उत्तराखंड के राज्य बनने से पहले और राज्य बनने के बाद से राजनीतिक दलों ने उत्तराखंड के विकास के लिए कई माॅडल प्रचारित किए थे. इनमें उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश, आयुष प्रदेश और पर्यटन प्रदेश जैसे अनेक सपने शामिल थे. लेकिन विकास के ये सारे माॅडल उत्तराखंड के लिए कागजी या खोखले साबित हुए हैं. अलबत्ता इनके नाम पर उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों की पौ बारह जरूर हुई है. उत्तराखंड में सरकार कहने भर को है, वास्तविक कामकाज में या तो अफसरशाही की मनमर्जी चलती है या फिर चलता है बात बात में हाई कोर्ट का डंडा.

चूक किसी की, नुकसान किसी को

पर्यटन पर राज्य सरकारों की अस्पष्ट नीतियों और अफसरों के व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते पर्यटन से जुड़े मुद्दों पर हाल के दिनों में हाई कोर्ट के अनेक फैसलों ने पर्यटन से जुड़े कारोबारियों और इसके जरिए स्वरोजगार पा रहे युवाओं की उम्मीदों पर कुठाराघात किया है. कॉर्बेट नेशनल पार्क के प्रतिबंधों का मामला हो या नदियों में रिवर राफ्टिंग और अन्य साहसिक खेलों पर रोक लगाने का, इनका सीधा असर पर्यटन से जुड़े रोजगार पर पड़ा है. नैनीताल हाई कोर्ट के ये फैसले ऐसे हैं कि इनमें बदहाली के लिए जिम्मेदार प्रशासन और अफसरशाही को सजा मिलने के बजाय ऐसे लोगों को खामियाजा भुगतना पड़ा जो इस बदहाली के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं थे.

उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड के उच्च हिमालयी बुग्यालों (घास के मैदान) पर रात्रि निवास करने, टेंट लगाने और इसी तरह के अन्य प्रतिबंध लगाने वाला फैसले को ही लें. ‘आली बेदनी बाग्जी बुग्याल संरक्षण समिति’ नामक संस्था द्वारा 2014 में रूपकुंड और नन्दाराजजात यात्रा मार्ग में पड़ने वाले आली, बेदनी और बाग्जी बुग्यालों को बर्बादी से बचाने के लिए उत्तराखंड हाई कोर्ट नैनीताल में एक जनहित याचिका दायर की गई थी. इस याचिका में मुख्य रूप से इन तीन बुग्यालों में ट्रैकिंग और कमर्शियल पशु चरान पर रोक लगाने की मांग की गई थी. राज्य सरकार और वन विभाग की कमजोर पैरवी के चलते उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ट्रैकिंग के नियमों के बारे में सही पक्ष नहीं रखा जा सका. नतीजतन अदालत ने आली, बेदनी और बाग्जी सहित समूचे उत्तराखंड में उच्च हिमालयी बुग्यालों में रात्रि विश्राम पर रोक लगा दी.

21 अगस्त, 2018 के इस फैसले में इन बुग्यालों में 200 से अधिक पर्यटकों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई है. वहां कमर्शियल चरान चुगान को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है. अदालत ने छह हफ्तों में सभी इको सेंसटिव क्षेत्रों में इको डेवलेपमेंट कमेटियां गठित करके इन इलाकों में मौजूद सभी पक्के निर्माण हटाने और भविष्य में किसी तरह का सरकारी या निजी निर्माण न करने के भी निर्देश दिए हैं. सभी जिलाधिकारियों को बुग्यालों से प्लास्टिक की बोतलें और अन्य कचरा साफ करने के अलावा छह महीने में उत्तराखंड के इलाकों की वनस्पतियों का एक विस्तृत मैन्युअल बनाने तथा सभी प्रभागीय वन अधिकारियों को अपने अपने इलाकों की वनस्पतियों का हरबेरियम तैयार करने का भी निर्देश दिया गया. हाई कोर्ट ने छह महीने में सभी बुग्यालों को राष्ट्रीय पार्क या अभयारण्य में बदलने को भी कहा है.

