प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ का एक ट्वीट विवाद का सबब बन गया है. सोशल मीडिया में इसे लेकर काफी हंगामा हुआ तो इस ट्वीट को हटा दिया गया. लेकिन इसे लेकर बहस जारी है.

यह मामला तब शुरू हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को हरियाणा के रोहतक में किसान नेता सर छोटूराम की 64 फ़ुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया. इसी दौरान पीएमओ ने नरेंद्र मोदी का बयान ट्वीट किया. इसमें लिखा था, ‘ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसानों की आवाज़, जाटों के मसीहा, रहबर-ए-आज़म, दीनबंधु सर छोटूराम जी की इतनी भव्य प्रतिमा का अनावरण करने का अवसर मिला.’

सोशल मीडिया पर इस ट्वीट को लेकर विवाद छिड़ गया. लोगों ने प्रधानमंत्री पर जातिवाद फैलाने के आरोप लगाए. उनका तर्क था कि सर छोटूराम को ‘जाट मसीहा’ कहना उनका कद घटाने जैसा है.

बीबीसी से बात करते हुए अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक का कहना था, ‘सर छोटू राम का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनकी वजह से अविभाजित पंजाब प्रांत में न तो मोहम्मद अली जिन्ना की चल पायी और ना ही हिंदू महासभा की. वो उस पंजाब प्रान्त की सरकार के मंत्री थे जिसका आज दो तिहाई हिस्सा पकिस्तान में है. उन्हें सरकार का मुखिया बनने का अवसर मिला तो उन्होंने कहा कि तत्कालीन पंजाब प्रांत में मुसलमानों की आबादी 52 प्रतिशत थी. इसलिए उन्होंने किसी मुसलमान को ही मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की और खुद मंत्री बने रहे. इसलिए ही उन्हें ‘रहबर-ए-हिन्द’ की उपाधि दी गयी थी.’

कई जाट नेता सर छोटूराम के राजनीतिक कद को सरदार वल्लभ भाई पटेल से भी ऊंचा मानते हैं. उनके मुताबिक दलित और पिछड़े लोगों ने उन्हें ‘दीन बंधु’ माना जबकि अंग्रेज़ों ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी थी और इसके पीछे था छोटूराम का काम. कांग्रेस ने भी इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ‘प्रधानमंत्री जी! इस ट्वीट में आपने दीनबंधु रहबरे आज़म सर छोटूराम को जाति के बंधन में बांधने की कोशिश की है. ये आपकी संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति का जीता-जागता सबूत है. जो जाति-धर्म के विभाजन से बाहर नहीं आती.’