ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध चार नवंबर प्रभावी हो गए हैं. उससे तेल आयात करने वाले सभी देशों को अमेरिका ने सख़्त कार्रवाई की चेतावनी दी है. हालांकि भारत को इससे फौरी छूट दी गई है. इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि जो देश ईरान के साथ व्यापारिक संबंध कायम रखेगा, उस पर भी ये प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे.

भारत की कुल जरूरत का 27 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आता है. इसलिए अमेरिकी कार्रवाई से बचने के जतन निकाले जा रहे थे. यह स्वाभाविक ही है. आखिर दोनों मुल्कों रिश्ते सदियों से चले आ रहे हैं. रिश्तों का यह सिलसिला ईसा पूर्व तक जाता है. तब अमेरिका का वजूद भी नहीं था और दुनिया के निज़ाम में दोनों मुल्कों की (अगर मुल्क की अवधारणा रही होगी) अहमियत होती थी. यह समझने के लिए पहले दोनों की भौगौलिक स्थितियां देखने की ज़रूरत है.

तब सीमाएं मिलती थीं

जब पाकिस्तान का वूजूद नहीं था, दोनों देश सीमाओं पर हाथ मिलाते थे. ऐसे में सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते पनपने ही थे. जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में भारत और ईरान के रिश्तों पर विस्तार से लिखा है. वे लिखते हैं, ‘जितनी भी प्रजातियों या बाहर से आये लोगों ने भारतीयों के जीवन और संस्कृति पर प्रभाव डाला है, उनमें से ईरानियों का नाम सबसे ऊपर है.

धर्म और भाषा का मेल

यूं तो संस्कृत और फ़ारसी दो अलग-अलग भाषाएं हैं लेकिन, इन धाराओं के बीच कई पुल भी हैं. नेहरू लिखते हैं कि वैदिक संस्कृत और अवेस्ता (पारसी धर्म की पुस्तक) की भाषा में काफ़ी समानताएं हैं. वहीं वैदिक धर्म और ईरान के प्राचीन धर्म जरथुस्त्र में भी कुछ समानताएं हैं.

सिंधु घाटी और तत्कालीन ईरान और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं में भी यह मेल देखने को मिलता है. दोनों के काफ़ी डिज़ाइन और मोहरें समान हैं. नेहरू लिखते हैं, ‘ऋग्वेद में पर्शियन लोगों को पार्शव और कालांतर में परासिक कहकर संबोधित किया गया है. पर्शियन राजा सायरस और डोरियस कंधार और बलूचिस्तान तक अपने राज्य की सीमाएं ले आये थे’. ईरान में इस्लाम के आने के बाद पारसी धर्म हिंदुस्तान में ही शरण पा सका जो इस बात की पुष्टि करता है कि बहुधा संपर्क और व्यापारिक प्रजाति होने की वजह से पारसियों का भारत में आसानी से विलय हो गया.

मुग़लों के आने के बाद ईरान से कला और स्थापत्य यानी आर्किटेक्चर भी आया. नेहरू एक फ्रेंच विद्वान एम ग्रौस्से के हवाले से ताजमहल के बारे में लिखते हैं, ‘वह भारत के शरीर में ईरान की आत्मा है.’ लखनऊ के नवाबों का उद्गम भी ईरान के निशां प्रांत से है और लखनऊ शहर दक्षिण एशिया का अहम शिया सांस्कृतिक केंद्र है.

हैरत की बात है कि जब अंग्रेज़ भारत आये तो सबसे पहले उन्होंने भारत के पश्चिम एशिया से संपर्क खत्म किए. एकाधिकार की भावना के चलते. वे नहीं चाहते थे कि यहां का माल किसी और रास्ते यूरोप या दुनिया में जाए.

आज़ादी के बाद रिश्ते और गहरे हुए

ईरान के शाह के समय समाज में खुलापन था. तेहरान और उसके नज़दीक लेबनान भारतीयों के लिए बड़े पसंदीदा पर्यटन स्थल होते थे. भारतीय मूल के सतजीत सांगा दुबई की कंपनी में वरिष्ठ अधिकारी हैं. वे एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं. सांगा बताते हैं, ‘एक बार मैं कंपनी के काम से ईरान के ज़हेदान प्रांत में गया था. जब ईरानी बुजुर्ग महिलाओं को ख़बर हुई कि कोई ‘हिंदी’ आया है तो उन्होंने मुझ पर लाड़ बिखेर दिया. उन्होंने मेरे गालों को चूमा, मुझे दुआएं दीं और मेरी ज़बरदस्त आवभगत की.’

