अंतरराष्ट्रीय बाजार में रूपये की लगातार गिरती और कच्चे तेल की लगातार चढ़ती कीमतों ने देश की सभी वित्तीय संस्थाओं को चिंतित कर रखा है. बुधवार, 3 अक्टूबर को रुपया अपनी उच्चतम गिरावट पर पहुंचकर डॉलर के मुकाबले 73.25 पर पहुंच गया और कच्चे तेल की कीमतों ने 85 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा छू लिया. इसी दिन भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिनी बैठक आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता में शुरु हुई. शुक्रवार ( 5 अक्टूबर ) को इस मौद्रिक समीक्षा के नतीजे आएंगे. तमाम विशेषज्ञों का एक सुर में मानना है कि आरबीआई चालू वित्तीय वर्ष में लगातार तीसरी बार रेपो रेट ( कम अवधि के कर्ज पर आरबीआई द्वारा बैंकों से वसूले जाने वाले ब्याज की दर) बढ़ा सकती है.

इससे पहले जून और अगस्त में हुई मौद्रिक नीति समिति ( एमपीसी) की बैठकों के बाद रेपो रेट में लगातार दो बार 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोत्तरी की गई थी. अगर शुक्रवार को रिजर्व बैंक इसमें 25 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि और करती है तो रेपो रेट 6.50 से बढ़कर 6.75 हो जाएगा. जानकार मान रहे हैं कि लगातार तीसरी बार रेपो रेट बढ़ने के कारण बैंक अपने कर्ज महंगे करने पर मजबूर हो जाएंगे. इसका सीधा सा मतलब है कि होम लोन या कार लोन पर चुकाई जा रही आपकी ईएमआई भी महंगी हो जाएगी.

रेपो रेट बढ़ने की संभावना को देखते हुए एसबीआई, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई ने बैठक के शुरु होने से पहले ही कर्ज पर अपनी ब्याज दरें बढ़ा दी हैं. एसबीआई ने अपनी ब्याज दर में .5 फीसद की वृद्धि की है, वहीं एचडीएफसी और आईसीआईसीआई ने अपने कर्जे .10 फीसद महंगे कर दिए हैं. माना जा रहा है कि शुक्रवार को मौद्रिक नीति समीक्षा के नतीजे आने के बाद बाकी बैंक भी इस तरह का फैसला ले सकते हैं.

एमपीसी की अक्टूबर बैठक एेसे समय में हो रही है जब भारतीय अर्थव्यवस्था हर तरफ से दबाव महसूस कर रही है. 2018 में अब तक रूपया डॉलर के मुकाबले 15 फीसद गिर चुका है. लगातार बढ़ते कच्चे तेल के दाम ने भी सरकार को चिंतित कर रखा है. इसके अलावा लगातार गिरता शेयर बाजार और इंफ्रास्टकचर लीजिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज ( आईएल एंड एफएस) जैसी कंपनियों की देनदारी ने भी बाजार और अर्थव्यवस्था में हलचल मचा रखी है. अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक से पहले आरबीआई के पास सिर्फ एक अच्छी खबर है और वह है अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई दर का नीचे रहना. अगस्त में खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) 3.69 फीसद रही. जो पिछले दस महीने का इसका निम्नतम स्तर है. जुलाई में खुदरा महंगाई दर 4.17 फीसद दर्ज की गई थी.

फिलहाल महंगाई नियंत्रण में फिर ब्याज दर में बढोतरी क्यों

आरबीआई की मौद्रिक समीक्षा नीति में अर्थव्यवस्था के हर पहलू पर गौर किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि बाकी किसी भी चीज से ज्यादा एमपीसी का जोर महंगाई नियंत्रण पर होता है. अगस्त के आंकड़ों को देखें तो महंगाई दर इस वक्त काफी हद तक नियंत्रण में है और खाद्य पदार्थों के दाम भी अपेक्षाकृत कम हैं. कोर महंगाई दर ( ईधन और खाद्य पदार्थों को घटाकर निकाली जाने वाली दर) भी उस रफ्तार से नहीं बढ़ी हैं. जुलाई के 6.3 फीसद के मुकाबले कोर महंगाई दर भी अगस्त में 5.9 फीसद ही रही है.

मौद्रिक नीति की परंपरागत समझ कहती है कि केंद्रीय बैंक कर्ज इसलिए महंगे करता है क्योंकि इससे बाजार में नगदी कम होती है. लोगों के पास नगदी कम होने से वे उपभोक्ता वस्तुएं कम खरीदते हैं और चीजें महंगी नहीं होती हैं. लेकिन अगर इस समय महंगाई नियंत्रण में है तो ब्याज दरों में बढोतरी क्यों?

विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल महंगाई नियंत्रण में दिख रही है. लेकिन रूपये की गिरती कीमत और तेल की लगातार बढ़ती कीमतें अाने वाले वक्त में महंगाई की दर को खासा बढ़ा सकती हैं. रुपये के अवमूल्यन से आयातित वस्तुएं महंगी हो रही हैं और तेल की बढ़ी कीमतें लगभग हर चीज की कीमत बढ़ा देती हैं. अगस्त में हुई रिजर्व बैंक की एमपीसी की बैठक के मुकाबले अब तक कच्चे तेल की कीमतें 12 फीसद बढ़ चुकी हैं. ताजा खबरों के मुताबिक जल्द ही इसकी कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच सकती है. इन वजहों से अाने वाले वक्त में महंगाई एक नया स्तर छू सकती है. एक अनुमान के मुताबिक मार्च 2019 में औसत महंगाई दर 4.5 हो सकती है. एेसे में आरबीआई की नजर भविष्य की महंगाई पर है और अगर शुक्रवार को वह एक बार फिर से ब्याज दरें बढ़ाता है तो वह ऐसा महंगाई को समय रहते निय़ंत्रित करने के लिए करेगा.

रूपये की गिरती सेहत और भी वजहों से चिंता का विषय

आर्थिक जानकारों का मानना है कि अपने गठन के बाद से ही एमपीसी के फैसले लेने का तरीका यह रहा है कि उसकी प्राथमिक चिंता महंगाई पर निय़ंत्रण है. रूपये में गिरावट को एमपीसी की बैठक महज इस नजरिये से देखती है कि इससे महंगाई पर क्या फर्क पड़ेगा. आर्थिक रणनीतिकार राजीव मलिक अपने एक स्तंभ में लिखते हैं, ‘मुद्रा बाजार में रुपये की हालत पर एमपीसी में कितनी चर्चा होती है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एमपीसी के बैठकों के एक साल के मिनट्स में रूपया शब्द का इस्तेमाल एकाध बार ही मिलता है.’

आर्थिक अखबार मिंट में सिटी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री समीरन चक्रवर्ती लिखते हैं, ‘बहुत स्वाभाविक प्रश्न है कि अगर महंगाई नियंत्रण में है तो रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाकर कर्ज क्यों महंगे कर रही है. लेकिन इसकी वजह यह है कि इस समय अर्थव्यवस्था के सामने व्यापक चुनौतियां हैं. रुपये की गिरती कीमत और चालू खाते का बढ़ता घाटा रिजर्व बैंक की सबसे बड़ी चिंता है. रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाकर रूपये की विनिमय दर संभालना चाहता है.’ जाहिर है कि वह रेपो रेट में बढोतरी इस वजह से भी कर सकता है कि कर्ज महंगे होने से बाजार में रूपये की आपूर्ति घटेगी और उसकी हालत में कुछ सुधार होगा. इससे चालू खाते के घाटे (आयात के मुकाबले निर्यात की कुल कीमत में कमी होना) में थोड़ी कमी आ सकती है.

भारत के चालू खाते पर इस समय महंगे कच्चे तेल और रुपये की गिरावट की दोहरी मार है. एक तरफ तेल महंगा होने से इसके आयात पर भारत को पहले से ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ी रही है, वहीं कमजोर रूपये के कारण भी भारत को आयात के लिए ज्यादा भारतीय मुद्रा देनी पड़ रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि चालू खाता घाटा पिछले वित्तीय वर्ष के 1.9 फीसद के मुकाबले इस वर्ष जीडीपी का 2.6 फीसद हो सकता है. एेसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एमपीसी अपनी वर्तमान बैठक में रूपये की स्थिरता और महंगाई पर नियंत्रण दोनों ही बातों पर चर्चा करेगी.

आरबीआई की दुविधा

अर्थ विशेषज्ञों में इस बात पर सहमति है कि शुक्रवार को आरबीआई रेपो रेट 25 बेसिस प्वाइंट बढाएगा. कई बैंकों ने अपने कर्ज महंगे कर इस संभावना को और भी पुख्ता कर दिया है. लेकिन इस पूरे मामले में आरबीआई के सामने एक बड़ी दुविधा भारत के वित्तीय बाजार की हालत भी है. रेपो दर बढ़ने से बाजार में नगदी का प्रवाह घटेगा. इससे महंगाई और रूपये को मजबूत करने में तो मदद मिल सकती है लेकिन भारत का शेयर बाजार इस समय नगदी के भारी संकट का सामना कर रहा है. अमेरिका की ब्याज दरों में वृद्धि और उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती ने इस संकट को और बढ़ाया है. ऐसे में महंगे कर्ज इक्विटी बाजार को और परेशान करेंगे.

इसीलिए विशेषज्ञ रेपो रेट के 50 बेसिस प्वाइंट बढ़ने की संभावना से इंकार कर रहे हैं. जानकारों का मानना है कि वित्तीय बाजार में मुद्रा की आपूर्ति बनाने रखने के लिए आरबीआई ओएमओ ( अोपन मार्केट अॉपरेशन ) जैसे विकल्प का इस्तेमाल कर सकता है. कुछ दिनों पहले आरबीआई ने दस हजार करोड़ की सिक्योरटीज खरीदकर बाजार में नगदी बढ़ाई थी. मौजूदा साल में वह चार बार एेसा कर चुका है.