यह बात साल जुलाई 2007 की है. स्टॉक मार्केट में टेलीकॉम कंपनियों के शेयरों में आग लग गई. भारती एयरटेल, आरकॉम आदि के शेयरों की बेतहाशा ख़रीदारी हो रही थी. शाम को अनिल धीरुभाई अंबानी समूह के कर्मचारियों को ई-मेल आया. इसमें लिखा था. ‘समूह की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशन (आरकॉम) का पूंजीकरण (वैल्यूएशन) एक लाख करोड़ रुपये को छूने पर आप सभी को बधाई!’ उस दिन भारती एयरटेल का पूंजीकरण डेढ़ लाख करोड़ के नज़दीक था.

लेकिन इस उछाल से कई हैरान थे. आरकॉम के शेयर तब उड़ान भर रहे थे जब कुछ ही दिन पहले मुकेश अंबानी ने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान दोनों भाइयों में आपसी मतभेद की बात कहकर स्टॉक मार्केट गिरा दिया था. शेयरों के भाव में इस तेजी से हैरान होने वालों में आरकॉम के कर्मचारी भी थे. इसकी वजह यह थी कि कंपनी का सकल राजस्व यानी नेट रेवेन्यू नहीं बढ रहा था. सब्सक्राइबर बेस अन्य कंपनियों के मुक़ाबले गिर रहा था. मार्केट शेयर घटकर महज़ पांच फीसदी रह गया था.

इस सबके बावजूद शेयर उड़ान भर रहे थे. नौ जनवरी 2008 को आरकॉम का पूंजीकरण बढ़कर 1.69 लाख करोड़ रु हो गया. टेलीकॉम एक्सपर्ट उसके लिए एक से एक गीत गा रहे थे? असल में इसके पीछे कई कारण थे. मसलन नया-नया हासिल हुआ 2जी लाइसेंस, सीडीएमए टेक्नॉलॉजी और टेलीकॉम का बढ़ता हुआ बाज़ार.

फिर अचानक ताश के पत्तों का महल गिरने लगा. ख़बरें आने लगीं कि आरकॉम पर 40 हज़ार करोड़ रु का क़र्ज़ है, कंपनी ने कर्ज़ को एक बैंक से दूसरे बैंक में ट्रांसफर किया है, कंपनी अपना टॉवर बिज़नेस बेचना चाहती है, लेकिन ग्राहक नहीं मिल रहे हैं, कर्मचारियों की तनख्वाह पर संकट है, डीलर्स का भुगतान रीचार्ज के ज़रिये हो रहा है वगैरह-वगैरह.

धीरे-धीरे मर्ज बढ़ता गया. इतना कि कमाई गिरने की वजह से ब्याज की रकम देने देने तक में डिफ़ॉल्ट होने लगा. वेंडर कंपनियों को पैसा मिलने में देरी होने लगी तो उन्होंने तलवारें निकाल लीं. फिर, नवंबर 2017 में ऐलान हुआ कि आरकॉम बंद होने जा रही है. कभी भारतीय कॉरपोरेट जगत के नायकों में रहे अनिल अंबानी का हाल उलट हो गया. 2007 में उनकी निजी संपत्ति करीब 45 अरब डॉलर हुआ करती थी. आज यह आंकड़ा दो अरब तक आ चुका है. पिछले कई साल से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही आर कॉम ने अब आख़िरकार कर्ज की समस्या के समाधान के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में अर्जी लगाई है. उसने यह कदम सात अरब डॉलर के कर्ज के नवीनीकरण में नाकाम होने के बाद उठाया है. 13 महीने पहले क़र्ज़दाताओं ने इस पर सहमति जताई थी लेकिन बात नहीं बन पाई.

ऐसा नहीं था कि सिर्फ़ आरकॉम का ही बुरा हाल हुआ. उनकी तकरीबन हर कंपनी का वैल्यूएशन तेज़ी से टूटा है और यही उनकी सबसे बड़ी दिक्कत है. 2007 के ही आंकड़ों से ही समझें तो आरकॉम का वैल्यूएशन 1.69 लाख करोड़ रु से टूटकर आज 2000 करोड़ के आसपास है. रिलायंस पॉवर एक लाख करोड़ से गिरकर करीब 4800 करोड़ रु पर है. रिलायंस नेवल, आरइंफ़्रा और रिलायंस कैपिटल के भी बुरे हाल हैं.

कितना कर्ज?

अनिल अंबानी की लगभग हर बड़ी कंपनी कर्ज़ में है. यूं तो क़र्ज़ कोई बुरी बात नहीं है. हर व्यापार को पैसे ही ज़रूरत होती है. समस्या ये है कि अनिल अंबानी की कंपनियां रेवेन्यू यानी राजस्व पैदा नहीं कर पा रही हैं जिससे कर्ज चुकाने में मदद मिले. आइये देखें, कितना कर्ज़ है उनकी बड़ी कंपनियों पर.

ब्लूमबर्ग से जारी आंकड़ों के मुताबिक़ अनिल धीरुभाई अंबानी की कंपनियों पर कुल एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर का क़र्ज़ है. उन्हें सालाना 10,000 करोड़ रुपये का ब्याज़ देना पड़ता है. मोटे कर्ज़ में डूबी हुई कंपनियां हैं-आरकॉम (48000 करोड़), आरइंफ़्रा (22500 करोड़), रिलायंस नेवल (5300 करोड़.) वैसे, अनिल और उनके सलाहकारों ने आरकॉम और आरइंफ़्रा जैसी कंपनियों के एसेट यानी परिसंपत्तियां बेचकर कर्ज़ चुकाने का प्लान बनाया था. लेकिन कर्जदार कोर्ट में चले गए और मामला अटक गया.

क्यों सुप्रीम कोर्ट को उन्हें देश न छोड़ने का आदेश देना पड़ा

एक तो इसीलिए कि उन पर एक लाख करोड़ का कर्ज़ है, 10,000 करोड़ सालाना ब्याज़ है और अन्य कंपनियों को भुगतान बाकी हैं. दूसरी तरफ़, आरइंफ़्रा 133.8 करोड़ रुपये के डिबेंचर्स (ऋण पत्र) का भुगतान नहीं कर पायी थी. इसके अलावा एरिक्सन के 1100 करोड़ रुपये के कर्ज के मामले में आरकॉम को ‘आउट ऑफ़ दी कोर्ट सेटलमेंट’ में 550 करोड़ रूपये की रकम चुकानी थी. तय तारीख यानी 30 सितंबर तक जब अनिल तयशुदा रकम नहीं दे पाए तो एरिक्सन सुप्रीम कोर्ट चली गयी और यह दलील दी कि अनिल अंबानी की बकाया चुकाने की नीयत नहीं है. कोर्ट ने दोनों मामलों को देखकर उन्हें देश छोड़ने से मना कर दिया.

क्या अनिल पलायनवादी प्रवृति के हैं?

यह सवाल इसलिए कि अनिल अंबानी की ज़्यादातर कंपनियों का बुरा हाल हुआ है. मसलन, आरकॉम के अलावा बिग टीवी बेचनी पड़ी. रिलायंस एनर्जी का आईपीओ खुलते ही टूट गया. बिग एमफम पिछड़ गया. रिलायंस कैपिटल भी शुरूआती हलचल के बाद अब ख़ामोश है. कुछ कारणों के चलते, दिल्ली मेट्रो से भी उन्हें बाहर होना पड़ा था. ऐसे ही अनिल अंबानी को रिलायंस नेवल के डायरेक्टर पद से हटना पड़ा था और मुंबई मेट्रो भी मुश्किल हालात का सामना कर रही है.

