देश के लगभग हर हिस्से में एक सीजन त्यौहारों वाला होता है. लेकिन इंदौर इस मामले में अलग है. यहां त्यौहारों का सीजन लगभग पूरे साल चलता है. यह बात किसी भी समय इस शहर में पहुंचकर समझी जा सकती है. उत्सव प्रेमी इंदौर हिंदू त्यौहारों की जमात में मालवी, मराठी, जैन, अग्रवाल-सिंधी समुदाय के त्यौहारों के अलावा गुजरात-राजस्थान में मनाए जाने वाले कई पर्वों को भी शामिल करता है. इनसे जुड़े आयोजन, रैलियां भी हर दिन इस शहर की रौनक बनाए रखती हैं. हम जब इंदौर पहुंचे तो उसके दो दिन पहले यह शहर मोहर्रम और एक दिन पहले अनंत चतुर्दशी मनाकर फारिग हुआ था.

सितंबर के इस आखिरी हफ्ते में गणपति बप्पा के जाने के साथ ही मानो बारिश भी आखिरी विदा लेने इंदौर पहुंची थी. काले बादलों से दो दिन तक लगातार बरसने वाली इस बारिश ने पहले से ही मध्यम गति से चलने वाले शहर की रफ्तार जरा और कम कर दी थी. लेकिन किसी भी और छोटे शहर की तरह बारिश यहां पर पानी भरने से बंद हुई सड़कों या मन में गिनगिनाहट पैदा करने वाले कीचड़ की वजह नहीं बनी थी. इसके उलट उसने इंदौर की इमारतों और पेड़ों को धोकर एकदम तरोताजा कर दिया था. बीती मई में इंदौर ने दूसरी बार स्वच्छता सर्वेक्षण में अव्वल स्थान हासिल किया है. इस खुशनुमा मौसम में देश का सबसे साफ-सुथरा शहर होने का गर्व इंदौर के चेहरे पर साफ नजर आता है. शहर के लगभग हर रास्ते पर गुजरते हुए आप दीवारों पर लिखी इबारत - ‘इंदौर रहेगा नंबर-1’ पढ़ सकते हैं.

इस तमगे को बनाए और बचाए रखने के लिए यह शहर हर दिन अपने हिस्से की कोशिश करता है. सुबह-सुबह ‘हल्ला बोल हल्ला’ का लगभग कानफोड़ू हल्ला मचाते हुए नगर-निगम की कचरा-गाड़ी मोहल्लों में घूमती देखी जा सकती है. इस सुबह हमें एक दिलचस्प नजारा यह देखने को मिला कि एक महिला काफी दूर खड़ी गाड़ी में कूड़ा डालने के लिए लगभग भागते हुए जाती हैं. पूछने पर पता चलता है कि जब गाड़ी उनके घर से गुजरी तब वे किसी और काम में फंसी थीं और कूड़ा गाड़ी में ही और हर रोज डालना उनकी आदत है. इस गाड़ी के साथ चलने वाले गौरव सालुंके इंदौरी स्टाइल में हमें बताते हैं कि ‘अपन तो रोज ही ये (नजारा) देखते हैं.’ क्या इंदौर हमेशा से इतना जागरुक था, हमारे इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि ‘था तो सही, पर इतना नहीं था. जैसे, दो साल पहले भी कचरा गाड़ी आती थी लेकिन तब लोग थोड़े आलसी थे, तब उनके पास पड़ोस के खाली प्लॉट या पीछे की गली वापरने (इस्तेमाल करने) के लिए होती थी. अभी सबको अपना नंबर वन का तमगा छिनने का डर है इसलिए भी इतनी फुर्ती आई है.’

यह सक्रियता जिस भी वजह से आई हो, है सराहनीय. इसका एक और उदाहरण हमें शाम को यहां के सर्राफा बाजार में देखने को मिलता है. इंदौर का छोटा सर्राफा, यहां के गहनों के लिए नहीं बल्कि खाने-पीने के बाजार के लिए मशहूर है. अक्सर बातों में ‘इंदोर तो चटोरों का शहर है’ कहने वाले इंदौरी इस चटोरेपन को गंदगी में तब्दील न होने देने का भी उतना ही ध्यान रखते हैं. यहां की लगभग हर दुकान में डिस्पोजेबल बर्तनों की तुलना में स्टील के बर्तनों को इस्तेमाल करने का आग्रह किया जाता है.

