गांव गया था. कुछ दिन रहकर लौटना हुआ है. गांव में दुनिया भर की व्यर्थ बातों का बवाल नहीं है. न उस पर बतकही है. गांव में चिंता और बतकही का विषय धान है. ना तो अभी आषाढ़-सावन है कि धान की रोपाई हो रही है तो उस पर बात हो. न ही अभी अगहन या पूस है कि धान की कटाई हो रही है तो उस पर बात हो. हां, ये दोनों महीने नहीं हैं लेकिन, धान के लिए अभी सबसे महत्वपूर्ण महीना है. खेतों में लहलहाती धान की फसल संधिकाल में है. यानि आषाढ़-सावन में जो मेहनत हुई, उससे अगहन-पूस में क्या हासिल होगा, यह अभी ही धान का रंग-ढंग देख किसान बता देते हैं. इसलिए इस संधिकाल में किसान खूब सेते हैं धान को. कीट-पतंगों से बचाते हैं, आसपास घास-फूस नहीं लगने देते.

यूं भी किसानों का धान से प्रेम कुछ अलग किस्म का ही रहा है. धान को किसानी का प्राण कहा जाता है. सिर्फ भारत ही नहीं, धान पूरे एशिया की जान है. और ए​शिया में भी अगर खास तौर पर जापान की बात करें तो वहां जाते-जाते धान भगवान की तरह हो जाता है. धान पर निर्भरता इतनी है, इससे जीवन में खुशी के इतने रंग मिलते हैं कि कई विशेषज्ञ और विचारक धान को महज फसल या एक अनाज भर नहीं मानकर इसे अपने आप में एक मुकम्मल सांस्कृतिक विरासत भी कहते हैं.

कोई पांच-छह साल पहले मशहूर अध्येता और लेखक एडवर्ड एल्गर की एक किताब आयी थी - ‘द राइज आफ एशिया’. इस किताब की चर्चा दुनिया भर में हुई. सामंजस्य और आपसी रिश्तों को लेकर कई चुनौतियों से गुजर रहे एशियाई देशों में इसकी सराहना हुई. इस किताब में एल्गर ने भविष्य में समूह के तौर पर एशियाई देशों के उदय और विकास के संदर्भ में कुछ सूत्र दिये हैं. अध्ययन-अनुभव से उपजे तथ्यों और तर्कों के आधार पर एल्गर ने कहा है कि भविष्य में एशियाई देश यदि बड़ी ताकत बनेंगे या कि एक होंगे तो उनमें अहम भूमिका तीन समान अवलंबनों की होगी और ये तीनों भारत की देन हैं. एक धान या चावल खाने की आदत, दूसरा रामायण की लोकप्रियता और तीसरा बुद्ध.

अब इसमें अगर धान की बात करें तो दुनिया के 100 देशों में धान की खेती होती है. एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया का हर तीसरा आदमी किसी न किसी रूप में धान का सेवन करता है. लेकिन दुनिया में जो धान का उत्पादन होता है उसका 80 प्रतिशत हिस्सा एशिया में होता है.

भारत के महान कृषि वैज्ञानिक रमेश दत्त शर्मा ने 70 के दशक में धान पर एक महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किया था, जिसे बाद में आलेख की शक्ल में भी कई जगह प्रकाशित किया गया था. उस शोध पत्र में धान का इतिहास बहुत ही विस्तृत रूप में है. एशिया के दो सौ करोड़ से ज्यादा लोगों सीधे तौर पर जीवन जीने के लिए धान पर ही निर्भर हैं. एशिया में धान ही एक ऐसी खेती है जो हर तरह की जलवायु में होती है. नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों, या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे, हर जगह धान की खेती होती है.

