बच्चन और गांधी-नेहरू परिवार की कहानी बनते-बिगड़ते रिश्तों की महागाथा है. आधुनिक भारत के सबसे बड़े रहस्यों में से सबसे ज्यादा उत्सुकता पैदा करने वाला रहस्य भी इन्हीं दो दिग्गज परिवारों से जुड़ा हुआ है. दशकों तक बेहद करीब रहा बच्चन व गांधी-नेहरू परिवार आखिर एक-दूसरे से दूर कैसे हुआ? वे क्या वजहें रहीं जिसने इन परिवारों को इतना एक-दूसरे से छिटकाया कि सार्वजनिक रूप से अमिताभ बच्चन कहने लगे कि वो लोग राजा हैं (गांधी परिवार) और हम रंक (बच्चन परिवार). 2004 में जया बच्चन को एक राजनीतिक सभा में कहना पड़ा, ‘जो लोग हमें राजनीति में लाए वो हमें बीच मंझधार छोड़ गए. जब हम मुसीबत में थे उन्होंने हमसे किनारा कर लिया. वे लोगों को धोखा देने के लिए जाने जाते हैं.’ पलटकर कांग्रेस को केंद्र की सत्ता में आते ही ‘बदला’ लेना पड़ा और 2004 के बाद कई मामूली वजहों से इनकम टैक्स विभाग ने अमिताभ बच्चन को परेशान करना जारी रखा.

इसी सितम्बर में प्रकाशित हुई वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई की नयी किताब ‘नेता अभिनेता : बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स’ आधुनिक भारत के इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की पुरजोर कोशिश करती है. एक पूरा अध्याय (‘फ्रेंड्स इन हाई प्लेसिस’) बच्चन और गांधी-नेहरू परिवार के शुरूआती दौर की दोस्ती से लेकर करीब छह दशक तक चले आत्मीय संबंधों और इस दौरान पैदा होते रहे फ्रिक्शन को विस्तार से चित्रित करता है. भले ही कोई आतिशी रहस्योद्घाटन किताब में नहीं मिलता – जो वजहें पहले से सामने आ चुकी हैं उनसे हटकर - लेकिन लंबे वक्त से हाई-प्रोफाइल नेताओं की निजी जिंदगियों को करीब से जानते-समझते रहे रशीद किदवई बेहद तफ्सील से रिश्तों का जिक्र करने के साथ-साथ कई बार निजी खुलासों से अचंभित करते चलते हैं.

कोई फिल्म पत्रकार अगर इस विषय पर लिखता तो उसका नजरिया शर्तिया अलग होता, वो राजनीति को अजनबी नजर से देखता और फिल्मों से जुड़े बच्चन के प्रति शायद थोड़ा नरम होता. लेकिन दशकों से राजनीति कवर कर रहे किदवई ने अपने इसी चिर-परिचित स्पेस में खड़े होकर पावर और महत्वाकांक्षाओं में उलझे रिश्तों की इस महागाथा को देखा है और बच्चन को कटघरे में ज्यादा तो गांधी परिवार को उनसे थोड़ा कम खड़ा किया है. इस अध्याय को लिखने की उनकी शैली भी एक कारण है कि यह पारिवारिक महागाथा एक रोमांचक थ्रिलर वाला आनंद पाठकों को देती है.

बच्चन और गांधी-नेहरू परिवार की दोस्ती की नींव हरिवंश राय बच्चन और जवाहर लाल नेहरू के जमाने में पड़ी थी. यहां उस दौर की दोस्ती और गुजरते वक्त के साथ गाढ़े हुए संबंधों की बात करना जरूरी है ताकि सही संदर्भ में अलगाव को देखा जा सके. बहुत बड़ी वजहों के अलावा क्यों छोटी-मोटी बातें भी दोनों परिवारों को बाद में चलकर चुभती रहीं, यह समझा जा सके. किदवई किताब में लिखते हैं कि नेहरू परिवार के इलाहबाद वाले घर ‘आनंद भवन’ से यह दोस्ती परवान चढ़ी थी. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के चौथे खंड ‘दशद्वार से सोपान तक’ का हवाला देते हुए किदवई बताते हैं कि सरोजनी नायडू ने 1942 में हरिवंश राय और तेजी को पहली बार नेहरू परिवार में आमंत्रित किया था और वहीं से तेजी और इंदिरा के बीच मृत्यु तक जीवित रहने वाली दोस्ती की शुरुआत हुई.

