लोकसभा की कैंटीनों के मेन्यू में पिछले दिनों हैदराबादी बिरयानी समेत सात नये व्यंजन जोड़े गए थे. लेकिन यहां पर खाने की कीमतें पिछली बार कब बढ़ी थीं, किसी को याद नहीं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले काफी समय से लोगों से गैस सब्सिडी त्यागने की अपील कर रहे हैं. पेट्रोल और डीजल के मामले में भी मोदी सरकार न्यूनतम सब्सिडी देने की ही पक्षधर है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें घटने के बाद भी जनता को पेट्रोल-डीजल की लगभग पहले जितनी ही कीमत चुकानी पड़ रही है. इसके साथ ही लोगों को मिलने वाली कई अन्य सब्सिडी भी मोदी सरकार द्वारा घटाई जा रही हैं. प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के अनुसार इससे वित्तीय घाटा कम होगा और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी. ऐसा करने के पीछे उनकी नीयत 'अच्छे दिन' लाने की है. जिसके लिए यह 'कड़वी दवा' तो जनता को खानी ही पड़ेगी.
साल 2013-14 में लोकसभा की कैंटीनों को 14 करोड़ रुपयों से भी ज्यादा की सब्सिडी दी गई है. इन कैंटीनों को मिलने वाली यह सब्सिडी पिछले कुछ साल से लगातार बढ़ी है
लेकिन अच्छे दिन लाने की इस नीयत पर तब जरूर सवाल उठते हैं जब सांसद खुद यह 'कड़वी दवा' खाते नहीं दिखते. जनता को मिलने वाली सब्सिडी में कटौती करने वाले खुद आज भी करोड़ों रुपयों की सब्सिडी ले रहे हैं. सांसदों को सिर्फ भोजन के लिए ही सालाना लगभग 14 करोड़ रूपये से भी ज्यादा की सब्सिडी दी जा रही है. हाल ही में सूचना के अधिकार (आरटीआई) में मिली जानकारी में यह बात सामने आई है.
आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने मई 2015 में लोकसभा सचिवालय से कुछ सूचनाएं मांगी थी. यह सूचनाएं मुख्यतः लोकसभा की कैंटीनों को मिलने वाली वार्षिक सब्सिडी से संबंधित थी. इसी के जवाब में यह तथ्य सामने आया है कि साल 2013-14 में लोकसभा की कैंटीनों को 14 करोड़ रुपयों से भी ज्यादा की सब्सिडी दी गई है. इन कैंटीनों को मिलने वाली यह सब्सिडी पिछले कुछ साल से लगातार बढ़ी है. साल 2012-13 में यह सब्सिडी 12.52 करोड़ और साल 2011-12 में 11.94 करोड़ थी.
सुभाष अग्रवाल की आरटीआई के जवाब में मिली सूचनाओं के अनुसार लोकसभा में कुल चार कैंटीनें हैं. इन चारों ही कैंटीनों को चलाने की जिम्मेदारी उत्तर रेलवे की है. यह कैंटीन मुख्यतः सांसदों और उनके मेहमानों के लिए ही होती हैं. यहां मिलने वाले भोजन के दाम ऐसे हैं कि राज बब्बर के पांच रूपये में भर-पेट भोजन मिलने के बयान को सही साबित कर देते हैं. यहां आज भी चार रूपये में डोसा, उपमा, पोहा या दाल फ्राई और छह रूपये में तो चिकन सैंडविच तक मिल जाया करता है.
