भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए रेपो रेट (आरबीआई द्वारा बैकों को दिये जाने वाले कर्ज की ब्याज दर) और रिवर्स रेपो रेट (बैंकों द्वारा आरबीआई को दिये जाने वाले धन पर मिलने वाले ब्याज की दर) में कोई बढोत्तरी नहीं की. ज्यादातर आर्थिकों जानकारों का मानना था कि रिजर्व बैंक इस बार अपनी द्वैमासिक समीक्षा बैठक में ब्याज दरों को 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाने का फैसला करने जा रहा है. लेकिन शुक्रवार को आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल ने जब यह घोषणा की कि केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत दरों - रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट - में कोई बदलाव नहीं कर रहा है तो इसने आर्थिक विशेषज्ञों के साथ-साथ बाजार को भी चौंका दिया. भारतीय मुद्रा बाजार का अनुमान था कि रेपो रेट बढ़ाकर आरबीआई बाजार में रूपये की आपूर्ति कम करेगा और डॉलर के मुकाबले इसकी सेहत कुछ सुधरेगी. लेकिन एमपीसी ने ऐसा नहीं किया. तो क्या यह माना जाए कि आरबीआई की प्राथमिक चिंता सिर्फ महंगाई है और उसने रुपये और बाजार को उनके हाल पर छोड़ दिया है?

आरबीआई की एमपीसी बैठक के समीक्षा नतीजों पर बात करने से पहले उन अार्थिक विशेषज्ञों के अनुमान की बात करते हैं, जिन्होंने पूरी संभावना जताई थी कि आरबीआई अपनी ब्याज दरों में बढोत्तरी करेगा. यह अनुमान मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर थे. पहला कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और दूसरा कमजोर रूपया. एमपीसी बहुत बार अपने फैसलों से साफ कर चुकी है कि उसकी मौद्रिक नीति तेल और रूपये से नहीं बल्कि महंगाई से नियंत्रित होती है. लेकिन फिर भी तेल की बढ़ीं कीमतें और रूपये में गिरावट का तर्क इसलिए मजबूत था कि क्योंकि आखिरकार ये दोनों चीजें भी महंगाई पर ही असर डालती हैं.

तेल की बढ़ती कीमतें हर चीज को महंगा करती है और गिरता हुआ रूपया भी उत्पादन लागत और आयात की गई वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाता है. इसलिए माना जा रहा था कि भविष्य़ में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई रेपो दर बढाएगा. वित्तीय बाजार के जानकारों की मुख्य चिंता कमजोर रुपया है और उन्हें उम्मीद थी कि महंगाई को काबू में रखने के लिए बढ़ाई गई ब्याज दरें अाखिरकार रुपये की सेहत भी सुधारेंगी.

लेकिन महंगाई की आशंका के चलते ब्याज दरें बढने और उससे रूपये के सुधरने की उम्मीद को इसलिए झटका लगा क्योंकि महंगाई पर विशेषज्ञों और एमपीसी के अनुमान अलग-अलग हैं. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ मान रहे थे कि बढ़ती तेल कीमतों को देखते हुए आरबीआई महंगाई के अनुमान को बढ़ाएगी, लेकिन उसने 2018-19 की दूसरी छमाही में अपने महंगाई के अनुमान को घटा दिया. आरबीआई ने इस दौरान महंगाई के 4.8 फीसद से घटकर 3.9 से 4.5 फीसदी के बीच रहने की उम्मीद जताई है.

आरबीआई का यह अनुमान इस बात पर अाधारित है कि खाद्य पदार्थों की महंगाई फिलहाल नियंत्रण में है और अच्छे मानसून के चलते कृषि उत्पादों के दाम अागे भी नियंत्रण में रहने की संभावना है. इसके अलावा अांकड़ों के मुताबिक अगस्त में महंगाई दर साल के सबसे निम्नतम स्तर (3.69 फीसदी) पर थी और औद्योगिक उत्पादन में भी सुधार हुआ था. जाहिर है इन आंकड़ों और संभावनाओं में आरबीआई को फिलहाल महंगाई बढ़ती नहीं दिख रही है. और इसीलिए उसने रेपो रेट न बढाने का फैसला लिया.

आर्थिक जानकारों की चिंतायें

लेकिन रिजर्व बैंक के इस अाकलन पर कई अर्थ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं. जानकारों का कहना है कि केवल खाद्य पदार्थों की कीमत के अाधार पर महंगाई का अाकलन करना ठीक नहीं है. कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ रही हैं और इसके आगे भी बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता जो आखिरकार महंगाई पर ही असर डालेगी. इसके अलावा रूपये की लगातार घटती कीमत उत्पादन लागत बढ़ाएगी और इसका असर कोर महंगाई (ईंधन और खाद्य वस्तुओं को घटाकर निकाले जाने वाली महंगाई) पर भी पड़ेगा. जानकारों का कहना है कि अगर महंगाई पर काबू ही एमपीसी का एकमात्र मकसद है तो भी ब्याज दरें बढनी चाहिए थीं. तेल और गिरते रुपये के अलावा सरकार ने अभी कुछ दिन पहले ही गेहूं समेत कई फसलों के समर्थन मूल्य में 21 फीसद तक की बढोत्तरी की है. अाने वाले समय में इसकी वजह से भी न केवल खाद्य पदार्थों बल्कि दूसरी चीजों की कीमत बढ़ सकती है. दूसरी चीजों की इसलिए क्योंकि फसलों का दाम ज्यादा मिलने से किसानों के हाथों में पहले से ज्यादा पैसा होगा और इससे भी महंगाई बढ़नी ही बढ़नी है.

