वीके कृष्ण मेनन जैसों के लिए ही निदा फ़ाज़ली ने कहा होगा - ‘उसके दुश्मन हैं बहुत, आदमी अच्छा रहा होगा.’ वह शख्स- जिससे पूरा पश्चिम जगत खार खाता रहा हो, जो साम्यवाद के साथ सोता और जागता रहा हो, जो तीसरी दुनिया के सर्वहाराओं की आवाज़ रहा हो और जिसकी वजह से अफ्रीका से साम्राज्यवाद ख़त्म हुआ हो, उसके दुश्मन तो बहुत होने ही थे.

अंतरराष्ट्रीय ब्रिटिश राजनयिक अलेक्सेंडर क्लटरबक ने उन्हें जवाहर लाल नेहरू का ‘ईविल जीनियस’ (चालाक शैतान) कहा. हेरोल्ड मैकमिलन ने ‘नेहरू का हैरी हॉप्किंस’ (अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के सबसे विश्वस्त सलाहकार). अमेरिकी सत्ता में बैठे हुए लोगों ने वीके मेनन के साथ ‘पाइज़नस बास्टर्ड’, भारत का रासपुतिन (रूस का नेता और ज़ार की पत्नी का प्रेमी), भारत का विशेंसकी (स्टालिन का सहायक जिसने कई प्रतिद्वंदियों को मरवा दिया) और ‘मैक्याविली’ जैसे कई तमगे जोड़े.

1947 से लेकर 1964 तक भारत और नेहरू पर जिन ख़ास लोगों का प्रभाव था उनमें से वीके मेनन एक थे. मेनन पर साम्यवाद का प्रभाव लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर हेरोल्ड लास्की की शागिर्दी में पड़ा था. आदमी की हिम्मत की दाद दीजिये, लंदन में रहते हुए भारत की आज़ादी की मांग उन्होंने बड़े बेबाक तरीक़े से की. इस दौरान वे नेहरु से मिले और नेहरू समझ गए कि आजादी के बाद मेनन ही उनके चाणक्य बनेंगे.

आजादी के बाद नेहरू ने वीके मेनन को इंग्लैंड का पहला हाई कमिश्नर नियुक्त किया था. इसके बाद तो उन्होंने जैसे दुनिया में तहलका मचा दिया. जहां भी पूंजीवाद और समाजवाद टकराते उनकी मौजूदगी माहौल पर असर डालती थी, फिर वह चाहे कोरिया वॉर हो या सुएज़ नहर का झगड़ा या फिर ताइवान नहर का मसला. उन्होंने स्वघोषित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ की भूमिका अपना ली थी. गुट निरपेक्ष समूह के बनने में उनकी भूमिका कम ही याद की जाती है.

शीत युद्ध के दौर उनकी एक-एक बात पर विदेशों में नज़र रखी जाती थी. 1951 में इंग्लैंड की क्लेमेंट एटली की लेबर सरकार नेहरू को फरमान सुना दिया था कि वे वीके मेनन को हिंदुस्तान बुला लें. उन पर ने कम्युनिस्टों से सांठगांठ करने का इल्ज़ाम था. जैसा ऊपर कहा गया है, अमेरिकी प्रशासन भी उनसे दो हाथ की दूरी बनाता था. कई बार मेनन की बेबाकी और अमेरिका के ख़िलाफ़ तेवर, नेहरू को असहज कर जाते थे. एक अमेरिकी पत्रकार से इंटरव्यू के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘आप मुझसे कुछ भी पूछियेगा, बस कश्मीर और कृष्णा के बारे में नहीं.’

दुश्मन बहुत थे, पर आदमी अच्छा था

इसलिए कि राष्ट्रवाद कूट-कूट कर भरा हुआ था, कश्मीर मुद्दे पर भारत का पक्ष रखते हुए संयुक्त राष्ट्र में वीके मेनन ने आठ घंटे भाषण दिया था और फिर थक कर गिर पड़े थे.

बात यह थी कि कश्मीर के मुद्दे पर जब अमेरिका पकिस्तान के साथ खड़ा था तो रूस को भारत के क़रीब भारत लाने में वीके मेनन तुरुप का इक्का साबित हुए. 1957 में अमेरिका के कश्मीर में जनमत संग्रह के प्रस्ताव के विरोध में उन्होंने इतनी ज़बरदस्त पैरवी की थी कि संयुक्त राष्ट्र महासभा को प्रस्ताव वापस लेना पड़ गया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में वह यादगार भाषण दिया और वे ‘हीरो ऑफ़ कश्मीर’ कहलाये.