इसी साल अगस्त में अनिल अंबानी ने आरइंफ़्रा की मुंबई वाली एनर्जी कंपनी लगभग 18,800 करोड़ में अडानी ट्रांसमिशन को बेच दी है. कयास लगाये जा रहे हैं कि राजधानी बीएसईएस, जो दिल्ली में बिजली वितरण करती है, को भी बेचने की तैयारी शुरू हो गयी है. क्यूंकि राजधानी बीएसईएस में दिल्ली सरकार की 49 फीसदी भागेदारी है, और रिलायंस चौतरफ़ा घिरी हुई है, तो ख़रीदार इसका फ़ायदा उठा सकते हैं.

अंबानी परिवार यकीनन सदमे में होगा. और क्यों न हो. देश के सबसे बड़े व्यापारिक घराने के राजकुमार पर इस बात की तोहमत लगाई जा रही है कि वह ख़ुद को दिवालिया घोषित करवाना चाहता है और लगभग हर कंपनी को बेच रहा है.

इसे किस्मत का कौन सा पहलू कहा जाएगा कि अनिल के हिस्से में वे व्यापार आये जो मुनाफ़े के लिहाज़ से उत्तरोतर थे, पर उन्होंने उन्हें दक्षिणोत्तर कर दिया. मसलन टेलीकॉम, एनर्जी, इश्योरेंस, कैपिटल, एंटरटेनमेंट और एसेट मैनेजमेंट. यह उनकी ग़लती थी या सीनियर मैनेजमेंट के ग़लत निर्णय, उनकी हर कंपनी सिलसिलेवार तरीके से गिरती चली गयी. इन कंपनियों के कुछ कर्मचारी नाम न लेने की शर्त पर बताते हैं कि पूरा शीर्ष नेतृत्व यानी टॉप लीडरशिप संकट से गुजर रही है और ऐसे में अकेले अनिल कुछ नहीं कर सकते.

ऐसे में कई सवाल उनकी काबिलियत पर भी खड़े हो जाते हैं. क्या अनिल पलायनवादी प्रवृति के इंसान हैं? या वे किसी रणनीति के तहत हर ‘एंड कंज्यूमर फेसिंग’ व्यापार से छुटकारा पाना चाहते हैं? क्या वे प्रतिस्पर्धा नहीं झेल पाते? क्या वे ऐसे व्यापार में उतरना चाहते हैं जहां सरकारी मशीनरी के सहारे काम चल जाए?

मुश्किलें और भी

कंपनियों के गिरते हुए वैल्यूएशन से समस्या यह भी है कि उन्हें बेचने पर सही दाम नहीं मिलेंगे और ऐसे में क़र्ज़ का संकट बरक़रार रहेगा. दूसरी तरफ़, जहां समूह की कंपनियों की अपनी दिक्कतें हैं, वहीं उनकी नयी कोशिश, यानी रिलायंस एरोस्पेस कंपनी पर अभी से संकट आ गया है. रफ़ाल सौदे को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं उनमें बार-बार उनका नाम भी आ रहा है.

कुल मिलाकर अनिल अंबानी हर तरफ़ से घिर गए हैं. जानकार उन्हें बेहद समझदार इंसान बताते हैं. उनके मुताबिक़ अनिल की वित्तीय समझ ज़बरदस्त है. पर इसके साथ-साथ वे बड़े प्रोजेक्ट्स को अंजाम देने की उनकी काबलियत पर सवाल खड़े करते हैं. जानकारों के मुताबिक अनिल अंबानी शुरुआत तो शानदार करते हैं, लेकिन बाद में सब कुछ उनके हाथ से फिसलने लग जाता है. शायद इसीलिए वे लगातार घिरते जा रहे हैं. हिंदुस्तान की कॉर्पोरेट दुनिया का पोस्टर बॉय आज मुश्किल में है और उसे रास्ता सुझाई नहीं दे रहा.