हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की नई मुख्य अर्थशास्त्री चुना गया है. भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राज के बाद वे दूसरी भारतीय और दुनिया की पहली महिला हैं जो इस पद को संभालेंगी. लेकिन भारत में यह जानने में लोगों की रुचि कम है कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए गीता ने क्या किया है. उनकी रुचि यह जानने में ज्यादा है कि आईएमएफ की नई मुख्य अर्थशास्त्री की जाति क्या है. इसका पता इस बात से चल सकता है कि अगर हम गूगल पर ‘Gita Gopinath’ टाइप करें तो सर्च बॉक्स में ‘Gita Gopinath Caste’ अपने आप ही सामने आ जाता है. गूगल ट्रेंड पर भी देखा जा सकता है कि दो अक्टूबर के बाद एक समय ऐसा भी आया जब गूगल पर उनकी जाति के बारे में सबसे ज्यादा सर्च किया जा रहा था.

ग्राफ का आंकड़ा 100 होने का मतलब है कि किसी चीज को गूगल पर सबसे ज्यादा खोजा गया है
ग्राफ का आंकड़ा 100 होने का मतलब है कि किसी चीज को गूगल पर सबसे ज्यादा खोजा गया है

यह पहली बार नहीं है जब किसी व्यक्ति (ख़ास तौर पर महिला) की उपलब्थि पर लोगों ने उसकी जाति जानने की कोशिश की हो. हाल के समय में यह चलन बढ़ा है. गीता गोपीनाथ से पहले महिला धावक हिमा दास की जाति को लेकर भी लोगों ने काफ़ी खोजबीन की थी. बीती जुलाई में उन्होंने अंडर-20 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता था. उसके तुरंत बाद गूगल पर उनकी जाति खोजी जाने लगी थी. इसके बाद सोशल मीडिया पर हिमा दास के बारे में जो दो बातें शेयर की गईं. एक में हिमा दास को दलित समाज की प्रतिभा का प्रतीक बताया गया, वहीं, दूसरे में दावा किया गया कि देश का नाम ऊंचा करने के बाद भी हिमा दास को दलित होने की वजह से उचित सम्मान नहीं दिया गया. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी शख्सियतों की जाति जानने के पीछे किस तरह की सोच काम करती है.

हिमा दास से भी पीछे जाएं तो उनसे पहले बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु की जाति खोजे जाने की ख़बर ने भी ख़ूब सुर्ख़िया बटोरी थी. रियो ओलंपिक के अपने फ़ाइनल मैच में जब वे भारत को स्वर्ण पदक दिलाने की कोशिश कर रही थीं, उसी समय देश में उनकी जाति का भी पता लगाया जा रहा था. बाद में भी अलग-अलग जाति के लोग उन्हें लेकर तरह-तरह के दावे करते रहे.

खेलों के मामले में पीवी सिंधु और हिमा दास अकेले उदाहरण नहीं हैं. आप सोशल मीडिया पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि कैसे खिलाड़ियों को जातीय प्रतिभा का प्रतीक बता कर लोग अपने समाज को ‘सर्वश्रेष्ठ’ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. उदाहरण के लिए क्रिकेटर कुलदीप यादव और केदार जाधव को लेते हैं. यादव समाज भारतीय क्रिकेट टीम के इन दोनों खिलाड़ियों पर इसलिए गर्व कर रहा है क्योंकि वे यदुवंशी हैं. उनके मुताबिक़ दूसरे समाज के लोग यदुवंशियों से जलते हैं, क्योंकि उन्होंने खेल से लेकर जंग के मैदान तक हर प्रकार से देश के लिए योगदान दिया है.

ये उदाहरण और ट्रेंड भारत के नए मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई के उस बयान को सही साबित करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि समाज जाति, धर्म और विचारधारा को लेकर जितना आज बंटा हुआ है, उतना पहले कभी नहीं बंटा. बता दें कि जाति की यह खोज जस्टिस गोगोई तक भी जाती है. 13 सितंबर को नियुक्त किए जाने के बाद जस्टिस गोगोई ने बीती तीन अक्टूबर को सीजेआई के पद की शपथ ली है. अगर गूगल ट्रेंड को देखें तो इन दो तारीखों के आसपास लोगों ने उनकी भी जाति को जानने की जमकर कोशिश की. फ़ेसबुक-यूट्यूब पर भी उनकी जाति से संबंधित कई पोस्ट और वीडियो शेयर किए गये हैं.

ग्राफ का आंकड़ा 100 होने का मतलब है कि किसी चीज को गूगल पर सबसे ज्यादा खोजा गया है
ग्राफ का आंकड़ा 100 होने का मतलब है कि किसी चीज को गूगल पर सबसे ज्यादा खोजा गया है

यह बात हैरान करती है कि अगड़े और पिछड़े दोनों ही समाज के लोग अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से जातिवाद की आलोचना तो करते हैं, लेकिन ख़ुद उससे मुक्त होने की इच्छाशक्ति कभी नहीं दिखाते. इसके बजाय वे ऐसी ख़बरें खोजते हैं जो या तो उनकी जाति के किसी व्यक्ति की उपलब्धि से संबंधित हों, या फिर उसके साथ कुछ ग़लत हुआ हो. ऐसा करके कोई व्यक्ति यह साबित करने की कोशिश करता है कि अगर कहीं कुछ अच्छा है तो उसकी जाति में है, या किसी के साथ कुछ ग़लत हो रहा है तो उसी की जाति के साथ हो रहा है. इस कोशिश में संबंधित व्यक्ति की जाति पता चले या न चले, यह ज़रूर पता चल रहा है कि 21वीं सदी में भी हम भारतीयों को जाति इतनी प्रिय है कि इसके अलावा हमें और कुछ दिखाई नहीं देता.