बदले दौर की सियासत और देशभक्ति की एक बानगी देखिए. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार महात्मा गांधी के जन्म के 150 साल पूरे हाेने के मौके पर दो अक्टूबर 2018 से 2019 की इसी तारीख़ तक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू कर रही है. लिहाज़ा कांग्रेस को भी कुछ न कुछ ‘ज़वाबी’ करना था. उसने किया भी. क्या किया और उस किए की परिणति कैसी हुई, इसकी एक दिलचस्प मिसाल उत्तर प्रदेश से मिलती है.

जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने बीते महीने की 12 तारीख़ को सभी जिला/शहर इकाइयों के लिए एक पत्र जारी किया था. इसमें कहा गया कि सभी इकाइयां 25 सितंबर से एक अक्टूबर 2018 तक रोज अलसुबह प्रभात फेरियां निकालें. रामधुन गाते हुए. हाथों में तख़्तियां लेकर. इन तख़्तियों पर लिखा जाए - हम बापू के 150वें जयंती वर्ष पर संकल्प लेते हैं कि हम उनकी सत्य एवं अहिंसा की विचारधारा की हत्या नहीं होने देंगे. पत्र में दो अक्टूबर को जिलों-शहरों में स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिमाओं पर कार्यक्रम आयोजित करने और बापू की विचारधारा पर चलने की शपथ लेने का निर्देश भी था.

प्रभात फेरियाें के संबंध में प्रदेश कांग्रेस का निर्देश पत्र. फोटो : आशीष सक्सेना
प्रभात फेरियाें के संबंध में प्रदेश कांग्रेस का निर्देश पत्र. फोटो : आशीष सक्सेना

लेकिन प्रभात फेरियां देखते ही देखते ‘दोपहर फेरियाें’ में बदल गईं

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर के दस्तख़त से जारी इन निर्देशों तक तो सब ठीक था. लेकिन जो आगे हुआ वह ग़ौर करने लायक है. बताया जाता है कि जिला/शहर इकाइयों ने इन प्रभात फेरियों का समय अपनी सुविधानुसार तय कर लिया. कहीं दिन में 10 बजे तो कहीं 11 बजे तक भी. यानी प्रभात की विदाई के बाद फेरियों की रस्म अदाई. तिस पर वह भी गुटबाज़ी, संवादहीनता और सुबह उठने का अनुशासन न होने की वज़ह से असर न छोड़ पाई.

बरेली में युवक कांग्रेस के नेता महेंद्र सिंह इसकी पुष्टि करते हैं. वे बताते हैं, ‘प्रभात फेरी का समय यूं तो सुबह का ही था. लेकिन आजकल देर रात तक युवा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं. ऐसे में सुबह-सुबह उन्हें प्रभात फेरी में शामिल करने का प्रयास वैसे परिणाम नहीं दे पाया जैसी अपेक्षा थी. लिहाज़ा प्रभात फेरी का समय बदलकर सुबह 10 बजे का किया गया. लेकिन उस वक़्त भी तेज धूप की समस्या आड़े आ गई. फिर कार्यक्रम बनाते वक़्त स्थानीय नेतृत्व (जिला एवं महानगर अध्यक्ष) ने सभी से मशविरा भी नहीं किया. सूचना-संदेश का प्रसार-विस्तार भी सभी तक नहीं हो पाया. ऐसे में प्रभात फेरियों के लिए अपेक्षित उत्साह भी नहीं दिख सका.’

इसी तरह पार्टी के महानगर प्रवक्ता ज़िया उर-रहमान बताते हैं, ‘मैं ख़ुद प्रभात फेरियों में शामिल नहीं हो पाया. क्योंकि मैंने जीवन में पहली बार सुना और देखा कि प्रभात फेरी सुबह 10 बजे भी हाे सकती है. उसमें भी फेरी निकलते-निकालते 11 बज जाएं और वह भी 100 कदम पर ख़त्म हो जाए. ऐसी रस्म अदायगी का क्या लाभ?’ कारण पूछने पर वे कहते हैं, ‘संवाद और समन्वय ही नहीं था. प्रदेश नेतृत्व ने प्रभात फेरी निकालने का जब निर्देश जारी किया तो स्थानीय स्तर पर एक बैठक बुलाई गई. लेकिन इसमें महिला, विधि, छात्र, युवा, सेवादल, व्यापार, अनुसूचित जाति-जनजाति आदि प्रकोष्ठ के पदाधिकारियों को ही नहीं बुलाया गया. फिर सफल आयोजन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?’