अदालत के इस आदेश के बाद 27 अगस्त को उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) ने पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के वन अधिकारियों को पर्वतारोही दलों को बुग्यालों में रात्रि विश्राम न करने देने के आदेश जारी कर दिए. राजाजी टाइगर रिजर्व, नन्दा देवी बायोस्फेयर रिजर्व, नंदा देवी नेशनल पार्क, गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क और गोविन्द वन्य जीव विहार के अधिकारियों को भी यही आदेश दिए गए. अब वनाधिकारियों और सीधे कहें तो डीएफओ स्तर पर इस आदेश की आड़ में इस तरह के मनमाने नियम बनाये जा रहे हैं जिनका पालन बेहद मुश्किल है. इसके कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से घुमक्कड़ी के लिए उत्तराखंड आने वालों के लिए ऐसी स्थितियां बन रही हैं कि उनके लिए ट्रैकिंग कर पाना असम्भव होने लगा है.

स्थानीय कारोबारियों की मुश्किल

स्थानीय स्तर पर जो लोग पर्यटकों के लिए इंतजाम करते हैं उनके सामने भी असंभव को संभव बना पाने की लाचारी है. प्रभागीय वन अधिकारियों की अनुमति अब किसी भी ट्रैकिंग दल के लिए जरूरी बना दी गई है. इसके लिए मेडिकल प्रमाण पत्र, मौसम विभाग का एनओसी, आधार की फोटोकाॅपी, इस पर ट्रैकिंग करने वाले के हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर और पांच हजार रुपये का बैंक ड्राफ्ट जरूरी है. इस बात की ‘अंडरटेकिंग’ भी देनी होगी कि अगर ट्रैकर को कुछ हो जाए तो जिम्मेदारी स्थानीय एजेंसी की होगी. यह भी कि अगर बुग्याल में कैंपिंग करते हुए पकड़े गए तो डेढ़ लाख रुपये का जुर्माना देना होगा. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस तरह की औपचारिकताओं के बारे में शासनादेश में कोई जिक्र नहीं है.

राज्य के मुख्य वन संरक्षक के जिस पत्र में वनाधिकारियों को बुग्यालों में रात्रि विश्राम को रोकने का आदेश दिया गया उसी में ट्रैकिंग मार्गों में बुग्यालों के बजाय अन्य स्थानों में वैकल्पिक कैम्पिंग स्थलों का चयन करने का भी निर्देश दिया गया था. लेकिन ट्रैकिंग पर प्रतिबंध लगाने में नए नए नियम बनाने वलो वन अधिकारी अब तक ऐसा कुछ भी नहीं कर पाए हैं जबकि इस वर्ष का ट्रैकिंग सीजन अब कुछ ही दिनों में खत्म होने वाला है. हाई कोर्ट की आड़ में वन विभाग की मनमानी पाबंदियों के कारण उत्तराखंड में ट्रैकिंग के लिए आने वाले छोटे दलों के लोगों की बहुत समस्याएं होने लगी हैं. अनेक घुमक्कड़ों ने अपनी यात्राएं स्थगित कर दी हैं या वे ऐसे स्थानों में जा रहे है जहां होटल और अन्य आवासीय इंतजाम मौजूद हैं.

उत्तराखंड में साहसिक खेलों में स्थानीय भागीदारी के प्रबल समर्थक और एडवेंचर स्पोट्र्स विशेषज्ञ डाॅ. सुनील कैंथोला कहते हैं, ‘यह न्यायालय के आदेश के पालन का मुददा नहीं है. मुद्दा यह है कि इसकी आड़ में डीएफओ स्तर पर जो कुछ किया जा रहा है वह स्थानीय साहसिक पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ने की सोची-समझी साजिश का हिस्सा लग रहा है.’

