टाइटल से तो ज़ाहिर हो गया है किसके बारे में लिखा जा रहा है. यकीन है, इस गाने को सुनने के बाद आप इनके बारे में ज़्यादा जानना चाहेंगे.

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फ़िल्मों में संगीत की दुनिया इस कदर पुरुष प्रधान है कि 87 सालों में कुल 10 फीमेल संगीत निर्देशक भी नहीं हो सकी हैं. सरस्वती देवी, जद्दन बाई और ऊषा खन्ना के बाद लंबे समय तक पूर्ण विराम लगा रहा और अब भी स्नेहा खानवलकर जैसे नाम अपवाद की तरह ही मिलते हैं . कुछ ऐसा ही हाल फ़िल्म निर्देशन में भी दिखता है. महिलाओं को लेकर इतना भेदभाव क्यों? आज भी पुरुषों के बनिस्बत उन्हें तत्व प्रधान रोल और मेहनताना अक्सर कम ही मिलता है.

ऊषा खन्ना भी इस भेदभाव का शिकार रहीं, वरना क्या वजह थी कि बेहद कर्णप्रिय संगीत देने के बाद वे इंडस्ट्री में तो बनी रहीं, पर उन्हें वह मुकाम न मिला जिसकी वे हक़दार थीं? आप कहेंगे, यह बड़ी आम सी लाइन है. हर किसी के लिए जो सफल नहीं हुआ उसके लिए यह कहा जाता है

जी नहीं. यह सत्य है. लता मंगेशकर, मुकेश, किशोर कुमार या आशा भोंसले जैसे गायकों ने उनके संगीत निर्देशन में बेहतरीन नगमे गाये हैं, पर ऊषा खन्ना को बड़े बैनर्स की फिल्में नहीं मिलीं और इसी के चलते उनकी सफलता दूसरों के मुक़ाबले कम नज़र आती है.

ऊषा खन्ना का संगीतकार बनना इत्तेफ़ाक था. वे तो गायक बनना चाहती थीं. उनके पिता के जोड़ीदार के बेटे इंदीवर ने उन्हें संगीत निर्देशक बनने की सलाह दी. बहुत कम लोग गीतकार जावेद-अनवर की जोड़ी को जानते होंगे. जावेद, ऊषा के पिता मनोहर खन्ना थे और अनवर इंदीवर के वालिद थे. फ़िल्मों के शौक ने मनोहर साहब से अच्छी ख़ासी नौकरी छुड़वा दी. वे तो ज़्यादा कामयाब न हुए, पर उनकी बिटिया, यानी ऊषा खन्ना ने ज़रूर सफलता देखी.

एक दिन इंदीवर उन्हें फ़िल्म ‘दिल दे के देखो’ के निर्माता एस मुखर्जी के पास ले गए. ओपी नैयर से उन दिनों मुखर्जी साहब की अनबन चल रही थी. उन्होंने ऊषा खन्ना का ‘ओपी’ स्टाइल का म्यूज़िक सुना तो ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें काम दे दिया और उनकी गाड़ी चल पड़ी.

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यह ऊषा खन्ना का असली संगीत नहीं कहा जा सकता. वह मेलोडी जिसके लिए वे जानी गयीं, अभी निकलकर आने को बाकी थी. और वह आई फ़िल्म, ‘आओ प्यार करें’(1960) के गानों में. लता जी का गया हुआ सोलो, ‘एक सुनहरी शाम थी, बहकी बहकी ज़िन्दगी…’ लोगों ने खूब पसंद किया

ऊषा खन्ना ने बड़ी ही सौम्य धुनें बनायीं. न कहीं अतिरेक था भावनाओं का, न कहीं इंस्ट्रूमेंट्स का. सब कुछ संयत, एकदम संयत. मिसाल के तौर पर ‘हम हिन्दुस्तानी’(1960) का देशभक्ति गीत ही सुनिए. न म्यूज़िक लाउड होता है, न मुकेश बिलकुल ऊंचे स्केल में गाते हैं. यह बात इसलिए कि अक्सर देशभक्ति के गानों में भावनाओं अतिरेक होता है. ऊषा खन्ना इससे बचती हैं और सुनने वालों को भी बचाती हैं.

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बात यह है कि ऊषा खन्ना का संगीत तारतम्यता का बोध लिए लफ़्ज़ों के ऊपर चलता है, अतिरंजना से बचते हुए और 50 से 60 के दशकों में आये पश्चिमी इंस्ट्रूमेंट्स का माधुर्य लिये बजता है. जानकारों के मुताबिक़ उनका सर्वश्रेठ गीत लताजी का गया हुआ, ‘मांझी मेरी क़िस्मत के ले चल’ है. पर यतीन्द्र मिश्र को दिए इंटरव्यू में लता मंगेशकर ‘एक सुनहरी शाम थी बहकी-बहकी ज़िन्दगी’ को मानती हैं.’ यह लता जी का सर्वश्रेष्ठ गाना तो नहीं कहा जा सकता पर ऊषा खन्ना की सर्वश्रेष्ठ कम्पोज़ीशन कही जा सकती है.

