रूस पर एक बार फिर हैकिंग के आरोप लगे हैं. इस बार ये आरोप नीदरलैंड की ओर से लगाए गए हैं. पीटीआई के मुताबिक बीते गुरुवार को रूसी हैकरों ने हेग स्थित रासायनिक हथियार निषेध संगठन (ओपीसीडब्ल्यू) के कंप्यूटरों को हैक करने की कोशिश की. हालांकि, इस हमले को डच साइबर विषेशज्ञों ने विफल कर दिया. नीदरलैंड के अधिकारियों ने इसकी जानकारी देते हुए यह भी बताया है कि इस साइबर हमले में शामिल चार हैकरों की पहचान कर ली गई है और ये सभी रूसी सैन्य खुफिया एजेंसी जीआरयू के एजेंट हैं.

इस समय ओपीसीडब्ल्यू कई ऐसे मामलों की जांच कर रहा है जिससे रूस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. संस्था ब्रिटेन में रूस के पूर्व जासूस सर्गेइ स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया पर हुए नर्व एजेंट हमले की जांच कर रही है. ब्रिटेन ने इस हमले में रूस का हाथ होने का आरोप लगाया है. इसके अलावा सीरिया में होने वाले रासायनिक हमलों की भी एजेंसी जांच कर रही है जिनका आरोप रूस के करीबी सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद पर लगा है. माना जा रहा है कि रूसी हैकरों ने ओपीसीडब्ल्यू पर यह साइबर हमला इन मामलों से जुड़े सबूतों से छेड़छाड़ करने मकसद से किया था.

रूस पर इससे पहले भी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर साइबर हमले करने के आरोप लगते रहे हैं. रूसी खुफिया एजेंसी जीआरयू और एफएसबी पर 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने का भी आरोप है. बीते साल एक अमेरिकी कोर्ट के सामने एक रूसी हैकर ने स्वीकार किया था कि उसने रूसी एजेंसियों के कहने पर ही अमेरिकी आम चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी के कंप्यूटर सिस्टम को हैक किया था.

इसी हफ्ते अमेरिका के न्याय विभाग ने दुनियाभर में हुए कई साइबर हमलों के लिए जीआरयू के सात एजेंटों को दोषी ठहराया है. अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक ये सातों एजेंट ओपीसीडब्ल्यू, फीफा और अमेरिकी एवं वैश्विक एंटी-डोपिंग एजेंसी, अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनी सहित कई संस्थाओं पर किये गए साइबर हमलों में शामिल थे. इन एजेंटों पर बिटकॉइन के जरिए दुनिया भर में बड़े स्तर पर मनीलॉन्डरिंग करने के आरोप भी लगे हैं.

रूसी साइबर हमलों पर गौर करें तो पिछले दो-तीन सालों में इनमें अचानक तेजी आई है जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा अमेरिका और यूरोपीय देशों को उठाना पड़ा है. कई जानकार यह भी मानने लगे हैं कि रूस ने एक बार फिर उसी रवायत को शुरू कर दिया है जो सोवियत संघ के दौर में प्रचलित थी. तब वहां की सरकार ने खुफिया एजेंसियों में हैकरों की एक बड़ी फ़ौज तैयार कर रखी थी. लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद इस तरह की चीजें बंद हो गई थीं. लेकिन, पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है जैसे रूस ने एक बार फिर साइबर सेंधमारी को अपने प्रमुख हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.