हमारे संसार में कम पन्नों में बहुत अधिक कहने वाली दो ‘पतली किताबें’ हरेक को पहला लम्हा फुरसत का मिलते ही पढ़नी चाहिए. भगत सिंह की ‘मैं नास्तिक क्यूं हूं’ और चे गेवारा की ‘द मोटसाइकिल डायरीज’. एक बेहद पतली 30 पन्नों की निबंधनुमा किताब और एक कम मोटी ट्रैवलॉगनुमा 150 से थोड़े ज्यादा पन्नों की किताब. दोनों ही सख्त जमीन से उपजे ऐसे जीवन-दर्शन जो महान शख्सियतों का निर्माण कर चुके हैं और पीढ़ियों को अंधेरे के गर्त से बाहर निकालने की रोशनी समेटे हैं.

भगत और चे दोनों की ही उम्र केवल 23 थी, जब उन्होंने धर्म से दूरी बनाकर अपने-अपने जीवन-दर्शन इन पन्नों पर दर्ज किए. एक मोटरसाइकिल पर लैटिन अमेरिका घूमकर मुश्किल जिंदगियों को समझ रहा था और एक इतना समझदार था कि नास्तिकता पर अब तक का सबसे खूबसूरत निबंध 23 साल की कच्ची उम्र में लिख रहा था. उम्र के इतर भी दोनों में असाधारण समानताएं मिलती हैं. दोनों ने ही सशस्त्र क्रांति के रास्ते को अपनाया. दोनों ही उम्दा लेखक थे और पढ़ना बेहद पसंद करते थे. दोनों के चेहरे प्रमुखता से मौजूदा दौर की टी-शर्टों पर नजर आते हैं और दोनों ही को आज का युवा बेहद पसंद करता है.

चे द्वारा डायरी में दर्ज किए अपने यात्रा-संस्मरणों को जिस किताब की शक्ल दी गई, उसकी खास बात है कि उस पर उसी नाम की आलातरीन फिल्म भी बन चुकी है. 2004 में रिलीज हुई ‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ देखना उस अलहदा एहसास से रूबरू होना भी है जो तब होता है जब आपकी किसी पसंदीदा किताब का सुंदर रूपांतरण परदे पर नजर आता है. कई अच्छे फिल्म एडाप्टेशन की ही तरह इस फिल्म की भी खास बात है कि ये दोतरफा असर करती है. अगर आप किताब पढ़कर इस तक पहुंचते हैं तो ये चे के उस युवा जीवन-काल को परदे पर जीवंत कर आपके लिए ज्यादा प्रभावी बना देती है, और अगर आप फिल्म देखकर किताब पढ़ते हैं तो चे के अंदरूनी संघर्ष आपको बेहतर व तफ्सील से समझ आते हैं.

पुरस्कृत और प्रशंसित ब्राजीली निर्देशक वॉल्टर सेलस ने ‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ को स्पेनी भाषा में बनाया था (जिस भाषा का उपयोग अर्जेंटीना वासी चे और उनके दोस्त अल्बेर्तो करते थे), और दो घंटे लंबी इस फिल्म में हमें चे के ‘चे गेवारा’ बनने से पहले की कहानी मिलती है. तब जब वे ‘एर्नेस्तो गेवारा’ थे और 1952 में अपने से उम्र में बड़े और बायोकेमिस्ट दोस्त अल्बेर्तो ग्रेनादो के साथ डॉक्टरी का आखिरी सेमिस्टर शुरू करने से पहले एक खटारा मोटरसाइकिल पर लंबे सफर पर निकले थे. दिमाग में लड़कपन वाले ही सारे ख्याल मौजूद थे और आजाद पंछी की तरह ‘अपने अमेरिका’ को देखने के अलावा लड़कियों के निकट आना ही प्रमुखता से उनकी बातचीत में शामिल रहता था.