मुश्किलें और भी

इस समस्या का एक पहलू और भी है. उत्तराखंड में साहसिक पर्यटन का संचालन दो अलग-अलग स्तरों पर होता है. एक स्तर पर स्थानीय संचालक और छोटी एजेंसियां हैं जो व्यक्तिगत सम्बंधों और अपनी सेवाओं से कमाई हुई साख के कारण अपना कारोबार करती हैं. दूसरे स्तर पर वे बड़ी ट्रैवल एजेंसियां है जो अपने व्यापक नेटवर्क के बूते ट्रैकर्स को आकर्षित करती हैं. नए नियमों की मार स्थानीय स्तर पर काम कर रहे लोगों पर ही पड़ रही है क्योंकि एक बार उनके पास जोशीमठ, मुंस्यारी या उत्तरकाशी पहुंच चुके घुमक्कड़ों को जब नियमों के कारण अपना कार्यक्रम खटाई में पड़ता दिखता है तो उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता. अनेक ऐसे दलों ने तो उत्तराखंड में नये नियमों के कारण अपने कार्यक्रम ही रद्द कर दिए हैं. स्थानीय एजेंसियों को इसके कारण आर्थिक हानि भी हो रही है जबकि बड़ी एजेंसियों ने अपने व्यापक नेटवर्क के बूते उत्तराखंड आने वाले सभी लोगों को नए प्रतिबंधों के बाद हिमाचल प्रदेश या अन्य इलाकों में भेजना शुरू कर दिया है. यानी उत्तराखंड को राजस्व के मोर्चे पर भी चपत लग रही है.

हाई कोर्ट की रोक और उसके बाद की परिस्थितियों में बड़े ऑपरेटरों और स्थानीय छोटी एजेंसियों के बीच हितों का टकराव भी दिखने लगा है. इंडिया हाईक्स जैसे बड़े आपरेटर हाई कोर्ट के प्रतिबंधों का तो विरोध कर रहे हैं, लेकिन वे इसके लिए स्थानीय छोटी एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. उनका कहना है कि वे बड़े दल लेकर जाते हैं और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं. वे यह भी दावा करते हैं कि जिन इलाकों में वे ट्रैकिंग कराते हैं, वहां के स्थानीय लोगों के बीच वे जागरूकता कार्यक्रम भी चलाते हैं.

इसके विपरीत छोटे कारोबारी बुग्यालों की बर्बादी के लिए बड़े दलों को दोषी मानते हैं. उनका आरोप है कि बड़ी एजेंसियां एक ही मार्ग पर आठ-दस दिनों तक लगातार बड़ी संख्या में ट्रैकरों को भेजती हैं. उनके मुताबिक इसके लिए स्थाई टेंट कालोनियां बना दी जाती हैं और किचन के लिए पक्के निर्माण कर दिए जाते हैं जिससे बुग्यालों के पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. जबकि स्थानीय समूह आठ-दस से ज्यादा संख्या वाले दल नहीं ले जाते और अपने ट्रैकरों को न सिर्फ पर्यावरण बल्कि लोक मान्यताओं का पालन करना भी सिखाते हैं. गढ़वाल हिमालयन ट्रैकिंग एंड माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के संयोजक जयेंद्र सिंह राणा मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहते हैं, ‘इससे हजारों लोगों की रोजी रोटी छिन सकती है. यह स्थानीय लोगों के जीने के अधिकार पर हमला है.’

यह तो सही है कि जिनके बड़े दल बुग्यालों में जाएंगे उतना ही बुग्यालों की सेहत खराब होगी. 2014 की नंदा राज जात यात्रा को जिस तरह हिमालय का कुंभ कह कर प्रचारित किया गया था उसके कारण उस लोकयात्रा ने एक तबाही का रूप ले लिया था. इसके चलते पूरे यात्रा मार्ग में उच्च हिमालयी क्षेत्र में अनेक पक्के निर्माण कराए गए थे और यात्रा के बाद समूचे यात्रा मार्ग में प्लास्टिक और अन्य कचरे के ढेर लग गए थे.

