पिछले दिनों मालदीव में हुए आम चुनावों में पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की पार्टी की बड़ी जीत हुई. भारत के लिए यह अच्छी खबर थी क्योंकि नशीद को भारत का करीबी माना जाता है. चीन समर्थक राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन को हार का मुंह देखना पड़ा.

इस बार के चुनाव में न केवल विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के लिए भी सबसे बड़ा मुद्दा चीन का मालदीव में किया गया निवेश था. प्रचार के दौरान जहां विपक्ष इस निवेश की वजह से मालदीव के कर्ज में डूबने की बात कह रहा था, वहीं अब्दुल्ला यमीन देश की तरक्की के लिए इसे सही ठहरा रहे थे. यही वजह है कि अब्दुल्ला यमीन की हार को मालदीव में चीन के बढ़ते दखल के खिलाफ दिए गए जनमत की तरह भी देखा जा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि मालदीव की नई सरकार चीन से पीछा छुड़ाकर अब फिर से भारत प्रथम की अपनी पुरानी नीति को तरजीह देगी.

लेकिन, क्यों ऐसा होना मुश्किल है

हालांकि, कई जानकार ऐसा नहीं मानते. इनके मुताबिक अगर इस मामले को गहराई से देखें तो साफ़ नजर आता है कि मालदीव की नई सरकार के लिए चीन से पीछा छुड़ा पाना इतना आसान नहीं होने वाला. ये लोग इसका कारण मालदीव में चीन के बड़े निवेश सहित कुछ अन्य पहलुओं को बताते हैं.

चीन के मालदीव में निवेश की बात करें तो इसकी शुरुआत साल 2015 में हुई थी. तब अब्दुल्ला यमीन ने चीनी कंपनियों के लिए विशेष कानून बनाकर निवेश के द्वार खोल दिए थे. इस कानून के तहत उन चीनी कंपनियों को मालदीव में जमीन खरीदने की अनुमति तक दी गई जो एक अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश करना चाहती थीं.

इसके बाद चीनी कंपनियों ने मालदीव में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़ा निवेश किया. मालदीव एयरपोर्ट के पुनर्निर्माण और एयरपोर्ट से लेकर राजधानी माले तक बनाया जा रहा पुल इन कंपनियों को मिले सबसे बड़े प्रोजेक्ट हैं. इसके अलावा मालदीव ने चीन को अपने दो दर्जन से ज्यादा छोटे-छोटे द्वीप भी करीब 50 साल के लिए पट्टे पर दिए हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन द्वीपों पर चीन बंदरगाह और कई अन्य प्रोजेक्ट शुरू कर रहा है. अब्दुल्ला यमीन की सरकार ने विपक्षी पार्टियों के बड़े विरोध के बाद भी चीन को पांच दशकों के लिए पर्यटन के मकसद से देश का चर्चित ‘फेधू फिनोलू’ द्वीप भी पट्टे पर दे दिया. इन सब के अलावा चीन, मालदीव में स्थित प्रमुख बंदरगाहों के पुनर्निर्माण में भी बड़ा निवेश कर रहा है.

मालदीव में हुए चीन के कुल निवेश को देखें तो चीन अब तक मालदीव में करीब 1.5 अरब डॉलर यानी 11 हजार करोड़ की परियोजनाएं शुरू कर चुका है. आंकड़ों पर गौर करें तो मालदीव पर अब तक चीन का करीब 10 हजार करोड़ रुपए का कर्ज चढ़ चुका है, जो उस पर कुल बाहरी कर्जों का 70 फीसदी है. जानकारों की मानें तो मालदीव के लिए चीन का यह कर्ज उतार पाना दशकों तक संभव नहीं लगता. साथ ही चीन मालदीव में जिस तरह के प्रोजक्ट्स में निवेश कर रहा है, नई सरकार के लिए उनसे भी उसे एक झटके में दूर करना संभव नहीं होगा.

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कहते हैं, ‘इस समय चीन मालदीव का सबसे बड़ा निवेशक बन गया है. उस पर चीन का काफी कर्ज भी है. साथ ही और भी चीजें हैं. इन सबको एक झटके में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लिहाजा देश के होने वाले राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह चाहें भी तो वे चीन को अपने यहां से बेदखल नहीं कर सकेंगे.’

कुछ जानकार मालदीव की स्थिति को समझने के लिए श्रीलंका का उदाहरण देते हैं. इनके मुताबिक श्रीलंका में महिंद्रा राजपक्षे की सरकार में वहां की जनता चीन के बढ़ते निवेश से खासा परेशान थी. उसने 2015 में हुए आम चुनाव में चीनी दखल से मुक्ति पाने के लिए हर हाल में सरकार बदलने का मन बना लिया था. उस समय विपक्षी पार्टी के नेता मैत्रीपाला सिरिसेना ने भी इस मुद्दे का जमकर फायदा उठाया और चुनाव जीत गए.