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दो घंटे की यह फिल्म तकरीबन एक पूरा घंटा ही सफर में निकले दो नौजवानों की मौज-मस्तियों को समर्पित करती है. यानी उनकी बाहरी यात्रा को. ऐसा करके बहुत खूब काम भी करती है क्योंकि जब एक घंटे बाद अराजकता और अन्याय देखकर चे बदलना शुरू करते हैं तो धीरे-धीरे आ रहे बदलाव को आप क्षण दर क्षण महसूस कर पाते हैं. चे द्वारा जी जा रही खूबसूरत जिंदगी और लैटिन अमेरिकी देशों के खूबसूरत लैंडस्केपों के बीच जब वो चीजें चे देखना शुरू करते हैं जिनका यथार्थ कतई सुंदर नहीं है, तो कंटीले विरोधाभास को फिल्म मुखरता से फिल्म का परदा दे पाती है.

एक दूसरा अच्छा काम फिल्म यह करती है कि अपने नायक को जीवन के इस अध्याय के खत्म होने के आठ साल बाद क्यूबा की क्रांति से जन्मे मशहूर क्रांतिकारी ‘चे गेवारा’ की तरह पहले से ही ट्रीट नहीं करने लगती. फिल्म का नायक अंत तक संपन्न मध्यमवर्गीय परिवार से आया एक साधारण 23 वर्षीय नवयुवक बना रहता है जिसके आसपास मौजूद गरीबी, अत्याचार और भेदभाव की असंख्य कहानियां उसके अंदर धीरे-धीरे कुछ, और फिर बहुत कुछ बदलने लगती हैं.

तीन साल पहले 2001 में बेहद उम्दा मैक्सिकन फिल्म ‘इ टू मामा ताम्बिअन’ (एंड योर मदर टू) से अंतरराष्ट्रीय ख्याति बटोर चुके मैक्सिको मूल के एक्टर गाएल गर्सिया बरनाल भी गेवारा के रोल में इतना सहज और नियंत्रित अभिनय करते हैं कि नायकत्व के दंद-फंद से दूर आप चे के अंदरूनी द्वंदों को गाएल के चेहरे पर आसानी से पढ़ सकते हैं. किसी अभिनेता द्वारा किरदार का बाहरी रूप धर लेना मुश्किल नहीं होता, बल्कि सबसे मुश्किल उसकी आंतरिक यात्रा को व्यक्त कर पाना होता है.

‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ का आखिरी एक घंटा अंदर की इसी यात्रा को समर्पित है. और ये दुर्गम आंतरिक यात्रा है, जो गेवारा अकेले तय करते हैं. अर्जेंटीना से शुरू हुआ उनका सफर चिली और ऐंडीज पर्वतों से होते हुए जब पेरू पहुंचता है तो गरीबी और असमानता से सामना होने के अलावा वे इंका सभ्यता से जुड़े स्थानीय लोगों को पूंजीवादी ताकतों के हाथों दमित होते भी देखते हैं. यहीं पेरू में जब चे और उनका दोस्त माचू पिच्चू पहुंचते हैं तो निर्देशक वॉल्टर सेलस दर्शाने की कोशिश करते हैं कि पहले-पहल चे को सशस्त्र क्रांति का विचार कहां और कैसे आया होगा. ‘बंदूक के बिना क्रांति संभव नहीं है’, विश्व के सात अजूबों में से एक माचू पिच्चू के पत्थरों पर बैठकर चे अपने दोस्त से कहते हैं.