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अरबी शैली के संगीत में उन्हें ख़ासी सफलता मिली. मिसाल के तौर मोहम्मद रफ़ी का गया गाना, ‘ये तेरी सादगी ये तेरा बांकपन’ और ‘मैंने रखा है मुहब्बत तेरे अफ़साने का नाम’ लोगों ने खूब पसंद किये. वैसे कई बार उनके साथ ऐसा भी हुआ कि कई गाने तो बेहतरीन बने पर हिट नहीं हुए.

1960 से लेकर 1970 वाले दौर में ऊषा खन्ना अपने उरूज़ पर थीं. यहां वे कल्याण जी-आनंद जी, जयदेव, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल और रॉबिन बनर्जी जैसों के साथ कदम ताल कर रहीं थीं. यह दुनिया और इसकी जद्दोजहद बड़े कमाल की है. आप उसी से दो-दो हाथ कर रहे होते हैं, जिसने आपको उंगली पकड़कर चलना सिखाया होता है. ऊषा खन्ना ने रॉबिन बनर्जी से गायन सीखा था और अब वो उनसे मुकाबिल हो रही थीं. तो दूसरी तरफ़ उनके म्यूजिक अरेंजर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल उनसे आगे निकल गए.

पर उनका असली मुकाबला अभी होना बाकी था, पंचम जैसे धुरंधर बस छाने को ही थे और इसी आंधी में उनके कदम डगमगाए तो सही पर उन्होंने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी. इस दौर में भी ऊषा खन्ना ने अच्छे गाने कंपोज़ किये. मुकेश तो खैर उनके पसंदीदा गायक थे ही, पर उनके अलावा किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर से भी उन्होंने खूब गवाया. लता मंगेशकर के अलावा अब फ़िल्म इंडस्ट्री कुछ और गायकों को लाने की हिम्मत कर रही थी. इनमें एक नाम आता है सुमन कल्याणपुर का.

बहुत से लोग दावा करते हैं कि अगर घेराबंदी न की गयी होती तो सुमन कल्याणपुर लता मंगेशकर की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी होतीं. उनके मुताबिक फ़िल्म इंडस्ट्री ने सुमन जी के साथ ही अन्याय नहीं किया, अपना भी नुकसान किया. जो भी है, यहां तक आते-आते लता जी के घोड़े की रास थोड़ी ढीली हुई तो हेमलता, अलका याग्निक और अनुराधा पौंडवाल जैसी गायिकाएं सामने आईं. पर सुमन कल्याणपुर और ऊषा खन्ना का साथ खूब चला. दोनों की जुगलबंदी ‘वो जिधर देख रहे हैं, हम उधर देख रहे हैं’ में नज़र आती है.

ऊषा खन्ना ने प्रोडूसर-डायरेक्टर सावन कुमार से शादी की. सावन कुमार की पहली ही फ़िल्म ‘हवस’ (1974) का संगीत काफी हिट हुआ था. उसका एक गाना था ‘तेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद’ कई दिलजले आशिकों का आज भी सबसे पसंदीदा गीत है.

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इस दौर में भी जब गानों में से मेलोडी गायब होती जा रही थी, ऊषा जी उसका दामन थामे हुए चल रही थीं. ‘दादा’ (1978) का गाना ‘दिल के टुकड़े-टुकड़े मुस्कुरा के चल दिए ही देखिए. जैसा मधुर ऊषा जी का संगीत है वैसी ही मधुर आवाज़ येसुदास की है. इस फ़िल्म के संगीत ने उनके कदम दोबारा जमा दिए थे. उन्हें धड़ाधड़ कई फ़िल्में मिलीं. ‘साजन बिना सुहागन’, ‘भयानक’, ‘बिन फेरे हम तेरे’ फ़िल्मों का संगीत अच्छा चला. पर बात अब भी वही थी, बड़ी बैनर्स उन तक नहीं आ रहे थे.

1980 के आसपास उनकी शादी टूट गयी. विडंबना देखिये या मजबूरी, सावन कुमार ने ‘सौतन’ फ़िल्म का संगीत उन्हीं के ज़िम्मे किया. उन्होंने ने भी अच्छा संगीत दिया. उस फ़िल्म के लगभग सारे गाने हिट हुए थे.

इस दौर में अब ऊषा खन्ना पिछड़ती जा रही थीं. लोगों की पसंदें बदल गयी थीं. लफ़्ज़ों में गहराई नहीं बची थी, संगीत से मेलोडी तो लगभग ख़त्म ही गयी थी. ऊषा जी ने वापसी की भरपूर कोशिश की जो कामयाब नहीं हुई. बड़े बैनर्स नहीं थे, छोटे बजट की फ़िल्में अक्सर कम चलती और उनका संगीत उनसे से भी कम. धीरे-धीरे ऊषा खन्ना बिलकुल ही गायब हो गयीं. इसी समय उनके द्वारा विशाल भारद्वाज की धुन के इस्तेमाल को लेकर विवाद हुआ था.

इस बात को जाने दीजिये. आज ऊषा खन्ना 79वें वर्ष में प्रवेश कर गयीं हैं. शायद कम ही लोग उन्हें बधाई देने पहुंचे. उम्मीद करेंगे कि शायद सावन कुमार उन्हें आज फ़ोन करके बधाई दें और उन्हें कहीं डिनर पर ले जाएं क्यूंकि...

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