जंगल का राजा (गिर के एशियाई सिंह) ‘गुजरात की राजशाही’ के सामने मज़बूर है. बीते 16-17 दिनों के भीतर गिर राष्ट्रीय उद्यान में रहने वाले 23 सिंहों की मौत हो चुकी है. इस पर गुजरात उच्च न्यायालय से लेकर देश की शीर्ष अदालत तक सब फिक़्रमंद हैं. मगर लोकशाही (डेमोक्रेसी) से सियासी सफर के जरिए उपजी ‘गुजरात की राजशाही’ अब तक बेफिक़्र है. और इस बेफिक़्री में आशंका यह पैदा हो रही है कि कहीं शेरों की ‘दुर्लभ प्रजाति’ (एशियाई सिंह) जल्द ही ‘विलुप्त प्रजातियों’ में शामिल न हो जाए. क्योंकि गुजरात के अलावा एशियाई सिंह पूरी दुनिया में कहीं और पाए नहीं जाते.

एशियाई सिंहों के बारे में वन सेवा के पूर्व अधिकारी एचएस सिंह ने एक अध्ययन किया था. उनका यह अध्ययन करेंट साईंस नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ. इसमें उन्होंने बताया है कि 20वीं की शुरूआत में एशियाई शेरों की तादाद पूरी दुनिया में महज़ कुछ दर्ज़न ही हुआ करती थी. लेकिन 2015 तक इसमें चार गुणा तक इज़ाफ़ा हुआ. संख्या बढ़कर 2015 में 523 तक पहुंच गई. इसके बावज़ूद शेरों की यह प्रजाति अब भी दुर्लभ मानी जाती है, जिस पर विलुप्त होने का ख़तरा अलग से मंडरा रहा है.

ख़तरे का कारण ये है कि एशियाई सिंह इस समय एक क्षेत्र विशेष में सीमित हैं. ये मुख्य तौर पर गुजरात के पांच संरक्षित इलाकों में पाए जाते हैं. ये हैं- गिर राष्ट्रीय उद्यान, गिर अभयारण्य, पनिया अभयारण्य, मिटियाला अभयारण्य और गिरनार अभयारण्य. आपस में लगभग जुड़े इन पांचाें संरक्षित क्षेत्रों का कुल दायरा 1,621 वर्ग किलोमीटर का है. जबकि जानकारों की मानें तो इतने क्षेत्रफल वाले जंगल में बमुश्किल सौ-डेढ़ सौ सिंह ही आराम से रह सकते हैं. फल-फूल सकते हैं. यानी इसका दूसरा मतलब यह भी है कि गुजरात के इन पांचों इलाकों में उनकी कुल क्षमता से लगभग तीन गुणा ज़्यादा सिंहवंश रह रहा है.

जानकार इस स्थिति को ‘एक ही टोकनी में सभी अंडे’ रखे जाने जैसी स्थिति मानते हैं. यही स्थिति शेरों के लिए ख़तरा बन रही है. पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक रवि चेल्लम कहते हैं, ‘चूंकि सभी एशियाई सिंह एक ही जगह सीमित हैं इसलिए उनकी आबादी को कई स्वाभाविक ख़तरे पैदा हो रहे हैं, बने हुए हैं. जैसे कि जंगल की आग, विपरीत मौसम की भीषण परिस्थितियां (बाढ़-सूखा आदि) और उनमें ज़रूरी-ग़ैरज़रूरी आपसी संसर्ग से संक्रामक बीमारियां फैलने का डर. सवाल ये है कि इन जोख़िमों को कैसे कम किया जा सकता है? सुरक्षा तंत्र कैसे विकसित किया जा सकता है? क्या हो सकता है?’