जो स्टू वेजिटेबल यहां चार रूपये में हमारे सांसदों को खिलाई जाती है, उसमें लगा सिर्फ कच्चा माल ही 41.25 रूपये का होता है
आरटीआई में यह बात भी सामने आई है कि यहां मिलने वाले भोजन को उसमें लगे कच्चे माल की कीमतों से भी कई गुना कम दामों पर बेचा जाता है. उदाहरण के लिए, जो स्टू वेजिटेबल यहां चार रूपये में हमारे सांसदों को खिलाई जाती है, उसमें लगा सिर्फ कच्चा माल ही 41.25 रूपये का होता है. सुभाष अग्रवाल के अनुसार इस कच्चे माल की कीमत में वह जरूरी खर्च शामिल नहीं हैं जो इस भोजन को पकाने और कैंटीन के कर्मचारियों के वेतन में लगते हैं. यदि इन खर्चों को भी जोड़ दिया जाए, जैसा कि किसी भी होटल में मिलने वाले भोजन में होता ही है, तो यह कहा जा सकता है कि यहां मिलने वाला भोजन अपनी लागत से बीस गुना तक कम कीमत पर मिल रहा है.
लोकसभा की कैंटीनों के भोजन में एक मात्र रोटी ही ऐसी है जिसकी लागत उसकी कच्चे माल की कीमत से 33 पैसा कम है. यहां रोटी की कीमत एक रुपया है जबकि इसमें 77 पैसे का कच्चा माल इस्तेमाल होता है. इस पर सुभाष अग्रवाल कहते हैं, 'क्यों न हमारे इन कानून निर्माताओं को यह रोटी मुफ्त में देकर इस एकमात्र अपवाद को भी समाप्त कर दिया जाए.' वे आगे कहते हैं, 'इन कानून निर्माताओं ने अपने द्वारा ही बनाई गई समिति के जरिये यह तय किया है कि अपने इस भोजन का बोझ वे जनता की कमाई पर लाद देंगे.'
लाखों में वेतन पाने वाले सांसदों को करोड़ों में सब्सिडी दिया जाना उन तमाम नागरिकों के साथ धोखा है जिन्हें गरीबी रेखा से नीचे होने के बावजूद भी अपने भोजन पर इन सांसदों से ज्यादा खर्च करना पड़ता है. सुभाष अग्रवाल कहते हैं, 'वर्तमान केंद्र सरकार सब्सिडी व्यवस्था को समाप्त करने के पक्ष में है. यह करना सही भी है. लेकिन इसकी शुरुआत यदि वे खुद से करें तो इससे उनका ही कद बढेगा.'
'इन कानून निर्माताओं ने अपने द्वारा ही बनाई गई समिति के जरिये यह तय किया है कि अपने इस भोजन का बोझ वे जनता की कमाई पर लाद देंगे.'
संसद की कैंटीनों में मिलने वाले भोजन के दाम आखिरी बार दिसंबर 2010 में संशोधित किये गए थे. लेकिन यह संशोधन भी बस इतने तक ही सीमित था कि जिन भोजन सामग्रियों के दाम पैसों में हुआ करते थे उन्हें पूर्णांक में बदल कर रुपयों में कर दिया गया. इसके बाद से इसमें अब तक कोई बदलाव नहीं किया गया है. ऐसा भी नहीं है कि जनता की तमाम सब्सिडी कम करने वाली मोदी सरकार का ध्यान अब तक इन कैंटीनों पर न गया हो. वर्तमान सरकार का ध्यान इस तरफ गया भी है और उन्होंने कुछ संशोधन किये भी हैं. लेकिन ये संशोधन उन्होंने कीमतों में नहीं बल्कि मेन्यू में किये हैं. मोदी सरकार ने पिछले शीतकालीन सत्र में इन कैंटीनों के मेन्यू में हैदराबादी चिकन बिरयानी और मटन बिरयानी समेत कुल सात व्यंजन और भी जोड़ दिए हैं.
संसद की कैंटीनों में करोड़ों की सब्सिडी वाला भोजन करने के साथ ही कई सांसद ऐसे भी हैं जो अब तक गैस सब्सिडी का मोह भी नहीं त्याग सके हैं और आज भी यह सब्सिडी ले रहे हैं. ऐसे में इन सांसदों द्वारा जनता से सब्सिडी त्यागने की अपील करने पर तुलसीदास की यह पंक्तियां बिलकुल सटीक बैठती हैं, 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे. जे आचरहिं ते नर न घनेरे.'