रफाल लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी दसॉ एविएशन के कुछ आंतरिक दस्तावेजों से हुआ एक नया खुलासा इस मामले में मोदी सरकार की मुश्किल और बढ़ा सकता है. इन दस्तावेजों के मुताबिक रफाल विमानों के लिए भारत के साथ हुए सौदे में रिलायंस डिफेंस को साझीदार बनाए बिना कंपनी को यह सौदा हासिल नहीं हो सकता था. खोजी पत्रकारिता करने वाले फ्रांस के मीडिया संस्थान मीडिया पार्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में यह दावा किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक इन दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि यह सौदा ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ जैसा मामला था.

इस रिपोर्ट में दसॉ एविएशन के दस्तावेजों के हवाले से लिखा गया है कि 11 मई, 2017 को कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी लॉइक सीगालेन ने अपने स्टाफ को बताया था कि रफाल बनाने के लिए रिलायंस डिफेंस के साथ संयुक्त उपक्रम ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ जैसा मामला था. सीगालेन ने आगे यह भी कहा था कि विमान सौदा हासिल करने के लिए यह करना कंपनी की ‘बाध्यता’ थी. एनडीटीवी के मुताबिक उसने इस खबर के संबंध में दसॉ एविएशन का पक्ष जानने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

रफाल विमान सौदे से जुड़ी यह खबर ऐसे मौके पर आई है जब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण बुधवार की रात को तीन दिवसीय यात्रा पर फ्रांस रवाना हुई हैं. यहां वे दसॉ की उस फैक्टरी में भी जाएंगी जहां भारत के लिए 36 रफाल विमानों का निर्माण हो रहा है.

भारत ने 2016 में फ्रांस सरकार के साथ 58,000 करोड़ रुपए की लागत से 36 रफाल लड़ाकू विमान खरीदने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि मोदी सरकार ने यह सौदा पूर्व (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय) के मुकाबले तीन गुना ज्यादा कीमत पर किया है. साथ ही यह भी कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को फायदा पहुंचाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसे इस सौदे में साझीदार बनवाया. हालांकि रक्षा मंत्री से लेकर वित्त मंत्री और तमाम केंद्रीय मंत्री कई बार इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं.