जम्मू-कश्मीर में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव के चौथे और अंतिम चरण के लिए मतदान जारी है. मिलिटेंट्स ने लोगों को इन चुनावों में हिस्सा लेने से मना किया है. वहीं राज्य के मुख्य स्थानीय राजनैतिक दलों, नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने इन चुनावों का बहिष्कार किया है.

इस सबके चलते कश्मीर घाटी में वह होने जा रहा है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. घाटी में कमल का फूल खिलता दिखाई दे रहा है. यानी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विजयी होती दिखाई दे रही है. सूत्रों की मानें तो मुस्लिम बहुमत वाली कश्मीर घाटी में भाजपा के कम से कम 70 उम्मीदवार निर्विरोध जीत रहे हैं और भाजपा नेताओं की सुनें तो 75. अब आंकड़ा जो भी हो, 43 नगरीय निकायों में 70 सदस्य मायने रखते हैं. कुल मिलाकर कश्मीर घाटी में भाजपा के 325 उम्मीदवार मैदान में उतरे हैं.

इसका मतलब यह है कि कई जगह नगरीय निकाय पूर्ण रूप से भाजपा के नियंत्रण में रहेंगे, जैसे दक्षिण कश्मीर में मिलिटेंसी का गढ़ माने जाने वाले शोपियां ज़िले में भाजपा के 13 उम्मीदवार निर्विरोध जीत रहे हैं, जबकि बाकी के चार वार्ड खाली रहेंगे.

ऐसे ही पुलवामा ज़िले के त्राल में 13 वार्ड वाले नगरीय निकाय में सिर्फ चार नामांकन दर्ज हुए हैं जिसमें से तीन उम्मीदवार भाजपा के हैं. त्राल मारे गए हिज़्बुल कमांडर बुरहान वानी का गृहनगर है और यह भी मिलिटेंट्स का एक मुख्य गढ़ माना जाता है.

सिर्फ चार साल पहले एनसी और पीडीपी ने राज्य सभा चुनाव इस मुद्दे पर लड़े थे कि कैसे ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ भाजपा को कश्मीर से दूर रखा जाए और अब भाजपा ज़मीनी राजनीति के लिहाज से कश्मीर घाटी में कब्ज़ा जमाने के लिए तैयार दिखती है.

जम्मू कश्मीर में भाजपा के मुख्य प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर का कहना है कि यह जमीन पर की गई भाजपा की चार साल की मेहनत का नतीजा है. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘जहां बाकी पार्टीज को उम्मीदवार नहीं मिले खड़े करने को हमारे पास 325 उम्मीदवार होना हमारी मज़बूत हो रही पकड़ को दर्शाता है. और यह दर्शाता है कि हमने लोगों के साथ मिलके कितना काम किया है.’

वहीं पीडीपी और एनसी इस चुनाव प्रक्रिया को बेमायने बता रहे हैं. उनका आरोप है कि सरकार ने इन चुनावों का मज़ाक बना दिया है. पीडीपी के प्रवक्ता रफ़ी मीर सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘भाजपा के अनंतनाग के उम्मीदवार श्रीनगर के होटलों में बैठे हुए हैं. ज़मीनी पर आप देख सकते हैं इस चुनाव का कोई मतलब ही नहीं बनता है.’

एनसी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अली मुहम्मद सागर के मुताबिक कोई भी चुनाव लोगों के भाग लिए बिना व्यर्थ होता है. वे कहते हैं, ‘जिस चुनाव में 177 उम्मीदवार निर्विरोध विजयी हो जाएं वह कैसा चुनाव होगा, आप खुद इस बात का अंदाजा लगा सकते है.’ और जो हमारी पार्टी के दो कार्यकर्ता श्रीनगर में दिनदहाड़े मारे गए वह इन चुनावों पर एक और सवालिया निशान है.’

राजनीतिक बयानबाज़ी जो भी हो, सवाल यह पैदा होता है कि भाजपा ने पिछले चार साल में ऐसा क्या किया है जिससे उसको यह कामयाबी मिल गई. सीधे कहें तो कश्मीर घाटी में, जहां भाजपा का लोग नाम सुनना नहीं पसंद करते, वहां उसे उम्मीदवार कहां से मिले? वह भी ऐसे समय पर जब कश्मीर घाटी में आम लोग चुनावों का नाम भर लेने से घबरा रहे हैं.

पहली बात जो भाजपा के पक्ष में हुई है वह है जम्मू या देश के अन्य भागों में रह रहे कश्मीरी पंडितों का भाजपा से जुड़ना. ठाकुर ने सत्याग्रह को बताया कि जो 75 उम्मीदवार निर्विरोध जीत रहे हैं, उनमें से छह ऐसे कश्मीरी पंडित हैं जो या तो जम्मू या देश के अन्य राज्यों में रह रहे हैं. वे कहते हैं, ‘325 उम्मीदवारों में से 36 कश्मीरी पंडित हैं.’

लेकिन सूत्रों की मानें तो यह संख्या उससे कहीं ज़्यादा है. एक सरकारी सूत्र ने सत्याग्रह को बताया, शोपियां ज़िले में जो भाजपा के 13 उम्मीदवार निर्वोरोध जीत रहे हैं, सारे कश्मीरी पंडित हैं और इस समय जम्मू में रह रहे हैं. उन्हें कोई खतरा नहीं है.’ उनके मुताबिक त्राल में भी भाजपा के तीनों उम्मीदवार कश्मीरी पंडित हैं.

दूसरा यह कि सरकार ने इस बात का ख़ासा ख़याल रखा है कि उम्मीदवारों के नाम लोगों को पता न चल पाएं. कहीं पर भी अधिकारियों ने इन उम्मीदवारों के नाम बाहर नहीं आने दिए हैं. घाटी के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘शायद इस वजह से कुछ स्थानीय मुसलमान भी भाजपा से जुड़ गए. वे मौके का फायदा उठाना चाह रहे थे.’

और शायद इस बात में थोड़ी सच्चाई भी है, क्योंकि दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में कम से कम तीन नगरीय निकायों में उम्मीदवारों के नाम सोशल मीडिया पर आने के बाद उनमें से कइयों ने अपने नामांकन वापस लेकर लोगों से माफ़ी मांगी. इन उम्मीदवारों में खासे मुसलमान भी शामिल थे. अनंतनाग के ही डूरु नगरीय निकाय में भाजपा के 13 मुसलमान उम्मीदवारों ने नामांकन वापस लेकर पार्टी की सदस्यता से भी उस समय इस्तीफ़ा दे दिया जब उनमें से एक की खड़ी धान की फसल में अज्ञात लोगों ने आग लगा दी.

हालांकि वहां के चुनावी क्षेत्र के भाजपा अध्यक्ष ग़ुलाम हसन भट सत्याग्रह से बात करते हुए अपने इस्तीफे की वजह पार्टी से लोगों की नाराज़गी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘मैंने लोगों से जो वादे किये थे उनमें से कोई भी पार्टी हाईकमान ने पूरा नहीं किया. मैं क्या मुंह लेके जाता लोगों के पास?’

अब वजह चाहे जो भी हो सचाई यह है कि ये 13 मुसलमान भाजपा के साथ जुड़े हुए थे. मतलब यह बनता है कि कश्मीर घाी में पार्टी सिर्फ कश्मीरी पंडितों के भरोसे नहीं चल रही है. भाजपा के स्थानीय नेता मानते हैं कि कश्मीर में भाजपा के साथ काफी लोग जुड़े हुए हैं और जो शुरू में लोगों में आक्रोश था वह इस वजह से था क्योंकि एनसी और पीडीपी ने लोगों में भाजपा के खिलाफ ज़हर भर दिया था.

भाजपा के शोपियां में स्थित नेता जावेद क़ादरी कहते हैं, ‘भाजपा एक सेक्युलर पार्टी है और जो यहां के लोगों को बताया गया था कि हमारी पार्टी मुस्लिम विरोधी है उस ग़लतफहमी को हम धीरे धीरे ख़तम कर रहे हैं’. उनके मुताबिक पार्टी की अनथक कोशिशों का नतीजा यह है कि धीरे धीरे लोग इससे जुड़ते दिखाई दे रहे हैं. क़ादरी कहते हैं, ‘वरना ऐसे समय पे जब कोई भी राजनेता दक्षिण कश्मीर में रहने से डरता है, मैं अपने घर को छोड़ के कहीं नहीं गया हूं.’

पर सवाल यह भी है कि यह कैसा चुनाव है जिसमें लोगों को उम्मीदवारों के नाम तक नहीं पता. सत्याग्रह ने इस बात को लेकर कम से कम छह अलग-अलग ज़िलों के उपायुक्तों से बात करनी चाही. हर जगह यही जवाब मिला कि चुनाव के बाद बात करेंगे.