सरोजनी नायडू ने नाटकीयता के साथ हरिवंश और तेजी का परिचय ‘कवि और उसकी कविता’ कहकर दिया था, जिसे उस वक्त अविवाहित रहीं इंदिरा ने इतना पसंद किया कि आगे चलकर विदेशी मेहमानों से तेजी को मिलाते वक्त वे यही तार्रुफ इस्तेमाल करने लगीं.

इंदिरा व तेजी के बीच की गहरी दोस्ती का जिक्र खुद अमिताभ बच्चन ने खालिद मोहम्मद की किताब ‘टू बी और नॉट टू बी : अमिताभ बच्चन’ में विस्तार से किया है. उसका हवाला देते हुए किदवई लिखते हैं कि तेजी बच्चन बेहद खूबसूरत महिला थीं और उनके लाहौर वाले अदब के चर्चे आनंद भवन तक पहुंच चुके थे. इसलिए शुरू-शुरू में जब वे नेहरू परिवार से मिलने उनके घर जातीं तो विजया लक्ष्मी पंडित की बेटियां नयनतारा व चंद्रलेखा सज-संवर कर उनका इंतजार किया करतीं, इंदिरा गांधी के संग, ताकि सभी मिलकर उस वक्त के फैशन पर बात कर सकें और तेजी की राय जान सकें.

इसी किताब में अमिताभ बच्चन अपनी मां तेजी कौर सूरी और इंदिरा गांधी के बीच दोस्ती गहराने की एक और वजह भी बताते हैं. उनके मां-बाबूजी के अंतरजातीय विवाह को पारसी फिरोज गांधी व इंदिरा के मुश्किलों बाद संभव हुए विवाह से जोड़ते हैं. अमिताभ के मुताबिक, ‘एक सिख लड़की और कायस्थ लड़के का विवाह मेरी मां के पिता को नागवार था. वो इलाहबाद की पहली इंटर-कास्ट मैरिज थी. और एक लिहाज से यह फिरोज और इंदिरा की शादी जैसी ही थी. दोनों जोड़ियों में कुछ समानता थी जिस वजह से नेहरू परिवार के साथ (मां-बाबूजी की) दोस्ती परवान चढ़ी.’

बाद में चलकर न सिर्फ इंदिरा गांधी ने अमिताभ बच्चन के फिल्मी करियर को स्थापित करने में भरपूर मदद की – किताब में जिक्र है कि कैसे इंदिरा ने सीधे नरगिस और सुनील दत्त से बात की और सुनील दत्त की होम प्रोडक्शन ‘रेशमा और शेरा’ (1971) में बच्चन को काम मिला – बल्कि उनका ख्याल हमेशा अपने बच्चों – राजीव व संजय गांधी – की तरह ही रखा.

इमरजेंसी के बाद वाले वक्त में दोनों परिवारों के बीच आई तल्खी के बावजूद जब ‘कुली’ (1983) फिल्म की शूटिंग के दौरान बच्चन बुरी तरह घायल होने की वजह से जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे, तब भी राजीव व सोनिया के अलावा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अस्पताल में उनके पास मौजूद थीं. अपने पारिवारिक पंडित से कहकर उन्होंने बच्चन के लिए खास पूजा-अर्चना करवाई थी और एक माने हुए बाबा का ताबीज सफेद कपड़े में लपेटकर बच्चन के तकिए के नीचे दस दिनों तक रखा था. धीरे-धीरे बच्चन स्वस्थ होने लगे और दोनों परिवारों के बीच की खटास खत्म होनी शुरू हो गई.

राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन का बचपन भी साथ बीता था. बच्चन उम्र में राजीव गांधी से दो साल बड़े थे और जब राजीव दो साल के थे तब से दोनों के बीच इलाहाबाद के समय से दोस्ताना था. स्कूल आते-आते दोनों के परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गए और राजीव की ही तरह अमिताभ के लिए भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आवास तीन मूर्ति भवन के दरवाजे हमेशा खुले रहने लगे. बच्चन अनुसार, ‘राजीव और संजय दून स्कूल में पढ़ते थे और अजिताभ तथा मैं नैनीताल में. हम सभी की छुट्टियां साथ ही होती थीं तो हम लोग साथ ही घूमते-फिरते और हर दिन राष्ट्रपति भवन के स्वीमिंग पूल में स्वीमिंग किया करते. बाद में राजीव कैम्ब्रिज चले गए, लेकिन तब भी चारों मौका मिलते ही मिलते. लौटकर जब उन्होंने प्लेन उड़ाने का अभ्यास करना शुरू किया तो मैं घंटो दिल्ली के फ्लाइंग क्लब में उनके साथ रहता. राजीव, संजय, अजिताभ और मैं पक्के दोस्त थे.’

