवेंद्र सिंह के एक करीबी मित्र और वरिष्ठ पत्रकार का सत्याग्रह से हुई बातचीत में कहना है कि पेशे से दिल्ली में पत्रकार रह चुके मानवेंद्र और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच प्रगाढ़ संबंध हैं. वे आगे कहते हैं कि दिल्ली (कांग्रेस) से किसी ठोस आश्वासन के बिना चार साल तक धैर्य रखने वाले मानवेंद्र इतना बड़ा निर्णय नहीं लेते. वे आगे कहते हैं, ‘चूंकि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई शुभ कार्य करना वर्जित समझा जाता है. इसलिए किसी बड़ी घोषणा के लिए उचित समय का इंतजार किया जा रहा है.’ उनका यह भी कहना है कि जब प्रदेश कांग्रेस एक बार इनकार करने के बावजूद चुनावी समीकरणों के मद्देनज़र बसपा से भी गठबंधन करने के लिए तैयार हो गई है तो फिर मानवेंद्र को लेकर तो ‘किंतु-परंतु’ का कोई सवाल ही नहीं उठता.

राजस्थान की राजनीति से जुड़े लोगों का कहना है कि भाजपा के 23 राजपूत विधायकों में से चौदह मारवाड़ यानी पश्चिमी राजस्थान से ही आते हैं. बताया जाता है कि जसवंत सिंह के परिवार की इस क्षेत्र में ठीक-ठाक पकड़ है. साथ ही अलग-अलग कारणों से प्रदेश भाजपा से खासे नाराज़ चल रहे राजपूत समुदाय की भी पूरी सहानुभूति अपने नेता और उसके परिवार के साथ है. एक अनुमान के मुताबिक इस क्षेत्र की करीब 18 से 20 फीसदी आबादी राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखती है. ऐसे में यदि मानवेंद्र सिंह और उनकी पत्नी चित्रा सिंह पूरे मारवाड़ में भाजपा के खिलाफ प्रचार पर उतर जाएं तो कांग्रेस को बड़ा फायदा हो सकता है.

एक अन्य विश्लेषक कहते हैं कि जसवंत सिंह राजपूत ही नहीं बल्कि सर्वसमाज के भी नेता हैं. मानवेंद्र सिंह की स्वाभिमान रैली में भी इस बात का असर देखने को मिला था. उनका कहना है, ‘जसवंत सिंह वे नेता हैं जिनकी वजह से इलाके के मुस्लिम भी भाजपा को वोट दिया करते थे और दलितों के बीच भी वे खासे लोकप्रिय हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘सिंह भले ही भाजपा से जुड़े हुए रहे हों लेकिन उनकी राजनीति का अंदाज कांग्रेस से कहीं ज्यादा मेल खाता है. मानवेंद्र की राजनीति में भी उनके पिता की यह विरासत झलकती है. ऐसे में कांग्रेस भला क्यों नहीं उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहेगी?’

कुछ अन्य सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के साथ जुड़ने की घोषणा में हो रही देर के पीछे मानवेंद्र और उनकी पत्नी चित्रा सिंह के लिए चुनावी क्षेत्र का निर्धारण प्रमुख वजह है. बताया जाता है कि मानवेंद्र सिंह अगले लोकसभा चुनाव में अपने पिता की ही तरह बाड़मेर-जैसलमेर सीट से मैदान में उतरना चाहते हैं और अपनी पत्नी को अपने विधानसभा क्षेत्र ‘शिव’ से चुनाव लड़वाने की इच्छा रखते हैं. लेकिन कांग्रेस के सामने दुविधा यह है कि बीते दिनों अध्यक्ष राहुल गांधी किसी पैराशूट प्रत्याशी को टिकट न देने की घोषणा कर चुके हैं. ऐसे में बाड़मेर-जैसलमेर क्षेत्र से पंद्रहवें लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर चुके हरीश चौधरी (कर्नल सोनाराम के भाजपा में शामिल होने के बाद) पार्टी टिकट के प्रबल दावेदार हैं. लिहाज़ा अंदरूनी कलह से बचने के लिए पार्टी मानवेंद्र के लिए किसी अन्य विकल्प की तलाश में है जिसमें सिरोही-जालौर की राजपूत बहुल सीट प्रमुख है.

यदि विधानसभा चुनाव की बात करें तो शिव में भी कांग्रेस के पास अमीन खान की शक़्ल में एक मजबूत प्रत्याशी है. क्षेत्र में 50 हज़ार मुस्लिम वोटरों की वजह से वे जातिगत समीकरणों पर भी फिट बैठते हैं. इसके अलावा मानवेंद्र उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी अपील का दायरा यूं तो बहुत विस्तृत है, लेकिन अपने ही क्षेत्र में उन्हें लेकर मिला-जुला रुख देखने को मिलता है. स्थानीय जानकार कहते हैं कि मानवेंद्र अपनी पत्नी पर दांव खेलने के बजाय यदि खान का समर्थन करें तो कांग्रेस इस सीट को लेकर निश्चिंत हो सकती है.

कयास हैं कि कांग्रेस चित्रा सिंह या फिर मानवेंद्र सिंह के किसी करीबी को बाड़मेर के ही ‘सिवाना’ विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़वाने का प्रस्ताव रख सकती है. इसमें मुश्किल यह है कि 1990 से लेकर 2013 तक कुल छह विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सिवाना में सिर्फ एक ही बार जीत का स्वाद चखने में सफल रही है. लेकिन राहत इस बात की है कि यहां जातिगत और राजनैतिक समीकरण मानवेंद्र सिंह के पक्ष में दिखते हैं. जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में आए इस सीट के नतीजे से लोकसभा चुनाव में मानवेंद्र सिंह का भविष्य प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएगा.

राजस्थान के इतिहासकार जालौर जिले की सीमा पर स्थित सिवाना को विपरीत परिस्थितियों में ‘मारवाड़ के राठौड़ों की शरणस्थली’ के तौर पर जानते हैं. तब मारवाड़ का मतलब राठौड़ राजपूतों द्वारा बसायी तत्कालीन जोधपुर-बीकानेर और उनकी अधीन रियासतों से समझा जाता था. बाड़मेर भी ऐसी ही एक रियासत थी. अब यदि इस विधानसभा चुनाव में चित्रा सिवाना से अपनी राजनैतिक पारी की शुरुआत करती हैं तो देखने वाली बात होगी कि- क्या राठौड़ कुल से ताल्लुक रखने वाले मानवेंद्र सिंह और उनकी पत्नी के लिए सिवाना अपने ऐतिहासिक महत्व को बरक़रार रख पाता है या नहीं!