राहुल गांधी सरकार से रफाल डील का सच जानना चाह रहे हैं. ऐसे में आप सही जवाब देने के बजाय, उनसे पुरानी रफाल डील पर सवाल क्यों कर रहे हैं?

ये नया-पुराना क्या होता है! रफाल वही है और रफाल देने-लेने वाले भी वही हैं. आज राहुल गांधी के पेट में दर्द हो रहा है क्योंकि इस डील के बाद से उनके जीजा यानी कांग्रेस के अघोषित उपाध्यक्ष ने रो-रो के घर भर दिया है ‘हाय हुसैन हम क्यों न हुए...यदि अनिल अंबानी के साथ ही सौदा करना था, तो हम क्या बुरे थे..’ मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि रफाल गांधी...अ अ मतलब कि राहुल जी की इस सौदे में आज इतनी दिलचस्पी यह जानने के लिए नहीं है कि 450 करोड़ रुपये के विमान की कीमत 1600 करोड़ कैसे हो गई. उनकी दिलचस्पी सिर्फ यह जानने में है कि वो क्या ट्रिक रही जिसके चलते सौदा अनिल अंबानी को मिल सका, लेकिन एनडीए के समय में रॉबर्ट वाड्रा को नहीं मिल पाया! मैं राहुल गांधी को बताना चाहता हूं कि इस देश में दूसरे उद्योगपतियों को भी कारोबार करने का उतना ही हक है जितना रॉबर्ट वाड्रा को है.

संबित जी, आप मुद्दे से भटक रहे हैं.

मैं मुद्दे पर रहता ही कब हूं जो भटकूंगा! आप लोग तो नहीं भटकते हैं न. मुझे बताइए कि आपकी ऐसी क्या उपलब्धि है जो मेरी नहीं है. आपके शो में आकर मैं आप लोगों से ज्यादा बोल लेता हूं...और क्या चाहिए! (मुस्कुराते हुए)

आखिर रफाल डील का सच क्या है?

आप कितने लोगों से अलग-अलग रफाल का सच पूछती रहेंगी. इसके पहले आप फ्रांस्वा ओलांद से भी यही सवाल पूछ चुकी हैं. सत्य बदलता नहीं है, वह एक ही है... सत्य शिव है, सुंदर है, शाश्वत है.

पर वो है क्या?

(खीजते हुए) सत्य यह है कि अनिल अंबानी रॉबर्ट वाड्रा से ज्यादा अच्छे डीलर निकले! रॉबर्ट वाड्रा को देशभर में सस्ती जमीनें खरीदने में महारत हासिल है, इसका मतलब यह नहीं कि वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी डील करना भी जानते हों. और दूसरी बात यह है कि जब कांग्रेस ने आज तक बोफोर्स का सच नहीं बताया, तो हम रफाल का सच बताकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारें?

अच्छा इसे छोड़िए. यह बताइए कि पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों के बारे में आप क्या कहेंगे?

आप लोगों की दिक्कत क्या है आखिर...किसी चीज के आसमान छूने पर तो खुश होना सीखिए आप लोग. यह मोदी जी का फिटनेस चैलेंज देने का तरीका है कि लोग कार की विलासिता छोड़कर पैदल और साइकल से चलना सीखें!

लेकिन आम लोगों को बढ़ती कीमतों से जो इतनी परेशानी हो रही है, उस बारे में आपका क्या कहना है?

देखिए, ऐसा है कि पिछले सात दशकों से कांग्रेस राज में परेशान रहते हुए जनता का मानस स्थाई रूप से परेशान रहने वाला हो गया है. हमारी जनता इतने अवसाद में जा चुकी है कि वह अब न किसी चीज की कीमत कम होने पर खुश हो पा रही है, न कीमत बढ़ने पर ही! यही कारण है कि वे रुपये की कीमत कम होने पर भी दुखी हैं और डीजल पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर भी! ये ‘कांग्रेस इफेक्ट’ है... लोग खुश रहना भूल चुके हैं. इसीलिए हमारी सरकार ने नारा दिया था कि ‘अच्छे दिन आएंगे’. हम चाहते हैं कि चाहे जो हो जाए, लोग खुश रहें. लोग यदि खुश नहीं रहेंगे तो स्वस्थ भी नहीं रहेंगे. बिना खुश रहे तो ‘आयुष्मान भारत’ जैसी दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना का परिणाम भी सही नहीं आएगा! और यही तो कांग्रेस चाहती है.

