देश में जब भी कोई बड़ी घटना होती है तो अक्सर कहा जाता है कि ख़ुफ़िया एवं निगरानी तंत्र सफल नहीं रहा. फिर इस तरह की ख़बरों का खंडन करती कुछ जानकारियां सामने आती हैं. इनमें बताया जाता है कि ख़ुफ़िया एवं तंत्र ने तो अपना काम कर दिया था, सुरक्षा एजेंसियों ने उससे मिली सूचनाओं को गंभीरता से नहीं लिया. इसलिए अमुक घटना हुई. इसी तरह चलते-चलते एक दिन मामला ठंडा पड़ जाता है. हालांकि डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) से जुड़े एक हालिया मामले ने निगरानी तंत्र की पोल खोल दी है.

डेक्कन क्रॉनिकल ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि डीआरडीओ के सभी कर्मचारियों पर ख़ुफ़िया एवं निगरानी तंत्र की नज़दीकी निगाह होती है. फिर वे चाहे वैज्ञानिक हों, इंजीनियर या अन्य कर्मचारी. उनकी हर गतिविधि, संपर्क, सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता आदि पर नज़र रखी जाती है. इसके लिए डीआरडीओ ने ही बाक़ायदा एक प्रयोगशाला निगरानी विभाग बनाया हुआ है. इसमें राज्य पुलिस की ख़ुफ़िया शाखा के प्रतिनिधि भी शामिल रहते हैं.

एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर माना, ‘डीआरडीओ में काम करने वाले वैज्ञानिक, इंजीनियर आदि देश के लिए ज़वाबदेह होते हैं. वे संगठन की प्रयोगशालाओं में रक्षा-प्रतिरक्षा से जुड़ी अतिसंवेदनशील परियोजनाओं में शामिल होते हैं. इसलिए उन पर सख़्त निगरानी स्वाभाविक है. उन्हें प्रयोगशालाआें में या वहां से कोई भी सीडी, फ्लाॅपी, पेन ड्राइव, मोबाइल फोन अथवा इसी तरह का अन्य कोई उपकरण लाने-ले जाने की इजाज़त नहीं होती है.’

अलबत्ता इस ऐहतियात और निगरानी के बावज़ूद डीआरडीओ से संबद्ध इंजीनियर- निशांत अग्रवाल ने ब्रह्मोस मिसाइल से जुड़ी जानकारियां पाकिस्तान तक कैसे पहुंचाईं, इसका ज़वाब किसी के पास नहीं है. निशांत को हाल में ही पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी- आईएसआई (इंटर सर्विसेज़ इंटेलीजेंस) के लिए जासूसी करने के आरोप में ग़िरफ़्तार किया गया है. निशांत का नाम ऐसे ही मामले में ग़िरफ़्तार बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) के जवान अच्युतानंद मिश्रा से पूछताछ के दौरान सामने आया था.