खाने के अलावा, इंदौर व्यापारियों का शहर भी है और यह देखना भी राहत की बात है कि शहर के भरे बाजारों की छोटी-संकरी गलियां भी उतनी ही साफ नजर आती हैं जितनी कि शहर की मुख्य सड़कें. इसके बाद आपको यकीन हो जाता है कि मध्य प्रदेश के इस सबसे बड़े शहर का लगातार दो बार स्वच्छता सर्वेक्षण में अव्वल आना कोई तुक्का नहीं है.

इंदौर का नाम पहले इंदूर था और अठारहवीं सदी में इसे मराठा सूबेदार मल्हार राव होल्कर ने बसाया था. लेकिन इस शहर के बारे में इस तरह की तमाम जानकारियां आपको इतिहास की किसी किताब में ही मिल जाएंगी. इससे हटकर जो चर्चाएं होती हैं वे यहां के सबसे बड़े बाजार राजवाड़ा, सेव-नमकीन जैसे खानपान और फैक्ट्रियों-व्यापारियों से होकर गुजरती हैं और आईआईटी-आईआईएम पर आकर खत्म हो जाती हैं. इनके अलावा भी इस शहर के कई पक्ष हैं.

इंदौर में मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए कई छात्र भी रहते हैं है. राजवाड़ा या भंवरकुआं चौराहे के आस-पास के इलाकों में एक कमरे का मकान लेकर रहने वाले इन छात्रों में से कई बैंकर बनना चाहते हैं तो कुछ पीसीएस या आईएएस में जाना चाहते हैं. खजूरी बाजार में किताबें खोजने के लिए विचरते ऐसे ही एक छात्र सरोज धुर्वे से जब हमने पूछा कि उनके लिए इंदौर शहर के क्या मायने हैं तो उनका जवाब था, स्ट्रगल. एक साल पहले सागर से इंदौर आए धुर्वे कहते हैं कि ‘हमारे जैसे लोगों के लिए इंदौर सबसे अच्छा शहर इसलिए भी हो जाता है क्योंकि यहां पर सबकुछ वाजिब कीमतों पर मिल जाता है.’

इंदौर ऐसा क्यों है, का जवाब हमें दिव्यांशी देती हैं. वे महज 25 साल की हैं और इंदौर में रहकर ट्रैवल मैनेजमेंट में एमबीए कर रही हैं. ‘इस शहर के सस्ते होने का बड़ा कारण ये है कि ये कपड़ों से लेकर टोस्ट तक सबखुद बना लेता है. इसके अलावा यह दिखावे में पड़ने वाला शहर भी नहीं है.’ दिव्यांशी के पिता का नीमच में कपड़ों का कारोबार है और वे उसके इंदौर से जुड़े कामकाज को भी देखती हैं. ‘ये शहर ज्यादा जात-पांत में नही पड़ता और लड़की-लड़के का अंतर भी नहीं करता. इसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं लड़की हूं और ट्रक लोड हो रहा हो तो मैं वहां क्यों खड़ी हूं. ये मेरा काम है और मुझे करना है. ऐसा मैंने अपने शहर में कभी होते नहीं देखा. मुझे लगता है इंदौर को उसकी ऐसी सोच के लिए भी मिनी मुंबई कहा जाना चाहिए’ दिव्यांशी कहती हैं. वे हंसते हुए इंदौर की एक और खासियत कुछ इस तरह से बताती हैं, ‘यहां किसी के पास गले हुए नींबू भी हों न तो वो लेकर बैठ जाएगा. और आश्चर्य ये नहीं है कि वो इन्हें बेचने की सोच रहा है, बल्कि उसे इसके भी खरीदार मिल जाएंगे.’