लेकिन, सिरिसेना के सत्ता में आने के बाद श्रीलंका में चीनी निवेश कम होने के बजाय और बढ़ गया. यहां तक कि कर्ज न चुका पाने की वजह से हंबनटोटा बंदरगाह हाथ से निकलने के बाद वहां के लोगों को लगा कि अब श्रीलंका की सरकार चीन से दूरी बनाकर रखेगी. लेकिन, राष्ट्रपति सिरिसेना ने इस घटना से कोई सबक न लेते हुए चीन को अन्य प्रोजेक्ट्स में निवेश के लिए हरी झंडी दिखा दी.

भारत के लिए संभावनाएं

साल 2012 से पहले तक मालदीव का चीन से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था. तब मालदीव हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए भारत पर ही निर्भर हुआ करता था. मालदीव में चीन के कदम 2012 में पड़े जब उसने इस समुद्री देश में अपना दूतावास खोलने का निर्णय लिया. इसके करीब एक साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मालदीव का दौरा किया और यहीं से मालदीव और चीन के बीच करीबियां बढ़ने लगीं.

चीन के करीबी माने जाने वाले मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन (बाएं) चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ
चीन के करीबी माने जाने वाले मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन (बाएं) चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ

बीते छह सालों में जैसे-जैसे चीन का मालदीव में दखल बढ़ा वैसे-वैसे वह भारत से दूर होता गया. भारत और मालदीव के बीच रार इस साल फरवरी में तब खुलकर सामने आ गई जब राजनीतिक गतिरोध के चलते राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन ने देश में आपातकाल लगा दिया. जहां चीन ने यमीन के इस फैसले का समर्थन किया वहीं भारत ने इसकी आलोचना की. इसके बाद मालदीव ने भारत द्वारा दिए गए हेलीकॉप्टर और अन्य सुविधाएं भी लौटाने का ऐलान कर दिया. उसने अपने यहां काम कर रहे दो हजार भारतीयों के वीजा भी रिन्यू करने से इंकार कर दिया. इस दौरान भारत और मालदीव के बीच स्थिति ऐसी हो गई थी कि भारतीय विदेश मंत्रालय को भारतीय पर्यटकों से मालदीव न जाने की अपील करनी पड़ी.

हालांकि, बीते महीने हुए चुनाव में भारत के करीबी माने जाने नेता मोहम्मद सोलिह और मोहम्मद नशीद की जीत को भारत के लिहाज से काफी बेहतर माना जा रहा है. जानकारों की मानें तो मालदीव की पिछली सरकार के दौरान दोनों देशों के बीच बढ़ी तल्‍खी और दूरी निश्चित ही अब खत्म हो जाएगी. लेकिन, कई जानकार यह भी कहते हैं कि अब भारत का मालदीव पर वह एकाधिकार बन पाना मुश्किल लगता है जो आज से पांच-छह साल पहले हुआ करता था क्योंकि तब यह समुद्री देश पूरी तरह से भारत पर ही निर्भर था.

भारत की संभावनाओं पर प्रोफेसर हर्ष वी पंत कहते हैं, ‘सोलिह के राष्‍ट्रपति बनने के बाद भी यह कहना गलत ही होगा कि रातोंरात मालदीव में सारी चीजें भारत के पक्ष में हो जाएंगी. फिलहाल ऐसा नहीं होने वाला है. लेकिन इतना है कि यमीन सरकार के दौरान जो दूरी दोनों देशों के बीच बन गई थी वह जरूर खत्म हो जाएगी.’

हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि मालदीव की नई सरकार एक और लिहाज से न केवल भारत बल्कि अमेरिका को भी बड़ी राहत दे सकती है. दरअसल, बीते सालों में मालदीव के समुद्री क्षेत्र में चीनी नौसेना की गतिविधियां काफी बढ़ी हैं. साथ ही बीते अप्रैल में ही खबरें आईं थीं कि चीन मालदीव में एक सैन्य अड्डा भी बनाने की योजना पर काम कर रहा है जिस पर वह लड़ाकू विमान और पनडुब्बियां रखेगा. इन खबरों ने भारत और अमेरिका को चिंता में डाल दिया था क्योंकि ऐसा होने के बाद चीन एक साथ हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में होने वाली गतिविधियों पर नजर रख सकेगा. साथ ही यहां से हिंद महासागर में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डा गिओदार्सिया भी चीन की जद में होगा.

विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि मालदीव की नई सरकार चीन को केवल व्यवसायिक संबंधों तक सीमित कर भारत और अमेरिकी की इस परेशानी को दूर कर सकती है. इन लोगों की मानें तो इससे पहले जब श्रीलंका के आसपास चीनी नौसेना की गतिविधियां बढ़ी थीं तब भारत की नाराजगी के बाद ही श्रीलंकाई सरकार ने इन पर रोक लगवाई थी.