जिला कांग्रेस के कोषाध्यक्ष कौशल अग्रवाल कहते हैं, ‘नीरसता भरे आयोजन में आम लोग साथ नहीं आ सकते. प्रभात फेरियां भोर में निकलती हैं. तब लोग उत्सुक होते हैं उन्हें देखने-जानने के लिए. दिन में 10-11 बजे लोग अपनी नौकरी-व्यवसाय के लिए निकलेंगे या प्रभात फेरी में शामिल होने को?’ अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष दीपक वाल्मीकि, पार्टी के जिला उपाध्यक्ष उमेश आर्य और प्रदेश कांग्रेस के सदस्य राकेश सक्सेना का भी कुछ ऐसा ही मानना है. वे कहते हैं, ‘आयोजन को महज़ आैपचारिकता बना दिया गया. इसीलिए अपेक्षित सफलता भी नहीं मिली.’

अलबत्ता पार्टी के जिला अध्यक्ष रामदेव पांडे और महानगर अध्यक्ष चौधरी असलम इस बात से इत्तेफाक़ नहीं रखते कि प्रभात फेरियों के आयोजन सफल नहीं हुए. वे कहते हैं, ‘पार्टी इन आयोजनों से अपना संदेश देने में सफल रही.’ हालांकि सत्याग्रह ने कुछ और जगहों पर हुए ऐसे ही आयोजनों के बारे में जब पता किया तो मालूम हुआ कि वहां भी स्थिति कमोबेश 19-20 ही रही. संभवत: इसीलिए पार्टी के प्रदेश सचिव अनुज गंगवार ख़ुद यह मानने में संकोच नहीं किया कि प्रभात फेरियों का आयोजन ‘मेरे हिसाब से 50 फ़ीसद ही सफल रहा.’

प्रभात फेरियों का एक दौर वह भी था

‘प्रभात फेरी’ के नाम पर हुए इस ‘दोपहर फेरी’ आयोजन के बरक्स स्वतंत्रता संग्राम के किसी सेनानी से उनके ‘प्रभात फेरियों’ से जुड़े अनुभव जानना भी प्रासंगिक हाे सकता है. लिहाज़ा सत्याग्रह ने बरेली शहर के वरिष्ठ नागरिक जेसी पालीवाल से संपर्क किया. स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर को पालीवाल ने आंख भर के देखा है. सब यादें उन्हें आज तक ताज़ा हैं. बातचीत शुरू हो तो आज भी उस दौर की तमाम बातें सिलसिलेवार तरीके से बता देते हैं.

इसीलिए प्रभात फेरी का ज़िक्र छिड़ते ही पालीवाल की आंखों में चमक आ गई. वे बताने लगे, ‘प्रभात फेरियां क्या थीं? आज़ादी की अलख़ जगाने और जगाए रखने का जरिया थीं. उस दौर में सूरज उगने से पहले ही छोटे-छोटे बच्चे और बड़े-बूढ़े सब लोगों के घर-घर जाकर दस्तक देते थे. लोगों को जगाते थे. फेरी में साथ चलने को कहते थे. और फिर लोगों का रेला गलियों-गलियों, चौक-चौबारों से होता हुआ पूरे शहर में घूमता था. ढोल-मंजीरे की थाप पर, ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई’ की टेर लगाई जाती थी. ‘रघुपति राघव राजाराम’ के भजन और राम धुन गूंजती थी. और इस सब में जाति-धर्म की भी कोई दीवार आड़े नहीं आती थी. क्या बच्चे, क्या बड़े, क्या हिंदू, क्या मुस्लिम, क्या महिला और क्या पुरुष. सब प्रभात फेरियाें में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे. लड़ते भी थे, अंग्रेज पुलिस से, जब वह डराकर भगाने की कोशिश करती थी. पर वह लड़ाई भी शांतिपूर्ण ही होती थी...’

कहते-कहते पालीवाल थोड़ा ठहरे तो उन्हें बताया गया कि कांग्रेस ने भी महात्मा गांधी के 150वें जयंती वर्ष के मौके पर प्रभात फेरियां निकाली हैं, आपको ख़बर है? उनका ज़वाब आया, ‘नहीं, मुझे कोई सूचना नहीं है. उन्होंने मुझे कोई ख़बर नहीं दी!’

‘दोपहर फेरी’ की सूचना ऐसी किसी सम्मानित हस्ती को कोई देता भी कैसे?