सोनिया गांधी के राजीव के जीवन में आने के बाद वे भी बच्चन और उनकी इस मंडली का हिस्सा बन गईं. वक्त मिलते ही यंग अमिताभ, अजिताभ, संजय, राजीव व सोनिया इंडिया गेट के लॉन में घंटों साथ बिताया करते व साथ आइसक्रीम का लुत्फ लेते. ये रिश्ते आगे चलकर भी प्रगाढ़ बने रहे और राजीव-सोनिया के बच्चे - राहुल व प्रियंका – बचपन में बच्चन को ‘मामू’ बुलाया करते!

राजीव गांधी ने भी बच्चन के फिल्म करियर को आगे बढ़ाने में काफी मदद की थी. न सिर्फ उनके संघर्ष के दिनों में वे बच्चन संग मुंबई आया-जाया करते थे (उनका महमूद के साथ वाला एक मजेदार किस्सा किताब में दर्ज है) बल्कि बहुत बाद में स्वयं प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे हमेशा बच्चन के साथ खड़े रहे. किदवई बताते हैं कि ‘खुदा गवाह’ (1992) की शूटिंग के दौरान जब कुछ दृश्यों को युद्ध प्रभावित अफगानिस्तान में शूट करना जरूरी हुआ तो राजीव गांधी ने न सिर्फ फिल्म की टीम का अफगानिस्तान पहुंचना मुमकिन करवाया बल्कि स्वयं अफगानी राष्ट्रपति से बात कर अपने दोस्त की सुरक्षा का वचन तक लिया. ‘खुदा गवाह’ की लॉन्च पार्टी में इस घटना को याद करते वक्त बच्चन फफक कर रो पड़े थे क्योंकि कुछ ही वक्त पहले मई, 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी.

दो पीढ़ियों के बीच सतत जारी रहे इन गाढ़े रिश्तों के बावजूद कई बार बच्चन व गांधी-नेहरू परिवार के बीच की तकरार सार्वजनिक हुई. वह इकलौती वजह जिसने रिश्तों को पूरी तरह खत्म कर दिया उस पर हर कोई केवल कयास लगा सकता है, लेकिन रशीद किदवई अपनी किताब में सिलसिलेवार उन वजहों को तफ्सील से बयां करने का जरूरी काम करते हैं.

किदवई के अनुसार, रिश्तों में पहली दरार इमरजेंसी के बाद नजर आई थी. 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के वक्त अमिताभ बच्चन ने मुखरता से इसकी वकालत की थी जिस वजह से मीडिया को उन्हें उनके दोस्त संजय गांधी के समकक्ष मानना पड़ा था. रशीद किदवई उनकी तीखी आलोचना करते हुए किताब में लिखते हैं कि जब फिल्मी दुनिया पर इमरजेंसी की मार पड़ी तब भी बच्चन खामोश रहे और उस दौर में परदे पर तो सत्ता का प्रतिकार करने वाले एंग्री यंग मैन की भूमिकाएं बखूबी निभाते रहे (‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’), लेकिन असल जिंदगी में सत्ता प्रतिष्ठान के सामने झुककर गांधी-नेहरू परिवार से गलबहियां करने में उन्हें कोई परेशानी महसूस नहीं हुई.

उनकी असली परेशानी इमरजेंसी खत्म होने के बाद शुरू हुई, जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद बच्चन परिवार को इसकी विभीषिका का अंदाजा हुआ और अमिताभ बच्चन ने खुद को गांधी-नेहरू परिवार से दूर करना शुरू कर दिया. संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी के हवाले से किदवई लिखते हैं कि इस दौरान अपनी छवि सुधारने के लिए जब गांधी परिवार ने बच्चन परिवार को एक सार्वजनिक रैली का हिस्सा बनने का न्यौता दिया तो तेजी बच्चन ने साफ इंकार कर दिया. यह कहकर कि ऐसा करने से उनके बेटे के सफल फिल्मी करियर पर असर पड़ेगा. संजय गांधी को यह बात बिलकुल नहीं सुहाई वहीं आगे चलकर बच्चन ने संजय गांधी के मुंबई आने पर भी उनकी मेहमाननवाजी में कोर-कसर छोड़ना शुरू कर दिया. जबकि ऐसा पहले कभी नहीं होता था.

