केसीआर यानी तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव, सार्वजनिक तौर पर यह मानने से क़तराते हैं कि उन्हें, उनकी पार्टी या उसकी सरकार को फिलहाल राज्य में कोई चुनौती है. बल्कि उन्होंने तो समय से पहले विधानसभा भंग (राज्य में अगले साल लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव होने थे) ही इसलिए की है क्योंकि उन्हें लगता है कि यह समय उनके लिए सबसे मुफ़ीद है. बताया जाता है कि केसीआर ज्योतिष और अंक ज्योतिष दोनों पर यक़ीन करते हैं और इसी के हवाले से उन्हें किसी ने बताया था कि अगर नवंबर-दिसंबर में चुनाव हों तो उनकी सरकार बेखटके दूसरे कार्यकाल के लिए लौट सकती है. सो उन्होंने अपने भाग्यशाली छह अंक वाली तारीख़ काे विधानसभा भंग कर दी. छह सितंबर के दिन. फिर कुछ ख़बरें चलीं-चलवाई गईं कि राज्य में चुनाव भी नवंबर या दिसंबर की छह तारीख़ को हो सकते हैं.

लेकिन चुनाव आयोग ने गणित बिगाड़ दिया. उसने पहले तो साफ कह दिया कि चुनाव तारीख़ें अंक ज्योतिष के आधार पर घोषित नहीं होतीं. फिर जब उसने तारीखें घोषित कीं तो अपने इसी विचार पर क़ायम रहा. तेलंगाना में चुनाव के लिए सात दिसंबर की तारीख़ तय हुई.

बात सिर्फ अंक ज्योतिष का गणित बिगड़ने-बिगाड़ने की होती तो भी कुछ बात थी. केसीआर जिस कांग्रेस को अपना इकलौता प्रतिद्वंद्वी मानकर सीधे मुकाबले की उम्मीद कर रहे थे उसने अपने साथ तीन पार्टियाें को जोड़कर उनके सियासी समीकरण भी गड़बड़ा दिए हैं. ऐसे में ही जाहिर तौर पर केसीआर के माथे पर बल तो पड़ ही गए हैं. और ख़बरों की मानें तो अब उन्हें चुनाव से पहले नई बनी परिस्थितियों से मुकाबले की तैयारी करनी पड़ रही है. कुछ ऐसे इंतज़ाम करने पड़ रहे हैं जो समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने के उनके फैसले को सही साबित कर सकें.

इक़लौती चुनौती तिक़लौती हो गई है

जैसा पहले ही बताया गया. केसीआर पहले मानकर चल रहे थे कि राज्य में उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस से होगा और इस सीधे मुकाबले में वे फिर लगातार दूसरी सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाएंगे. वे पड़ाेसी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू से भी तालमेल बिठाकर चल रहे थे. कोंशिश थी कि वे अलग चुनाव लड़ें और ज़्यादातर वोट कांग्रेस के काटें. लेकिन यह सब समीकरण उलट-पुलट हो गया. कांग्रेस और नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने साढ़े तीन दशक का बैर भुलाकर हाथ मिला लिया.

सिर्फ इतना ही नहीं कांग्रेस और टीडीपी ने यह बंदोबस्त भी किया है कि विपक्षी दलों के वोट कम से कम बंटें. इसलिए उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को भी अपने साथ मिलाया, जिसका तेलंगाना के आदिवासी इलाकों में ठीक-ठाक समर्थन है. साथ ही नई नवेली गठित हुई पार्टी तेलंगाना जनसमिति (टीजेएस) को भी साथ जोड़ा गया. इस महागठबंधन ने टीआरएस और केसीआर के माथे पर बल डाल दिए हैं. यह बात केसीआर के बयान से भी काफी हद तक साफ होती है जिसमें उन्होंने इस चार पार्टियों के इस महागठबंधन को ‘अनैतिक’ बताया है.