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उस जनमत प्रस्ताव के पारित होने को लेकर पश्चिम इतना आश्वस्त था कि इंग्लैंड के राजनयिक मैकडोनाल्ड कहा. ‘वे (मेनन) अमेरिका मनोचिकित्सक को दिखाने जा रहे हैं, न कि संयुक्त राष्ट्र की महासभा में.’ अजीब इत्तेफ़ाक है कि सरदार पटेल के खास वीपी मेनन ने कश्मीर का भारत में विलय किया था तो नेहरू के खास वीके मेनन ने कश्मीर को भारत से दूर न जाने देने के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया था. बतौर हाई कमिश्नर वे महज़ एक रुपया तनख्वाह लेते थे. कहते हैं कि बाद में उन्होंने वह भी बंद करवा ली.

चीन से मिली हार का दाग़ उनके माथे पर क्यों?

सरदार पटेल के लिए जो अहमियत वीपी मेनन की थी, वही अहमियत वीके कृष्ण मेनन की जवाहर लाल नेहरू की नज़रों में थी. संयुक्त राष्ट्र में भाषण के बाद गिरने वाली घटना पर मद्रास में बोलते हुए नेहरू ने कहा था, ‘मैं जानता हूं कुछ लोग जो देश में और विदेश में हैं, उनके जीवन का उद्देश्य सिर्फ कृष्णा को गिराने का ही है. वो जानते हैं मेनन उन लोगों से कहीं ज़्यादा होशियार हैं, मेनन का आज़ादी में योगदान उनसे बड़ा है, और इसलिए कि मेनन ने ख़ुद को देश के लिए खपा दिया है.’

1957 में नेहरू ने उन्हें देश बुला लिया और चुनावों के बाद रक्षा मंत्री बना दिया. पर यहां भारत और चीन के संबंध में मेनन मात खा गए. तत्कालीन सेनाध्यक्ष केएस थिमैया और उनके बीच ठन गयी और इसका नुकसान देश को भुगतना पड़ गया.

रामचंद्र गुहा, ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘थिमैया ने चीन की सीमा पर बढती कारगुजारियों के चलते सेना को तैयार रखने की बात कही, मेनन ने इसे यह कहकर ठुकरा गिया कि भारत को पाकिस्तान से ख़तरा है न कि चीन से. थिमैया ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए बेल्जियन राइफल्स की मांग की तो मेनन ने कहा कि वो सेना को नाटो के हथियार नहीं देंगे.’

जब मेनन ने सेना की पूर्वी कमान लेफ्टिनेंट जनरल कौल के हाथों में सौंप दी तो थिमैया नाराज़ हो गए. उन्होंने नेहरू को अपना इस्तीफ़ा देने की पेशकश की. नेहरू ने बीचबचाव करके उनको रोक लिया पर उनकी बातों पर गौर नहीं किया. वे मेनन की सलाह को तरजीह दे रहे थे. उधर, चीन का दुस्साहस बढ़ता जा रहा था. इससे कांग्रेस मंत्रिमंडल और देश में मेनन के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त रोष फैल गया. उनके इस्तीफ़े की मांग होने लगी.

थिमैया 1961 को रिटायर हो गए और डेढ़ साल बाद, यानी अक्टूबर 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया. मेनन इस कदर ग़लत आकलन कर रहे थे कि अगस्त तक वे यही कहते रहे कि पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ तैयारी कर रहा है. युद्ध में भारत की ज़बरदस्त हार हुई. नेहरू ने संसद को शांत करने के लिए तत्कालीन सेनाध्यक्ष थापर का इस्तीफ़ा मांग लिया. इससे मामला ख़त्म नहीं हुआ. मेनन के इस्तीफ़े की मांग जंगल की आग की माफ़िक बढ गयी. हारकर, नेहरू ने उनसे इस्तीफ़ा ले लिया.

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखा है, ‘मैंने उनसे (मेनन) कहा कि वो कुछ क्यों नहीं कह रहे हैं?’ मेनन का जवाब था, ‘मेरी कहानी मेरे साथ ही दफ़न होनी चाहिए, क्योंकि अगर मैं कुछ कहूंगा तो नेहरू पर इल्ज़ाम आएगा. मेरी निष्ठा के चलते मैं ऐसा नहीं कर सकता.’

तो क्या मेनन नेहरू के चीन के प्रेम को छुपा रहे थे? क्या वे जानते थे कि चीन हमला कर सकता है? क्या वे ऐसा इसलिए कर रहे थे कि अगर वे सेना का आधुनिकीकरण करते तो नेहरू के आर्थिक कार्यक्रमों पर असर पड़ता?

देहांत से कुछ दिन पहले उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘मैं न कोई विदूषक हूं, न ही कोई रासपुतिन.’ दुनिया के मंच पर अपनी छाप छोड़ने वाला, देश आकर हार गया था. अंतिम दिनों में वीके मेनन के पारिवारिक झगड़ों ने उन्हें काफी परेशान किया. वे अकेले पड़ गए थे. छह अक्टूबर 1974 को चीन से मिली हार के सारे राज़ अपने सीने में दफ़न करके वे इस दुनिया से कूच कर गए.