वरुण गांधी के अनुसार यह दूरियां नजदीकियों में वापस तभी बदलीं जब राजीव गांधी ने राजनीति में प्रवेश किया. संजय गांधी की असामायिक मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी के कहने पर राजीव 80 के दशक के शुरुआती सालों में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने, और कुछ वक्त बाद ही ‘कुली’ (1983) फिल्म के दौरान बच्चन के साथ घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने गांधी-नेहरू व बच्चन परिवार को वापस करीब ला दिया. बच्चन और राजीव गांधी की दोस्ती वापस से पुख्ता हुई और इंदिरा गांधी की हत्या (1984) के बाद अटल बिहारी बाजपेयी व हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे कद्दावर नेताओं का सामना करने के लिए राजीव गांधी बच्चन को राजी कर राजनीति में ले आए.

लेकिन, बोफोर्स स्कैंडल में राजीव गांधी के अलावा बच्चन का भी नाम आने के कारण बचपन की यह दोस्ती 1987 में टूटने की कगार पर पहुंच गई. अमिताभ बच्चन को ‘बोफोर्स दलाल’ बुलाया जाने लगा और दुखी होकर उन्होंने राजनीति से इस्तीफा दे दिया. यह वो वक्त था जब बच्चन और गांधी-नेहरू परिवार के बीच के डायनामिक्स हमेशा के लिए बदल गए. किदवई अपनी किताब में यह अंदेशा भी जताते हैं कि न तो राजीव गांधी चाहते थे कि बच्चन इस्तीफा दें न ही सोनिया. बल्कि अपनी छवि बेदाग रखने के लिए बच्चन ने खुद इस्तीफा देना स्वीकारा. किदवई इससे पहले यह भी विस्तार से बयां करते हैं कि इलाहबाद से चुनाव जीतने के बाद अपने नए राजनीतिक प्रभुत्व का बच्चन खूब इस्तेमाल किया करते थे और कई मंत्रालयों में अपनी पसंद के अधिकारियों की नौकरी लगवाने की सिफारिशें भी उनकी तरफ से बेहिचक आती रहती थीं.

रिश्तों में तीसरी बड़ी दरार राजीव गांधी की हत्या (1991) के बाद आना शुरू हुई. चारों तरफ से अकेली पड़ गईं सोनिया गांधी को बच्चन की तरफ से वह सहारा नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी. किदवई साफ-साफ कहते हैं कि यह आश्चर्यजनक है कि हमेशा एक-दूसरे के लिए खड़े रहने वाले दोनों परिवार ‘राजनीति’ की वजह से एक-दूसरे से दूर हो गए और उनके रिश्तों में कड़वाहट भर गई.

सोनिया गांधी बच्चन को ‘अमित’ कहकर बुलाती थीं और उन्हें अपना भाई मानती थीं. वे जब पहली बार शादी से पहले हिंदुस्तान आईं तो 43 दिन बच्चन परिवार के साथ ही रहीं. इंदिरा गांधी चाहती थीं कि उनकी होने वाली बहु हिंदुस्तानी तौर-तरीके सीखे तथा सोनिया ने भी तेजी बच्चन को अपनी तीसरी मां मानते हुए सारे हिंदुस्तानी रीति-रिवाज उनके घर पर ही सीखे. पहली मां इटली, दूसरी इंदिरा गांधी और तीसरी तेजी बच्चन. इसलिए जब बच्चन और उनकी पत्नी से गांधी परिवार को वह सहारा नहीं मिला जो राजीव गांधी के सबसे करीबी मित्र से उन्हें अपेक्षित था, तो सोनिया का दिल हमेशा के लिए चटख गया.

इन वजहों के अलावा भी किदवई कई दूसरे कम चर्चित कारणों को रिश्तों के बिखर जाने की वजह बताते हैं. बच्चन की कंपनी एबीसीएल के अथाह कर्जों में डूबने के बावजूद गांधी परिवार ने उनकी मदद नहीं की. ज्योतिष में जरूरत से ज्यादा विश्वास करने वाले बच्चन ने तब सोनिया गांधी की ‘वर्ल्ड क्लास कुंडली’ बनवाई जब 1997 के आसपास उनपर राजनीति में आने का दबाव था, और बच्चन ने उस कुंडली के आधार पर सोनिया को राजनीति में न उतरने की लगातार सलाह देकर उनका आत्मविश्वास गिराने का काम किया. फिर दोनों परिवारों की बहुओं की भी एक-दूसरे से हमेशा कम ही बनी. जया बच्चन को कभी समझ नहीं आया कि अमिताभ और अजिताभ सोनिया गांधी का इतना आदर क्यों करते हैं. बाद में चलकर जया बच्चन ने उत्तर प्रदेश में आयोजित हुई एक राजनीतिक रैली में जमकर गांधी-नेहरू परिवार पर हमले बोले (अमर सिंह की सोहबत में आकर) और इस घटना ने भी सोनिया गांधी को खासा विचलित किया.