फिल्म इसके बाद अपने अंतिम और सबसे उत्कृष्ट हिस्से में चे को लेकर अमेजन जंगलों में मौजूद एक बस्ती में पहुंचती है. यहां चे और उनका दोस्त कुष्ठ रोग का इलाज करने में डॉक्टरों की मदद करते हैं. यहीं पर आकर चे के अंदर की बेचैनी ठोस विचारों में तब्दील होती है और ये पूरा ही हिस्सा बेहद कुशलता से निर्देशक ने रचा है. एक तरफ झनझनाती गिटार रिफ के बीच ब्लैक एंड व्हाइट स्थिर दृश्यों में नजर आने वाले स्थानीय लोग सीधे आपकी आंखों में झांकते हैं, तो वहीं कुष्ठ रोग से पीड़ित स्थानीय कलाकारों का चयन फिल्म में गजब का रियलिज्म भरता है. और फिर कल-कल बहती एक नदी कैसे भेदभाव का जरिया बन जाती है, चे के अलावा हम दर्शक भी मायूस होकर देखते हैं.

अंत आते-आते ‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ धुंध से ढकी नदी पर लकड़ी के पट्टों पर तैरते चे को उजले भविष्य की कामना करते हुए परिचित दुनिया में वापस ले आती है. यह बताते हुए कि 10,000 किलोमीटर की इस यात्रा ने एक नौजवान को सदैव के लिए बदल दिया है. अर्नेस्तो गेवारा द्वारा तय की गई दुर्गम आंतरिक यात्राएं उन्हें धोकर नया आदमी बना चुकी हैं, जिसे पूरी दुनिया जल्द ही चे गेवारा के नाम से जानने वाली हैं.

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चे गेवारा पर कई और भी प्रसिद्ध फिल्में बनी हैं. कई डॉक्यूमेंट्रीज में से सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रामाणिक का नाम ‘चे : राइज एंड फॉल’ (2007) है जिसमें चे के संपूर्ण जीवन का लेखा-जोखा है. आर्काइवल फुटेज और मौलिक तस्वीरों का उपयोग कर एक अर्जेंटीनी निर्देशक द्वारा बनाई गई इस डॉक्यूमेंट्री में चे के युवा दिनों के दोस्त अल्बेर्तो ग्रेनादो ने भी वापसी की है और उनसे जुड़ी बातें साझा की हैं. इसकी सबसे खास बात है कि चे की मृत्यु के 30 साल बाद जब उनकी कब्र बोलीविया के जंगलों में मिली थी, तब इस डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक ने चे की याद में क्यूबा में हुए राजकीय सम्मान का लाइव फिल्मांकन किया था. इसलिए एक तरह से यह इकलौती फिल्म है जो चे के जीवन को पूरा क्लोजर देती है.

चे जिस देश के धुर-विरोधी रहे उस अमेरिका में भी उन पर कुछ फीचर फिल्में बनीं. चे की मृत्यु के तुरंत बाद उसे भुनाने के लिए ‘लॉरेंस ऑफ अरेबिया’ फिल्म से ख्याति प्राप्त अभिनेता ओमर शरीफ ‘चे!’ (1969) नाम की फिल्म में नजर आए, जो इस क्रांतिकारी को जायज सम्मान नहीं देने की वजह से आज तक आलोचनाओं की शिकार होती है. 2008 में एक दूसरे अमेरिकी निर्देशक – लेकिन इस बार बेहतरीन निर्देशक, जो प्रयोगधर्मिता को हमेशा अवसर देते हैं – स्टीवन सोडरबर्ग ने साढ़े चार घंटे की ‘चे’ निर्देशित की. दो भागों में बनी इस फिल्म का पहला भाग ‘द अर्जेंटीना’ पूरी क्यूबा क्रांति को समर्पित रहा और ‘गुरिल्ला’ नाम का दूसरा भाग बोलीविया में चे द्वारा क्रांति लाने की कोशिशों और उनकी मृत्यु को. साढ़े चार घंटे की पूरी फिल्म में चे गेवारा का किरदार निभाने वाले अति के शानदार अभिनेता बेनिसियो डेल तोरो को 2008 के कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला.

अगर नहीं देखी है, तो ‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ देखने के बाद इस बेहद लंबी मगर बढ़िया फिल्म को भी जरूर देखिए.

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