ईरान में भारतीयों में बहुत सम्मान मिलता रहा है. 2005 में बीबीसी के सर्वे में 71 फीसदी ईरानियों ने माना था कि भारत का उनके देश पर सकारात्मक प्रभाव रहा है. मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने लिखा था कि जब वे स्टेट्समैन अखबार में काम करते थे तो ईरान के शाह पर एक आलोचनात्मक लेख को न छपने देने के लिए जेआरडी टाटा ने उन्हें दो बार फ़ोन किया था.

भारत-चीन युद्ध में भारत की मदद के लिए पाकिस्तान को कहना

1962 में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान को पत्र लिखकर भारत की सहायता करने का आग्रह किया था. कुलदीप नैयर ने ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में इसका ज़िक्र किया है. वे लिखते हैं, ‘शाह ने नेहरू को उस ख़त की कॉपी भेजी जो उन्होंने अयूब खान को लिखा था’. कुलदीप नैयर ने उस ख़त की प्रतिलिपि देखने का दावा भी किया था.

कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान ने पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रस्तावों का समर्थन नहीं किया है. 1990 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में भारत और ईरान तालिबान सरकार के ख़िलाफ़ थे. हाल ही में भारत की मदद से ईरान में बनाया गया चाबहार बंदरगाह इस रिश्ते को और मज़बूत करता है.

जब एस्क्रो खाते से लेन-देन हुआ

जब दो पार्टियों को लेन-देन में विश्वास कम हो, तो बैंक में बतौर सुरक्षा धन जमा किया जाता है. जिस खाते में यह जमा होता है उसे एस्क्रो खाता कहते हैं. ईरान को भारत से चावल, दवाइयां आदि का निर्यात होता है और वहां से भारत तेल आयात करता है. कुछ साल पहले भारत ने यूको बैंक में एस्क्रो खाता खोलकर, ईरान से खरीदे गए तेल का भुगतान भारतीय रुपये में जमा किया था. ईरान की कंपनियों ने उसी जमा धन से भारत से आयातित वस्तुओं का भुगतान किया था. इसका फ़ायदा यह हुआ था कि दोनों देश डॉलर को बीच में लेने की अनिवार्यता से बच गए.

क्या होगा जब भारत ईरान से तेल नहीं आयात कर पायेगा?

सत्याग्रह के विदेश मामलों के जानकार अभय शर्मा बताते हैं कि भारत-अमेरिका का आपसी व्यापार लगभग 113 अरब डॉलर का है जबकि भारत-ईरान के मामले में यह आंकड़ा 13 अरब डॉलर है. इस आर्थिक समीकरण को भारत और ईरान दोनों ही समझते हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों को देखते हुए ईरान भारत को पहले ही कई तरह की सहूलियत देने की पेशकश कर चुका था. उसने भारत को तेल की लगभग मुफ्त ढ़ुलाई का ऑफर देने के साथ यह भी कहा था कि पैसा चुकाने के लिए भारत और ज्यादा समय ले सकता है. ईरान का यह भी कहना है कि वह अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत से अनाज, दवाओं और अन्य उत्पादों का आयात बढ़ाएगा और डॉलर से बचने के लिए दोनों देश आपसी मुद्रा में ही लेन-देन करेंगे.

प्रकृति और सभ्यताओं के विकास क्रम में एक अद्भुत बात है. भौगौलिक नज़दीकी और सांस्कृतिक समानता में समानुपाती संबंध होता है. जो इलाके जितने पास हैं, उनमें समानताएं ज़्यादा हैं. यही बात ‘नेचुरल अलाय’ यानी स्वाभाविक दोस्त की अवधारणा को परिभाषित करती है. धर्म के विकास ने इस परिभाषा को थोड़ा बहुत बदला है, फिर भी यह मोटे तौर पर कायम है. पश्चिम एशिया के मुल्क हमारे स्वाभाविक सहयोगी हैं. जब प्रकृति ने हमें साथ रखा है और संस्कृति हमें बांधती है, तो हम दूर कैसे हो सकते हैं.

जवाहर लाल नेहरू, डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में एक सांस्कृतिक प्रोग्राम का ज़िक्र करते हैं जो इलाहाबाद में हुआ था. वे लिखते हैं, ‘एक ईरानी सांस्कृतिक मिशन के लीडर ने कहा है कि ईरानी और भारतीय उन दो भाइयों की तरह हैं जो फारसी किवदंतियों के अनुसार बिछड़ गए थे. एक पश्चिम चला गया और दूसरा पूर्व. उनके (दोनों भाइयों) परिवार सब कुछ भूल चुके थे, पर दोनों परिवार बांसुरी पर एक जैसी धुनें बजाया करते. और इसी के ज़रिये कई सदियों बाद दोनों के परिवार फिर मिल गए. ठीक इसी तरह हम भारत आकर वही सदियों पुरानी धुनें बजा रहे हैं, जिसको सुनकर हमारे भारतीय भाई हमें पहचान लें और अपने ईरानी भाइयों से फिर मिल जाएं.’