इन सबके अलावा किदवई एक खास घटना की तरफ भी पढ़ने वालों का ध्यान खींचते हैं, जो बताती है कि आखिर में बड़े से बड़ा आदमी छोटी-मोटी बातों को ही ईगो का सवाल बनाकर रिश्ते खराब कर लेता है. इस घटना को किदवई ‘ब्रेकिंग पाइंट’ की संज्ञा देते हैं जिसके बाद दोनों परिवारों के रिश्ते हमेशा के लिए टूट जाते हैं. घटना 1997 की है जब प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा की शादी उसी साल की 18 फरवरी को होना तय हुई थी. लेकिन बहुत पहले से यह तारीख निर्धारित होने के बावजूद अमिताभ बच्चन ने अपनी बेटी श्वेता और उद्यमी निखिल नंदा की शादी एक दिन पहले करना तय कर दी! किदवई लिखते हैं कि कांग्रेस के सूत्र साफ-साफ कहते हैं कि श्वेता बच्चन की ‘चट मंगनी पट ब्याह’ वाले अंदाज में हुई शादी की तारीख सिर्फ इसलिए 17 फरवरी रखी गई ताकि अगले दिन होने वाली प्रियंका गांधी की बहुचर्चित शादी को ‘ओवरशैडो’ किया जा सके!

21वीं सदी आते-आते दोनों परिवारों के बीच ऐसी अमिट दूरियां आ गईं कि जब 2007 में तेजी बच्चन का निधन हुआ तब गांधी परिवार का कोई भी सदस्य उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ. गांधी परिवार द्वारा अमिताभ के भाई अजिताभ के यहां फूल व गुलदस्ते अवश्य भेजे गए लेकिन जिन तेजी बच्चन की वजह से बच्चन और गांधी-नेहरू परिवारों के बीच लगभग छह दशक तक दोस्ती और प्यार रहा, उन्हें अलविदा कहने के लिए उनकी सबसे घनिष्ठ मित्र (स्वर्गीय इंदिरा गांधी) के परिवार से कोई नहीं आया. उन्हें तीसरी मां कहने वाली सोनिया गांधी भी नहीं.

76 के हो चुके अमिताभ बच्चन खुद को हमेशा ही एक गैर राजनीतिक व्यक्ति बताते आए हैं. लेकिन रशीद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि गांधी परिवार से दूर होने के दौरान व बाद में कई राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के करीब जाने की उनकी कोशिशों ने भी सोनिया गांधी को काफी परेशान किया. अनगिनत सालों तक कांग्रेसी रहने के बाद वे मुलायम सिंह यादव व अमर सिंह जैसे समाजवादियों के करीब हुए, कुछ आगे चलकर कांग्रेस के घुर-विरोधी व हिंदुत्व की सांप्रदायिक राजनीति करने वाले बाल ठाकरे से दोस्ती गांठी, और फिर सभी हिंदुस्तानी नेताओं के एकदम विलोम राजनेता कहलाए जाने वाले नरेंद्र मोदी के इतने अधिक करीबी हो गए कि उनके कभी कांग्रेसी होने का नामो-निशान तक मिट गया. बच्चन के इस कदम, या कहें कि मास्टर-स्ट्रोक ने, उन्हें हमेशा के लिए गांधी परिवार से दूर कर दिया.

कहना न होगा, अगर पॉलिटिक्स एक थाली है, तो अमिताभ बच्चन अपने अब तक के सार्वजनिक व निजी जीवन में कई दफा एकदम विपरीत विचारधाराओं वाले नेताओं की तरफ लुढ़क चुके हैं. जरूरत अनुसार अपनी जगह बदलते रहे हैं, बहती हवा के साथ पलटते रहे हैं. ऐसे में मुक्तिबोध की एक पंक्ति उधार लेकर सदी के महानायक से यह सवाल पूछना जरूरी-सा कोई काम लगता है – पार्टनर, (आखिर) तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?