इतिहास

धान का वैज्ञानिक इतिहास यह है कि यह भी पहले अन्य पौधों की तरह जंगल में अपने-आप ही उगा करता था. अपने आप धान की बालियों से बीज धरती में समाते थे, फिर अंकुरित होते थे और इसके बाद पौधे तैयार होते रहते थे. आज जो धान है उसके बारे में कहा जाता है कि सदियों पहले इसकी शुरुआत उत्तरी हिमालय से हुई थी. यहीं से धान हमारे देश के बाकी हिस्सों में और अफ्रीका के अलावा सारे संसार में फैला. भारत में धान कितनी पुरानी फसल है, इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि झारखंड में राजमहल की पहाड़ियों से लेकर कम से कम 37 जगहों की खुदाई में धान के बीज मिले हैं. मोहनजोदड़ो (अब पाकिस्तान में) के अतिरिक्त गुजरात में लोथल और रंगपुर में ईसा से दो हजार साल पहले का धान मिला है. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में प्राचीन स्थलों की खुदाई से भारत की प्राचीन धान-प्रधान संस्कृति का पता चलता है. चीन, जापान, कोरिया और थाइलैंड आदि देशों में की गई खुदाइयों में भी धान मिला है.

अलग-अलग भाषाओं में उनके नामों से भी कौन पौधा कहां से कहां गया, इसका पता चल सकता है. धान के लिए लैटिन भाषा का ‘ओराइजा’ और अंग्रेजी का ‘राइस’ ये दोनों नाम तमिल भाषा के ‘अरिसि’ शब्द से उपजे हैं. अरब के सौदागर अपने साथ अरिसि ले गए तो वह अरबी भाषा में ‘अल-रूज’ या ‘अरुज’ बन गया. आगे जाकर स्पेनिश में ‘अरोज’ हो गया. ग्रीक में यही ‘औरिजा’ और लैटिन भाषा में ‘ओराइजा’ बन गया. इतालवी में ‘राइसो’, फ्रेंच में ‘रिज’, जर्मन में ‘रीइस’ रूसी में ‘रीस’ और अंग्रेजी भाषा में ‘राइस’ बन गया. संस्कृत में रोपा धान को ‘व्रीहि’ कहते हैं. तेलुगु में इसी से वारी शब्द बना. अफ्रीका के पूर्वी तट पर बसे देश मैडागास्कर की ‘मलागासी’ भाषा में भी धान को ‘वारी’ या ‘वारे’ कहते हैं. ईरान की फारसी भाषा में ‘व्रीहि’ से ही ब्रिज बना. कौटिल्य या चाणक्य ने अपने संस्कृत ग्रंथ अर्थशास्त्र में साठ दिन में पकने वाले धान का वर्णन किया है. इसे आजकल साठी कहते हैं.

बौद्ध संस्कृति में भी धान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. गौतम बुद्ध के पिता का नाम था शुद्धोदन. यानी शुद्ध चावल. वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. बौद्ध धर्म के साथ ही धान की खेती और इसकी संस्कृति भारत के पड़ोसी देशों म्यांमार, इंडोनेशिया, थाइलैंड, चीन, जापान और कोरिया तक फैली. यानी दुनिया को धान भारत का ही दान है.

चीन की राजधानी बीजिंग में शहर के दाएं तरफ एक मंदिर हुआ करता था. नाम था स्वर्ग मंदिर. यहां पर सदियों तक कृषि-उत्सव होता रहा. उत्सव के दिन चीन के राजा किसानों की पीली पोशाक पहनकर आते थे. स्वर्ग मंदिर की बगल में ही एक खेत में गाजे-बाजे के साथ राजा हल चलाते. ईसा से कोई ढाई हजार साल पहले हुए इसी राजा शुन नुंग ने चीन के लोगों को पांच अनाजों की खेती करना सिखाया था. इनमें से एक था ताओ यानी धान.

उस जमाने में देशों के बीच सड़कें नहीं थीं. फिर भी धान के दाने और उन्हें उगाने के तरीके दूर-दूर तक फैलते रहे. समुद्री सौदागर, हमलावर और प्रवासी यात्री जहां-जहां गए उनके साथ धान भी चलता गया. जिन्होंने कभी चावल देखा भी नहीं था, वे सोने-चांदी के बदले भी चावल लेते थे.