क्या आपको लगता है कि देश में अच्छे दिन आ गए हैं?

कांग्रेस के 71 साल के शासन के बाद भी भारत में अच्छे दिन नहीं आ सके और हमसे आप पांच सालों में ही ये उम्मीद कर रही हैं! यह तो बड़ी नाइंसाफी है. आएंगे, सबके अच्छे दिन आएंगे ...लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि हमारी सरकार ने इस दिशा में जरा भी काम नहीं किया. आखिर अंबानी, अडानी, नीरव मोदी और माल्या के अच्छे दिन आए ही हैं न... 2023-24 तक कुछ और लोगों के भी अच्छे दिन आ ही जाएंगे.

संबित जी, आपने किस आधार पर कहा था कि पाकिस्तान राहुल गांधी का समर्थन कर रहा है और उन्हें ही प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहता है?

आप आधार पर अभी भी सवाल कैसे उठा सकती हैं. अब तो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी आधार की कानूनी वैधता पर अपनी मोहर लगा दी है.

संबित जी, मेरा सवाल कुछ और है.

मैं वहीं आ रहा हूं...असल में आधार का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो जाते हैं और मेरी वाणी स्वतः ही ‘आधार-गान’ में लिप्त हो जाती है...आप समझ नहीं रही हैं, कांग्रेस ने भारत के दो टुकड़े करके पाकिस्तान बनाया ही इसलिए था कि कल को बुरे वक्त में वह कांग्रेस को सपोर्ट कर सके! आज कांग्रेस के सामने वह बुरा वक्त आ चुका है क्योंकि भारत में तो किसी पार्टी के साथ उनका गठबंधन संभव हो नहीं पा रहा. ऐसे में कांग्रेस को यदि इमरान खान की ‘पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी’ के साथ गठबंधन करके भी कहीं जीत हासिल होती हो तो राहुल गांधी उससे भी पीछे नहीं हटेंगे!...और पाकिस्तान भला उस पार्टी की मदद क्यों नहीं करेगा जिसके पुरखों के कारण वह दुनिया का नक्शे पर आया!

आखिर आप राहुल गांधी का नाम बार-बार पाकिस्तान से क्यों जोड़ रहे हैं?

देखिए, भाजपा की जीत के दो ही मंत्र हैं. एक राम मंदिर, दूसरा पाकिस्तान. राम मंदिर से तो मैं राहुल गांधी का नाम जोड़ नहीं सकता, फिर बचा ही क्या! पाकिस्तान.

आपने यह भी कहा था कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए राहुल गांधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन कर रहे हैं. आखिर आप कहना क्या चाहते हैं?

भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए कांग्रेस को देश में ही अन्य कई विपक्षी पार्टियों के साथ गठबंधन करना पड़ रहा है. फिर ऐसे में ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ को परास्त करने के लिए तो धरती के कोने-कोने से उन्हें मदद लेनी ही पड़ेगी. और इस तरह की मदद को अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ही कहा जाएगा. पर विडंबना यह है कि व्यक्तिगत गठबंधन के अनुभव के बिना राहुल जी को सीधे अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है. (व्यंग्य से हंसते हुए)

आपके मुताबिक भाजपा जवाब देने में पीछे नहीं रहती, लेकिन पिछले चार सालों के दौरान प्रधानमंत्री जरूरी सवालों पर चुप्पी साधते रहे हैं. जहां पीएम को बोलना चाहिए वहां प्रवक्ता बोलते हैं. जहां प्रवक्ता को बोलना चाहिए वहां मंत्री! ऐसा क्यों?

देखिए, भाजपा उस तरीके में विश्वास नहीं करती जो कांग्रेस ने पिछले 71 सालों से देश पर थोपा हुआ था कि बोलने का हक बस एक परिवार के पास रहे. भाजपा में प्रधानमंत्री और कार्यकर्ता सभी बराबर हैं. यहां हर किसी को बोलने का हक़ है, भले ही वो कितना भी अनाप-शनाप बोले, अंट-शंट बोले. प्रधानमंत्री जी चुनावी सभा में इतिहास का कोई जरूरी मुद्दा उठा रहे होते हैं या किसी को टंग-ट्विस्टर का चैलेंज दे रहे होते हैं तो महत्वपूर्ण मसले पर हम बोल देते हैं. प्रवक्ता के कहने वाली किसी बात से अगर कुछ वोट आने वाले होते हैं तो चुनावी सभा में पीएम साहब बोल देते हैं. यही लोकतंत्र की खूबसूरती है.