बेचने का हुऩर इंदौर की हवाओं में है, यह बात आप भी किसी भी एक ही दुकान पर पहुंचकर अच्छी तरह समझ सकते हैं. यहां दुकानदार के मुंह से ‘अरे ये तो आपकी ही दुकान है’, ‘आप हर बार आते नहीं हो, हम पेचानते नई हैं क्या’ और ‘अरे मत लेना, पर देख तो लो’ जैसे जुमले आप हर एक-दो मिनट में सुन सकते हैं. और इसके बाद आप इन दुकानों से एक की जगह तीन चीजें लेकर अपने घर लौटते हैं.

बिना लाग-लपेट, सीधी लेकिन हमेशा हाईटोन में बात करने वाले इंदौर के मिजाज का एक पक्ष और भी है - व्यापार से हटकर यह खुद के लिए खड़ा होने वाला शहर भी है. इसका एक उदाहरण – सफाई वाला – हम आपको पहले ही दे चुके हैं और दूसरा हमें रश्मि प्रणय वागले, जो इंदौर की ही निवासी हैं, के सहयोग से देखने को मिलता है. उनके साथ हमारी सुबह-दोपहर-शाम वाली दोपहर, इंदौर सोसायटी फॉर मेंटली चैलेंज्ड (आईएसएमसी) में गुजरती है. आईएसएमसी मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था है. इसकी खासियत यह है कि इसे बनाने और चलाने का काम इन बच्चों के माता-पिता मिलकर करते हैं. ये बच्चे 15 साल से लेकर 50-55 की उमर तक के हैं लेकिन बिना किसी भेदभाव के बच्चे ही कहे जाते हैं. यह बात भाव-विभोर करने वाली है कि जो मेंटली चैलेंज्ड बच्चे आम तौर पर परिवार के लिए ही बोझ सरीखे होते हैं, उन्हें इंदौर वासियों ने न सिर्फ स्पेशली एबल्ड की संज्ञा दी है बल्कि सही मायनों में उनमें विशेष क्षमताएं पैदा करने की कोशिश भी कर रहे हैं.

फिलहाल यह केंद्र माता आनंदमयी के इंदौर आश्रम के एक हिस्से में चल रहा है. संस्था की ऑफिस को-ऑर्डिनेटर शशि दुबे बताती हैं कि हाल ही में आईएसएमसी की किसी सदस्य ने करीब 15 हजार वर्गफीट का एक प्लॉट संस्था को दान दिया है, जिस पर इन बच्चों के लिए शेल्टर होम बनाया जा रहा है. इसके अलावा कुछ बच्चों की माएं यहां बतौर स्पेशल एजुकेटर काम करती हैं. आर्थिक पैमाने पर निचले तबके से आने वाले इन बच्चों का ख्याल उनके माता-पिता तो अच्छी तरह से रखते हैं लेकिन उनके जाने के बाद इन्हें आश्रय और मदद मिल सके, यही इस संस्था का उद्देश्य है.

यह दिलचस्प है कि आईएसएमसी न तो ज्यादा सरकारी मदद की आस में रहता है और न ही इस तरह की कोई मदद उस तक पहुंचती ही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि उसे मदद की जरूरत नहीं है. इसीलिए शशि दुबे, इस स्टोरी में अगर हो सके तो संस्था की मदद करने की अपील करने का आग्रह करती हैं. रश्मि वागले हमें इस बात का भरोसा दिलाती हैं कि मदद के लिए मिलने वाली एक-एक पाई केवल और केवल इन बच्चों पर ही खर्च की जाती है.

यह संस्था अभी रश्मि जैसे ऐसे लोगों, जिनका इन बच्चों से कोई सीधा संबंध भी नहीं है, की मदद से ही चल रही है. वे इसके लिए निस्वार्थ भाव से काम करते हैं और आर्थिक मदद भी देते हैं. इस तरह इंदौर का यह कोना हमें बताता है कि यह शहर अपने उन बच्चों का कुछ भी करके कितना ख्याल रखता है जिन्हें इसकी थोड़ी ज्यादा जरूरत है.