चेल्लम के मुताबिक, ‘इन सवालों का एक ही ज़वाब है- जितनी जल्दी हो इन शेरों को दूसरी उपयुक्त जगह स्थानांतरित किया जाए. यही एक तरीका है, जिससे शेरों की प्रजाति को संरक्षित और संवर्धित भी, किया जा सकता है. इस प्रक्रिया को इस तरह तो बिल्कुल भी नहीं देखना चाहिए कि इस क्षेत्र में गुजरात की अब तक की उपलब्धियों को कम कर के आंका जा रहा है. या कमतर किया जा रहा है.’ ख़ास बात ये है कि इसी तरह की दलीलों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी 15 अप्रैल 2013 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के लिए एक आदेश जारी किया था. इसमें अदालत ने कहा था, ‘कुछ एशियाई शेरों को जितनी जल्दी हो गुजरात से उसके पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर वन्य जीव अभयारण्य भेजने का बंदोबस्त किया जाए.’ अदालत ने आदेश पर अमल के लिए छह महीने का समय दिया था.

सिर्फ देश की शीर्ष अदालत ही नहीं इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़रवेशन ऑफ नेचर (प्रकृति के संरक्षण के लिए बना अंतरराष्ट्रीय संगठन- आईयूसीएन) ने भी सरकारी तंत्र को यही मशविरा दिया था. आईयूसीएन के मुताबिक गिर के शेरों की आबादी सुरक्षित और संरक्षित रहे, उनमें अनुवांशिक विविधता बनी रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि उन्हें कम से कम एक और अतिरिक्त जगह पर ले जाकर बसाया जाए. इतना ही नहीं देश की मौज़ूदा ‘राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना-2017-31’ और उसकी ऐसी ही पूर्ववर्ती योजनाओं में भी यही कहा गया है. इसमें स्पष्ट लिखा है कि एशियाई सिंहों जैसी इक़लौती दुर्लभ जीव प्रजातियों की सुरक्षा और संरक्षा के लिए उन्हें उनकी मौज़ूदा रिहाइश के अलावा किसी वैकल्पिक जगह पर ले जाया जाना चाहिए, बसाना चाहिए.

यानी वन्य जीवों, ख़ास तौर पर एशियाई शेरों की फिक़्र करने वाले हर वर्ग को लगता है कि उन्हें गुजरात के गिर के अलावा कहीं और भी बसाया जाए. इसी से उनकी सुरक्षा संभव है. लेकिन जो ‘बेफिक़्र ज़िम्मेदार’ हैं, उन्हें शायद ऐसा नहीं लगता.

पुनर्वास आख़िर क्यों ज़रूरी है?

एशियाई शेरों के पुनर्वास की योजना न तो नई है और न ही अवैज्ञानिक. इस योजना पर विभिन्न स्तरों पर 1990 के दशक से विचार चल रहा है. बल्कि विचार ही नहीं बाक़ायदा प्रयास भी किए जा रहे हैं. केंद्र और मध्य प्रदेश की सरकार करोड़ों रुपए ख़र्च कर चुकी हैं. इस राशि से मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर के बारे में अध्ययन कराया गया. फिर जब इसे सभी स्तरों पर एशियाई सिंहों के लिए अनूकूल पाया गया तो अभयारण्य को उनकी बसाहट के तौर पर विकसित किया गया. इसके तहत अभयारण्य के दायरे में रहने वाले हज़ारों आदिवासी परिवारों को दूसरे स्थानों पर बसाया गया. शेरों के खाने-पीने के समुचित इंतज़ाम किए गए. ‘अतिथि सिंहों’ की शिकारग़ाह का दायरा बढ़ाया गया. लेकिन इन ‘अतिथियों’ के स्वागत की मध्य प्रदेश की तमन्ना अब तक पूरी नहीं हुई है.

फिर अगर ‘एशियाई शेरों के पुनर्वास के विचार’ के मूल की बात है तो यह 1994 में घटी कुछ चिंताजनक घटनाओं में कहीं मिलता है. उस दौर में सेरेंगेती और तंजानिया के जंगलों में बड़ी तादाद में अफ्रीकी शेरों की मौत हुई थी. उनके बीच कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) का संक्रमण फैला था. इस वायरस के फैलने से पहले इन इलाकों में 2,500 अफ्रीकी शेर हुआ करते थे. लेकिन बताते हैं कि वायरस ने कुछ ही समय में 800 से ज़्यादा सिंहों की जान ले ली थी. और आज की तारीख़ में चिंता बढ़ाने वाली बात ये है कि अब गिर के एशियाई शेरों के बारे में भी यही सुनने में आ रहा है कि उनमें से कुछ सीडीवी के संक्रमण से मारे गए हैं.

वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय अजय दुबे सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल से बातचीत के दौरान कहते हैं, ‘बीते महीने ही गुजरात सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्री ने विधानसभा में माना है कि 2016 से 2017 के बीच 182 शेरों की मौत हाे चुकी है. इनमें से 32 शेर अप्राकृतिक मौत मरे हैं. इनके अलावा 2015 में ही 10 शेर बाढ़ की वज़ह से मारे गए थे.’ इस तरह बीते 15-16 दिनों में मारे गए सिंहों का आंकड़ा भी जोड़ लें तो 2016 से अब तक मारे गए सिंहों की तादाद 200 के भी पार पहुंच जाती है. तिस पर चिंता को गंभीरता के स्तर तक ले जाने वाला एक और तथ्य अभी शुक्रवार को ही सामने आया है.

हिंदुस्तान टाइम्स ने आईसीएमआर (भारतीय चिकित्सा शोध परिषद) के हवाले से बताया है कि हाल में ही जिन 23 शेरों की मौत हुई है उनमें से पांच सीडीवी से ही मरे हैं. आईसीएमआर के मुताबिक उसके वैज्ञानिकों ने पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान (वायरोलॉजी) संस्थान (एनआईवी) की प्रयोगशाला में मारे गए गए शेरों के नमूनाें का गहन और विस्तृत परीक्षण किया है. इसी परीक्षण के दौरान पांच सिंहों की मौत सीडीवी से होने की पुष्टि हुई है. इसीलिए दुबे जैसे जानकार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अब जितनी जल्दी हो सुप्रीम कोर्ट के 2013 के आदेश को लागू किया जाना चाहिए. गिर के कुछ शेरों को वहां से हटाकर मध्य प्रदेश ले जाना चाहिए.

शेरों के पुनर्वास की ज़रूरत पर बल देने वाले कुछ और तथ्य भी हैं. जैसे- गिर में शेरों के अलावा 500 के लगभग तेंदुए हैं. इसलिए भी सिंहवंश के लिए जगह और कम पड़ रही है. यही कारण है कि लगभग 40 फ़ीसदी शेर संरक्षित क्षेत्रों से निकलकर बाहर इंसानी बस्तियों के आसपास अक्सर घूमते पाए जाते हैं. इससे ‘वन्यजीवों और इंसानों के बीच संघर्ष’ की परिस्थितियां बन रही हैं. इसके अलावा एक ही जगह भीड़ बढ़ने से सिंहवंश के बीच उपयुक्त-अनुपयुक्त शारीरिक संबंधों की स्थितियां भी बनती हैं, जिससे वे अनुवांशिक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.

करेंट साइंस जर्नल में ही प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार शेरों के लिए संरक्षित इलाकों के आसपास बड़े पैमाने पर चल रहे विकास कार्याें से भी उनके जीवन को ख़तरा पैदा हुआ है. फिर चाहे वे रेल नेटवर्क से जुड़ी परियोजनाएं हों या तटीय इलाकों में सड़क निर्माण की. औद्योगिक, खनन और बंदरगाहों की गतिविधियों से भी सिंहवंश के लिए जोख़िम बढ़ रहा है. अध्ययन में बताया गया है कि 2013 से 2015 के बीच 10 शेर तो ट्रेनों की चपेट में ही आकर जान से हाथ से धो बैठे थे.

दुबे के मुताबिक, ‘ऐसे तमाम कारण हैं जाे एशियाई सिंहों के पुनर्वास का मज़बूत आधार तैयार कर चुके हैं. इनका पुनर्वास अगर होता है तो यह वन्य जीव संरक्षण के प्रति भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के भी अनुरूप ही होगा. लेकिन राजनीतिक कारणों और शायद गुजरात की ब्रांड वैल्यू बनाए रखने की गरज़ से शेरों के जीवन को, उनकी प्रजाति को ख़तरे में डाला जा रहा है.’

शेरों को पुनर्वास मुश्किल क्यों साबित हो रहा है?

ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि एशियाई शेरों का पुनर्वास मुश्किल क्यों सबित हो रहा है. वह भी तब जबकि इसके पुख़्ता आधार और मज़बूत विकल्प मौज़ूद है. अदालती आदेश है. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति है, फिर भी? ज़वाब दुबे की बातों से मिलता है, ‘राजनीतिक कारण हैं. नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल से ही गुजरात ने कभी शेरों की पुनर्वास योजना पर सहमति नहीं दी. उसने यह योजना अटकाने के लिए सभी प्रयास किए. जितने कानूनी पेंच फंसा सकती थी, फंसाए. फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने उसके मनमुताबिक फैसला नहीं दिया. इसके बावज़ूद वह मामले को अटकाए हुए है. दूसरी तरफ मध्य प्रदेश सरकार भी राजनीतिक कारणों से ही हाथ पर हाथ धरे बैठी है. जबकि अदालत का आदेश ठीक तरह से लागू हो इसके लिए उसे अपनी तरफ से पहल करनी चाहिए थी.’

दुबे के मुताबिक, ‘केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अपनी देखरेख में शेरों के पुनर्वास का इंतज़ाम करना है. लेकिन वह भी क़दम पीछे खींच रहा है. इस तरह यह मामला सीधे-सीधे आपराधिक लापरवाही और राजनीतिक साज़िश का बनता है.’ केंद्र के एक अधिकारी भी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘शेरों की मौत की ख़बरें सामने आने के बाद सरकारी मशीनरी में थोड़ी हलचल ताे हुई है. लेकिन गंभीर प्रयासाें की कमी अब भी बनी हुई है.’ चेल्लम तो यहां तक सवाल उठाते हैं, ‘देश में कानून का शासन है भी या नहीं? अदालत ने पांच साल पहले आदेश दिया था. उसे लागू करने के लिए छह महीने का समय दिया था. फिर भी किसी सरकार ने इस पर ध्यान तक नहीं दिया. अभी हाल में ही अदालत की अवमानना संबंधित याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई थी. इससे भी किसी को कोई फर्क़ नहीं पड़ा.’

ग़ौरतलब है कि दुबे ने ही सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय पहले फिर याचिका दायर की थी. इसमें उन्होंने मांग की थी कि शीर्ष ‘अदालत के आदेश की अवहेलना करने के लिए गुजरात और केंद्र की सरकारों के ख़िलाफ सख़्त क़दम उठाया जाए.’ लेकिन तभी केंद्र सरकार ने फिर अदालत को ‘भरोसा’ दिया कि वह जल्द ही एशियाई सिंहों के पुनर्वास के लिए क़दम उठाएगी. इसके बाद दुबे की याचिका ख़ारिज़ कर दी गई.

और अब जो क़दम उठाए जाने की तैयारी है, वह देखिए कैसे हैं! द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसी शनिवार, छह अक्टूबर को जो ख़बर दी उसके मुताबिक गुजरात सरकार अब गिर के कुछ शेरों को पोरबंदर से लगे बरदा डूंगर अभयारण्य में ले जाने पर विचार कर रही है. मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर के अलावा यह दूसरी जगह है, जिसे एशियाई सिंहों की बसाहट के लिए अनुकूल पाया गया. गुजरात के वन एवं पर्यावरण मंत्री गनपत वसावा ने इसकी पुष्टि की है. उनके मुताबिक, ‘जल्द की बरदा-डूंगर अभयारण्य एशियाई शेरों की दूसरी बसाहट होगी.’

तो इसका दूसरा मतलब क्या यह भी लगाया जा सकता है कि जब तक ‘गुजरात की राजशाही’ क़ायम है, ‘जंगल का राजा’ इस राज्य से एक क़दम भी बाहर नहीं रख सकेगा? शायद ‘हां’ क्योंकि गुजरात के नए निज़ाम के मुखिया विजय रूपाणी ने इसी इतवार को फिर पुरानी ‘ज़िद’ को ही दोहराया है. उन्होंने साफ कहा है, ‘गिर का एक भी शेर गुजरात के बाहर नहीं भेजा जाएगा. उनकी दवा-दारू यहीं की जाएगी, गिर में ही. इन शेरों को जानलेवा सीडीवी से बचाने के लिए उसका टीका भी यहीं लगाया जाएगा.’