पीडीपी और एनसी भी यही पूछ रहे हैं कि यह कैसे चुनाव हैं. एनसी के सागर कहते हैं, ‘यह सारा एक जोड़ तोड़ का ड्रामा है. वरना आपको लगता है की शोपियां और सोपोर जैसी जगहों में भाजपा जीतेगी?’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘जनतंत्र का मतलब होता है लोगों का वोट डालने आना. लेकिन यहां तो लोगों को यह भी नहीं पता है कि उम्मीदवार कौन है, तो वोट अगर कोई निकलेगा भी डालने तो किसको डालेगा?’

यही बात जब सत्याग्रह ने भाजपा के अल्ताफ ठाकुर से पूछी तो उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी आने वाले दिनों में प्रचार करेगी. यह छह अक्टूबर की बात है और आठ अक्टूबर से चुनाव शुरू होने वाले थे. इससे यह तो साफ हो जाता है कि अब कोई प्रचार नहीं हो पायेगा, और उम्मीदवारों के नाम गुप्त ही रहेंगे.

हालात चाहे जो भी हों, मतदान हो या नहीं और उम्मीदवारों के नाम पता चलें या नहीं, सच्चाई यह है कि भाजपा को फायदा हुआ है और सवाल यह कि क्या पीडीपी और एनसी से चूक हो गयी? दोनों पार्टियां यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उनसे चूक हो गई, या उन्हें यह चुनाव लड़ लेने चाहिए थे. सागर कहते हैं कि यह फैसला उनकी पार्टी में विचार-विमर्श के बाद लिया गया था, तब जब भाजपा सरकार ने इन चुनावों को अनुछेद 35-ए के साथ जोड़ दिया था. वे कहते हैं, ‘वरना हम तो चुनाव लड़ने के लिए तैयार थे. डाक्टर साहब (एनसी के अध्यक्ष डॉ फ़ारूक़ अब्दुल्ला) ने कहा भी था कि ये चुनाव होने चाहिए और हुए तो हमारी पार्टी भाग लेगी. लेकिन जब चुनावों को अनुछेद 35 -ए के साथ जोड़ दिया गया तो फिर हम कैसे लड़ सकते थे.’

सत्याग्रह ने सागर से पूछा कि क्या वे आने वाले पंचायती चुनावों के लिए अपनी रणनीति बदल कर चुनाव लड़ेंगे तो उन्होंने साफ़ तौर पर इससे इनकार किया. उनका कहना था, ‘हमने यह चुनाव न लड़ने का फैसला लिया है और यह फैसला पार्टी की कार्यकारी समिति ने लिया था. इसको बदलने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता.’

पीडीपी के मीर भी नगरीय चुनाव न लड़ने को गलती नहीं मानते लेकिन साथ ही साथ वे पंचायत चुनाव न लड़ने के फैसले को अटल नहीं बताते. वे कहते हैं, ‘जहां हमें कोई अफ़सोस नहीं है और अभी तक यही रणनीति है कि पंचायत चुनाव नहीं लड़ने हैं. लेकिन फिर राजनीतिक पार्टियों में फैसले बनते बिगड़ते रहते हैं. देखते हैं क्या होगा.’

रजनैतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि चुनाव न लड़ने का फैसला एनसी और पीडीपी ने अपनी बची-खुची साख मज़बूत करने के लिए लिया था, लेकिन भाजपा की कामयाबी ने इस निर्णय को इन पार्टियों की गले की हड्डी बना दिया है. राजनैतिक पर्यवेक्षक और कश्मीर की इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी में अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने वाले उमैर गुल कहते हैं, ‘ये लोग चुनाव में भाग न लेकर एक तो अपने कार्यकर्ताओं को विधानसभा चुनावों के लिए बचा के रख रहे थे और साथ ही साथ लोगों को यह एहसास दिला रहे थे कि वे लोगों के हित में काम कर रहे हैं. लेकिन भाजपा की जीत से इनको धक्का लगा है.’

गुल कहते हैं कि अब ये पार्टियां पंचायत चुनाव लड़ती हैं तो लोगों में इनकी बिगड़ी हुई साख और बिगड़ जायेगी और नहीं लड़ेंगी तो भाजपा अपने पैर और मज़बूती से जमाती दिखाई देगी.