अदालती आदेश का उल्टा असर भी हो सकता है

लेकिन अदालत के आदेश से स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ सकती है. अदालत के सामने ऐसा कोई प्रमाणिक सर्वेक्षण नहीं रखा गया था जो यह बताता हो कि ट्रैकिंग से पर्यावरण बुग्यालों को कितनी क्षति पहुंच रही है. अदालत ने वन्यता के संरक्षण की बात तो की है मगर बुग्यालों पर प्रतिबंध लगाते समय इस बात को ध्यान में नहीं रखा कि केदारनाथ वन्य जीव विहार, फूलों की घाटी नेशनल पार्क और गंगोत्री नेशनल पार्क जैसे विशिष्ट इलाकों में भयंकर शोर करनेे वाले हेलीकाॅप्टरों की उड़़ानों को पर्यटन विकास के नाम बेरोकटोक उड़ान भरने की इजाजत क्यों दी जा रही है. फूलों की घाटी में पशु चरान और कैंपिंग प्रतिबंधित है क्योंकि यह अति संवेदनशील इको सिस्टम वाले इलाके माने जाते हैं. लेकिन बड़ी कंपनियों को यहां गोविन्दघाट से घांघरिया तक हेलीकाॅप्टर से यात्रियों को पहुंचाने की छूट है. जबकि पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि इन हिमालयी क्षेत्रों में हेलीकाॅप्टर की उड़ानों से पैदा होने वाला कंपन और तेज शोर पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचाता है. लेकिन राज्य सरकार के पास न तो चीजों को समझने का संवेदनशील रवैया है और न ही छोटे आर्थिक लाभों को छोड़ सकने का माद्दा. इसलिए उत्तराखंड में पैसे से नीतियों को अपने हक में मोड़ना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं.

हाई कोर्ट के सामने अगर सही से बात रखी जाती तो ट्रैकिंग व्यवसाय भी चल सकता था और बुग्याल भी बचाये जा सकते थे. पूर्ण प्रतिबंध के बजाय अनियमित ट्रैकिंग को नियंत्रित करने के नियम बनाए जा सकते थे. सिक्किम में कंचनजंघा कंजरवेशन कमेटी ट्रैकिंग व्यवसाय को नियंत्रित करती है. स्थानीयता के अनूकूल नियमों से ट्रैकिंग का संचालन होता है और यही वजह है कि ट्रैकर्स की बड़ी संख्या होने के बावजूद वहां गंदगी नहीं दिखती. इसी तरह नेपाल में एवरेस्ट बेस कैम्प रूट से लेकर हर ट्रैकिंग रूट में होटलों को ‘टी हाउस’ व्यवस्था के तहत नियोजित किया जाता है. इसलिए न तो रास्ते में कहीं गंदगी दिखती है और न ही टी हाऊसों में ही. उत्तराखंड के लिए भी ऐसा ही कोई रास्ता निकाला जाना चाहिए.

कुल मिलाकर हाई कोर्ट में सरकार की लचर पैरवी से राज्य को कई मोर्चों पर नुकसान हुआ है. स्थानीय उद्यमियों के कारोबार पर संकट है, साहसिक पर्यटन के जरिये स्वरोजगार पा रहे युवाओं के भविष्य पर संकट है और राज्य को राजस्व की जो चपत लग रही है वह तो है ही.

अू पर्यटन व्यवसाइयों ने सरकार से मांग की है कि वह हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करे ताकि स्थानीय युवाओं के रोजगार पर रोक खत्म हो. वैसे भी स्थानीय जनता को भागीदार बना कर ही बुग्यालों को बचाया जा सकता है क्योंकि स्थानीय समाज बुग्यालों को देवताओं के चरागाह मानकर उन्हें पूज्यनीय और सम्माननीय मानता है.