2014 तक नादिया मुराद उत्तरी इराक में बसे अपने गांव कोजो में आम जिंदगी जी रही थीं. वे जिस यजीदी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं उसका यह इलाका गढ़ हुआ करता था. दिन शांति से कट रहे थे.

लेकिन 2014 में सब बदल गया. सीरिया की सीमा से लगे इस इलाके में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के जड़ें जमाने के साथ ही इस समुदाय के बुरे दिन शुरू हो गए. उसी साल अगस्त के एक दिन काले झंडे लगे जिहादियों के ट्रक गांव में धड़धड़ाते हुए घुस आए. उन्होंने सभी पुरूषों की हत्या कर दी और बच्चों को लड़ाई में झोंकने और महिलाओं को यौन दासी बनाने के लिए अपने कब्जे में ले लिया .

25 साल की नादिया भी इन महिलाओं में से एक थीं. पकड़ने के बाद आतंकवादी उन्हें मोसुल ले गए. मोसुल आईएस की स्वघोषित खिलाफत (धर्मराज्य) की राजधानी थी. दरिंदगी की हदें पार करते हुए आतंकवादियों ने उनसे लगातार सामूहिक दुष्कर्म किया. इस दौरान उन्हें तमाम यातनाएं दी गईं. लेकिन एक दिन वे किसी तरह आतंकियों के चंगुल से निकल भागीं.

शुक्रवार को इन्हीं नादिया मुराद को इस साल शांति का नोबेल दिए जाने का ऐलान हुआ है. जिहादियों की गुलाम से नोबेल के हकदार होने का नादिया का यह सफर असाधारण है.

संयुक्त राष्ट्र में अपनी कहानी सुनाते हुए नादिया ने बताया कि जिहादी महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए बाजार लगाते थे और यजीदी महिलाओं पर धर्म बदल कर इस्लाम अपनाने का भी दबाव बनाते थे. हजारों यजीदी महिलाओं की तरह मुराद का एक जिहादी के साथ जबरदस्ती निकाह कराया गया. उन्हें मेकअप करने और चुस्त कपड़े पहनने के लिए मारा-पीटा भी गया.

अपने ऊपर हुए अत्याचारों से परेशान नादिया मुराद लगातार भागने की फिराक में रहती थीं. आखिरकार मोसुल के एक मुस्लिम परिवार की सहायता से वे भागने में कामयाब रहीं. गलत पहचान पत्रों के जरिए वे इराकी कुर्दिस्तान पहुंची और वहां राहत शिविरों में रह रहे यजीदियों के साथ रहने लगीं. यहीं उन्हें पता चला कि उनके छह भाइयों और मां को कत्ल कर दिया गया है. इसके बाद नादिया यजीदियों के लिए काम करने वाले एक संगठन की मदद से अपनी बहन के पास जर्मनी चली गईं.

आज नाजिया मुराद और उनकी मित्र लामिया हाजी बशर तीन हजार लापता यजीदियों के लिए संघर्ष कर रहीं हैं. माना जा रहा है कि ये अभी भी आईएस के कब्जे में हैं. दोनों को 2016 में यूरोपीय संघ का प्रतिष्ठित शाखारोव पुरस्कार दिया जा चुका है. नादिया मुराद मानव तस्करी के पीड़ितों के लिए संयुक्त राष्ट्र की सद्भावना दूत यानी गुडविल एंबेसडर भी हैं.

नादिया कहती हैं, ‘आईएस के लड़ाके हमारी इज्जत छीनना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अपनी इज्जत खो दी.’