आज से कोई 15 हजार से 16 हजार साल पहले हिमालय की उत्तरी और दक्षिणी ढलानों में जंगली धान लहराता था. ‘इंडिका’ किस्म का धान तापमान में हेर-फेर, यहां तक कि सूखा भी सह लेता था. हिमालय से यह धान उत्तरी और पूर्वी भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया के उत्तरी भाग और फिर दक्षिणी चीन में फैल गया. पड़ोसी देश म्यांमार में 46 लाख हेक्टेयर में धान की खेती की जाती है. यहां के कारेन कबीले के लोग धान में आत्मा मानते हैं और उसे केला कहते हैं.

इंडोनेशिया कोई 36 हजार द्वीपों का देश है. यहां बाली और सुमात्रा के किसान धान-माता को देवी-श्री और धान-नाना को देवी-नीनी कहते हैं. बीज बोने से पहले उनमें से सबसे बढ़िया बालियां चुनकर देवीश्री बनाई जाती हैं. इन्हें सिर पर रखकर नाचते-गाते खेत में या कोठार में सजा देते हैं. इस तरह समस्त एशियाई देशों में देखें तो धान के विविध रूप देखने को मिलेंगे और सब जगह धान की महत्ता अलग-अलग रूपों में मिलेगी.

एक बार फिर लौटकर अगर भारत की बात करें तो अपने देश से तो धान का रिश्ता अभिन्न ही रहा है. यहां चावल को खाया भी जाता है, चावल के अक्षत से ही पूजा होती है, चावल का इस्तेमाल तिलक लगाने में भी करते हैं और धान की बाली का तो शुभ कार्यों में इस्तेमाल होता ही है. धान को इसीलिए भारत और एशियाई देशों में अनाज की बजाय एक संस्कृति और परंपरा का भी नाम विद्वानों ने दिया है.एशियाई देशों में जितना गहरा रिश्ता भारत से मिलता है, धान का उतना ही गहरा रिश्ता एक और मुल्क जापान से भी मिलता है, जिसे जानना इस एक अनाज के कई पहलुओं को सामने लाता है.

जापान में धान भगवान

जापान एक ऐसा देश है, जहां धान भगवान-सा दर्जा पा चुका है. जापान में धान कोई तीन हजार साल पहले पहुंचा था. फिर जल्दी ही यह जापानी जीवन का अभिन्न अंग बन गया. यहां बचपन से ही धान को आदर देना सिखाया जाता है, मानो धान न हो, घर का कोई बड़ा-बूढ़ा हो. आज भी हर महीने के पहले, पंद्रहवें और अट्ठाइसवें दिन और सभी त्यौहारों पर जापानी घरों में लाल चावल बनाते हैं. जापान के एक प्रधानमंत्री हुए माकोसोने. सान के नाम का मतलब है- श्री मध्य जड़. इनसे पहले के प्रधानमंत्री थे मुकुदा यानी श्री भरे खेत. यहां खेत का मतलब धान के खेत से ही है. आज दुनिया में होंडा कंपनी का जलवा है. होंडा के माने हैं धान का मुख्य खेत और टोयोटा का मतलब है भरपूर फसल वाला धान का खेत. जापान के एक प्रमुख हवाई अड्डे का नाम है नारिटा यानी फूलता फलता धान का खेत. धान की प्रधानता की जापान में बड़ी पुरानी परंपरा है. यहां देहातों में धान-देवता इनारी का मंदिर जरूर मिलेगा. जापान के जनजीवन में धान का सीधा सरोकार दिखता है. बड़े से बड़े उद्योगपतियों से लेकर आम जनमानस और बड़े राजनेताओं तक के सीधे संपर्क व सरोकार धान से दिखते हैं. यानी धान में जहां भारत की जान बसती है, वहीं जापान में धान भगवान सरीखा रूप ले लेता है.