ऐसा ही एक और उदाहरण हमें तब देखने को मिलता है जब शाम को हम वामा साहित्य मंच की गोष्ठी में पहुंचते हैं. पच्चीस-तीस से लेकर पैंसठ-सत्तर तक की उमर की महिलाएं इस मंच का हिस्सा हैं और हॉल में आपको चालीस के करीब महिलाएं नजर आती हैं. इनमें से ज्यादातर ऐसी गृहणियां हैं जो साहित्य सृजन में रुचि रखती हैं लेकिन उनके पास ऐसा करने के मौके नहीं होते. हर महीने इस मंच की एक बैठक होती है जिसमें साहित्यिक रचनाओं के पाठ के साथ-साथ अलग-अलग विषयों पर चर्चा और कई तरह की कल्चरल एक्टिविटीज भी होती है. संस्था की सचिव ज्योति जैन बताती हैं कि इस बार ये महिलाएं अगले महीने पड़ने वाले तमाम त्यौहारों और दिवसों पर बोलने वाली हैं, और अगले महीने की गोष्ठी के लिए उन्हें अपने-अपने क्षेत्र के लोकगीत तैयार करके सुनाने हैं.

हॉल में हर कुर्सी के पीछे एक विषय की पर्ची चिपकी हुई है. महिलाओं को उन्हीं कुर्सियों पर बैठना है जिन पर उनका विषय लिखा हुआ है. यह देखना ही रोमांचक है कि यहां मौजूद हर महिला अपनी बात कहने का अवसर चाहती है. यह कार्यक्रम करीब डेढ़ घंटे तक चलता है. हर किसी को तीन मिनट का समय मिलता है और सबके चेहरे पर अपनी बात कहने की संतुष्टि दिखती है. सबसे अच्छा यह देखकर लगता है कि बुजुर्ग महिलाएं भी एक अलग जोश के साथ बात करती हैं. इतनी महिलाओं में स्वाभाविक है कि हर कोई उतनी प्रतिभाशाली नहीं है, इसलिए बहुत सी बातें वे भी होती हैं जो कई-कई बार दोहराई जा चुकी हैं लेकिन इनमें कुछ अनोखी और अनसुनी बातें भी शामिल हैं जो आपका ध्यान खींचती हैं. उदाहरण के लिए हिंदी पर बोलते हुए एक वामा सदस्य कहती हैं कि ‘हिंदी में कोई अक्षर कैपिटल या स्मॉल नहीं होता, यह हमारी समानता की संस्कृति को दिखाता है.’

इस गोष्ठी को कवर करने आई लोकल मीडियाकर्मी हेमा कहती हैं कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी यह मंच थोड़ा अच्छा लगता है क्योंकि यहां पर वैसी राजनीतिक खींचतान नजर नहीं आती जो आमतौर पर साहित्यिक मंचों पर हुआ करती है. एक अन्य सदस्य हमें बताती हैं कि इस मंच की सदस्यता की अघोषित शर्त ही यही है कि आप शहर के किसी ‘आधिकारिक’ साहित्यिक मंच की सदस्य नहीं हो सकती हैं. वामा मंच न सिर्फ नाम से बल्कि स्वाभाव से भी वामपंथी या कहें विद्रोही है. तभी तो यह साहित्य में फैली मठाधीश संस्कृति का खुलकर और सफलता से विरोध कर पा रहा है. और उन लगभग गुमनाम लेखिकाओं को भी मंच दे रहा है जो कभी-कभार ही अपने घर-रसोई से फुर्सत पाती हैं.

मध्य प्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर की इस शाम में मालवी बयार के साथ हमारे हिस्से में खोपरा पेटीज और आठ फ्लेवर की पानीपूरी का स्वाद, रेनोवेट हो रहे राजवाड़ा के कुछ दृश्य, आड़ा और चोर बाजार की चौड़ी हो गई गलियों में की गई छिटपुट मटरगश्ती भी शामिल है, लेकिन उनका जिक्र जब-तब होता ही रहा है. इस बार इंदौर की ज्यादातर तारीफ उसकी खुदमुख्तारी के लिए.