टीआरएस और केसीआर सिर्फ महागठबंधन से ही परेशान हों ऐसा नहीं है. सत्याग्रह ने अभी पिछले हफ़्ते ही प्रकाशित ख़बर में इस परेशानी के दूसरे पहलू पर भी रोशनी डाली थी. इसके मुतााबिक तेलंगाना के गठन के ठीक बाद 2014 में हुए राज्य के पहले चुनाव में टीआरएस को 34 फीसदी वोट मिले थे. उस वक़्त टीडीपी और कांग्रेस अलग-अलग लड़ी थीं. इनमें से कांग्रेस को 25 फीसदी और टीडीपी को 14.5 फीसदी वोट मिले थे. यानी दोनों दलों का कुल वोट प्रतिशत 39.5 रहा था, जो इस बार इतने के आसपास भी रह गया तो केसीआर के दोबारा सत्ता पहुंचने का रास्ता रोक सकता है.

तो इससे निपटने के लिए केसीआर क्या कर रहे हैं?

ख़बरें कई हैं. इनमें पहली तो यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन से निपटने के लिए केसीआर ने तीसरा मोर्चा खड़ा करने की जुगत भिड़ाई है. इनमें पिछड़े, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति ओर अल्पसंख्यक समुदायों में सक्रिय कुछ संगठन शामिल हैं. बताया जाता है कि केसीआर के पुत्र और राज्य सरकार में मंत्री केटी रामाराव ने ख़ुद इस दिशा में प्रयास किया है और एक अन्य मंत्री टी हरीश राव ने उनकी मदद की है. दोनों ने पिछड़े वर्गों के नेता आर कृष्णैया, मडिगा रिजर्वेशन पोराता समिति के नेता मंडा कृष्ण मडिगा, बहुजन लेफ्ट फ्रंट के नेता तम्मिनेनी वीरभद्रम और बल्लादीर गड्‌डर से बात की है. इनको राज़ी किया है कि वे चुनाव में उतरें. इस तरह अब तीसरा मोर्चा भी मैदान में है. इसमें 28 पार्टियां शामिल बताई जाती हैं. इनमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल है.

इसी क्रम में दूसरी ख़बर यह है कि केसीआर भारतीय जनता पार्टी के साथ सीधे नहीं तो अंदरखाने कोई समझौता कर सकते हैं. केंद्र की मदद से वे तेलंगाना को हर मामले में आंध्र से आगे खड़ा करने के लिए भाजपा से संबंध सहज रखने को तरज़ीह पहले से दे ही रहे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात के ठीक बाद राज्य में विधानसभा भंग की. फिर इस भरोसे के साथ अपने उम्मीदवार भी घोषित कर दिए मानो राज्य के चुनाव दो महीने बाद ही हों, और फिर उनका यह भरोसा सही भी साबित हुआ. चुनाव आयोग के शुरुआती इंकार के बावज़ूद अंत में उसे सात दिसंबर को तेलंगाना में चुनाव की घोषण करनी पड़ी. इससे लगता है कि टीआरएस और भाजपा के बीच कुछ पक रहा है.

केसीआर के लिए एक और अच्छी ख़बर यह कह सकते हैं कि कांग्रेस से उसकी सहयोगी टीजेएस नाराज़ है. उसे शिकायत है कि कांग्रेस ने सभी सहयाेगी दलों से बातचीत के बिना ही राज्य में अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए. वह अपने खाते में आई सीटों की संख्या से नाख़ुश है. बल्कि कहा तो यह तक जा रहा है कि वह भाजपा की तरफ भी रुख़ कर सकती है. हालांकि अभी भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है. लेकिन अगर टीजेएस उसके साथ जुड़ी तो तेलंगाना का चुनावी मुकाबला चतुष्कोणीय होने के साथ-साथ रोचक भी हो सकता है. इस रोचकता में टीआरएस की रुचि भी हो सकती है क्योंकि इससे उसके फिर सत्ता तक पहुंचने का रास्ता जो तैयार होता है.