अर्थव्यवस्था के जानकार आरबीआई के आकलन से भले इत्तेफाक न रखते हों, लेकिन अर्थव्यवस्था के व्यापक पहलुओं पर आरबीआई की नजर नहीं है एेसा नहीं कहा जा सकता है. ब्याज दर में बढोत्तरी न करने के फैसले में भले ही इसकी झलक न मिलती हो, लेकिन आरबीआई ने अर्थव्यवस्था को लेकर अपने रुख (स्टांस) में बदलाव जरुर किया है. पिछली दो एमपीसी की बैठक में ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाए गए लेकिन आरबीआई की गाइडलाइन न्यूट्रल रही. पर इस बैठक में उसने अपने रूख में ‘कैलीब्रेटेड टाइटनिंग’ की है. इसका मतलब है कि फिलहाल आरबीआई यथास्थिति रखते हुुुुए ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति पर चल रहा है. लेकिन आगे वह सख्त नीतिगत हस्तक्षेप कर सकता है.

जानकार इस रूख का संकेत यह मान रहे हैं कि आरबीआई को भी तेल की बढ़ी हुई कीमतों और गिरते हुए रूपये से महंगाई के प्रभावित होने की आशंका है. एमपीसी की बैठक के बाद प्रेस कान्फ्रेंस में भी आरबीआई ने ऊंची तेल कीमतों से महंगाई के अागे प्रभावित होने की आशंका जताई. उसके इस सधे हुए सख्त रूख से साफ है कि एमपीसी की अगली बैठक में महंगाई के मौजूदा आकलन के बावजूद ब्याज दरें बढाने का फैसला लिया जा सकता है.

लेकिन रूपये और बाजार का क्या?

लगातार गिरते रुपये के बीच भी ब्याज दर न बढ़ाकर आरबीआई ने साफ कर दिया कि रुपये की विनिमय दर को संभालना उसका काम नहीं है. रुपये की लगातार गिरती कीमत पर आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि दुनिया भर की मुद्राओं के साथ एेसा हो रहा है और अन्य मुद्राओं की तुलना में रूपया डॉलर के मुकाबले कम गिरा है. लेकिन यह बात बाजार को आशवस्त करने वाली नहीं लगती. रुपया एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन चुकी है और अगर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं से तुलना करें तो भारतीय मुद्रा तुर्की के लीरा ( जो 40 फीसद गिरा है) और अर्जेंटीना के पेसो ( जो 50 फीसद गिरा है) से ही बेहतर दिखती है.

आरबीआई का मानना है कि रुपये के कमजोर होने से निर्यात पर अच्छा असर पड़ा है. आरबीआई के वक्तव्य से लगता है कि वह इसी रास्ते रूपये में सुधार की उम्मीद देख रहा है. कि निर्यात बढ़ेगा तो रुपये की मांग बढ़ेगी और फिर डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत भी. लेकिन शुक्रवार को मौद्रिक समीक्षा के नतीजे अाते ही रुपया फिर से गिरकर डॉलर के मुकाबले 74 रूपये के पार पहुंच गया. मुद्रा बाजार में मची इस उथल-पुथल ने शेयर बाजार को भी 700 अंक से ज्यादा लुढ़का दिया.

सामान्य तौर पर बाजार, ब्याज दरें नहीं बढ़ने जैसे फैसलों का स्वागत करता है. इसे एक सकारात्मक संकेत माना जाता है क्योंकि सस्ते कर्ज के कारण पैसे की उपलब्धता बनी रहती है. लेकिन इस मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दर न बढ़ने से शेयर बाजार भरभरा गया. इसकी वजह है कि बाजार को इस समय नगदी के प्रवाह से ज्यादा रुपये की सेहत की चिंता है. एचडीएफसी बैंक के मुख्य़ अर्थशास्त्री अभीक बरूआ इकनॉमिक टाइम्स से बातचीत में कहते हैं, ‘रेपो रेट न बढ़ाऩे का आरबीआई का फैसला जोखिम भरा है. बाजार इस समय ब्याज दरों में बढोत्तरी की उम्मीद कर रहा था. जिसकी शुद्ध वजह थी ब्याज दर के सहारे रुपये को संभालना. रेेट हाइक न करना बाजार में उथलपुथल लाएगा.’

कुछ जानकारों का मानना है कि महंगाई के अलावा अर्थव्यवस्था के दूसरे पहलुऔं पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अगर आऩे वाले समय में अमेरिका और अन्य विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो भारत के सामने और बड़ी चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी. इसकी वजह से संस्थागत विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजार से पैसा निकालने की रफ्तार और बढ़ सकती है जो बाजार का हाल और बेहाल कर सकती है.

लेकिन बाजार और रुपये का भला चाहने वालों की उम्मीद आरबीआई से पूरी तरह टूट गई हो ऐसा कहना भी सही नहीं है. क्योंकि जानकारों का ये भी मानना है आरबीआई का ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ वाला रुख एक सकारत्मक संकेत है जिसके चलते आने वाले समय में वह ब्याज दरें बढ़ा सकता है. और अगर इससे बाजार में तरलता की कमी होती है तो इस समस्या को वह ओएमओ (अोपन मार्केट आपरेशंस) के जरिये बांड खरीद कर दूर कर देगा. क्योंकि ओएमओ के जरिये नगदी की अापूर्ति बनाये रखने का इशारा आरबीआई ने इस बार की मौद्रिक समीक्षा में भी दिया है.