पुराने जमाने में राजा शिकार करते थे तो जंगल की सीमाओं से सैनिक ढोल बजाते हुए जानवरों को एक घेरे में बांधते चले जाते थे. जब कई बदहवास जानवर फंस जाते तो राजा और उसके ख़ास बड़े आराम से उनका शिकार करते. यह भी कुछ ऐसी ही बात है.

15 फ़रवरी, 1983 को असम के नौगांव जिले में स्थित एक पुलिस स्टेशन के अफ़सर ने एक संदेश भेजा. इसमें लिखा था, ‘ख़बर है कि पिछली रात नेली गांव के इर्द-गिर्द बसे गांवों से तकरीबन 1000 असमिया लोग ढोल बजाते हुए नेली गांव के नजदीक इकट्ठा हो गए हैं. उनके पास धारदार हथियार हैं. नेली गांव के अल्पसंख्यक भयभीत हैं, किसी भी क्षण उन पर हमला हो सकता है. शांति स्थापित करने के लिए तुरंत कार्रवाई का निवेदन किया जाता है.’

लेकिन जब राजा शिकार करते थे तो जानवरों को बचाने की अपील कौन कर सकता था! और करता भी तो सुनता कौन! नेली गांव के लोगों को बचाने की उस अफ़सर की अपील भी नहीं सुनी गयी. तीन दिन बाद यानी 18 फ़रवरी की अलसुबह दंगाइयों का घेरा और तंग हो गया. अब जब नेली और आसपास के 11 गांवों में फंसे हुए लोगों के बच निकलने की जगह न बची, तो शिकारियों ने पहले आग लगाई और फिर बड़े इत्मीनान से तकरीबन 1800 लोग- बूढ़े, जवान, औरतें और बच्चे- क़त्ल कर डाले. ग़ैर सरकारी आंकड़ा क़रीब 3000 मौतों का है.

नेली के आसपास का भूगोल

नेली गांव गुवाहाटी से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर है. 1989 तक यह नौगांव जिले का हिस्सा था. ज़्यादातर आबादी किसानों की थी. स्थानीय तिवा और कोछ जनजाति व असमिया हिंदुओं के अलावा यहां पूर्वी बंगाल यानी बांग्लादेश के मुसलमान रहते थे. ऊंची जाति के हिंदू राष्टीय हाइवे के नजदीक बसे थे. जनजातीय लोग और मुस्लिम समुदाय के लोग कोपली नदी के किनारे रहते थे. दंगा इसके आसपास के 14 मुस्लिम बहुल गांवों में हुआ था. चूंकि राहत शिविर नेली गांव के स्कूलों में लगाये गए थे, इसलिए इसे नेली हत्याकांड कहा जाता है.

दंगों की नींव

देखा जाए तो नेली के दंगों की नींव 70 के दशक अंत में रख दी गयी थी जब इंदिरा गांधी सरकार ने बांग्लादेश से आये 40 लाख मुसलमान शरणार्थियों को वोटिंग का अधिकार दे दिया था. इससे असम में तनाव फैल गया. असम के मूल निवासियों को लग रहा था कि वे अपनी ही जमीन पर सिमटते जा रहे हैं. राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था. माहौल ठीक न होते हुए भी केंद्र सरकार ने 1983 में विधानसभा चुनाव कराने का निर्णय ले लिया.

क्या मुसलमान बांग्लादेश के बनने के बाद इधर आये थे?

जापानी शोधकर्ता मकिको किमुरा ने नेली हत्याकांड पर गहन शोध किया है. वे लिखती हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले, नेली के नज़दीक गोभा इलाके में तिवा राज्य था. यहां बहुसंख्यक तिवा और अन्य जनजातियों के अलावा हिंदू समाज में नीची मानी जाने वाली जातियों के लोग भी रहते थे.

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेजों ने अप्रवासी नीति के तहत पूर्वी बंगाल से मुसलमान लाकर इधर बसाये थे. चूंकि पूर्वी बंगाल में आबादी का घनत्व ज़्यादा था, लिहाज़ा उन्हें पश्चिम और मध्य बंगाल के इलाकों में बसाया गया. जब आबादी बढ़ी, तो ये लोग कोपली नदी के किनारे, यानी नेली गांव के इर्द-गिर्द आकर बस गए. 1940 के दौरान के नेली और आसपास के इलाके चरवाहों के मैदान होते थे. हिंदुस्तान की आजादी से कुछ साल पहले हुए चुनावों में तत्कालीन सरकार ने ‘ज़्यादा अन्न पैदा करो’ स्कीम के तहत असम के इन इलाकों में अप्रवासियों को बसने की इजाज़त दी. इस तथ्य से एक बात निकलकर आती है कि पूर्वी बंगाल से असम आये सारे मुसलमान अवैध नहीं हैं.

क्या निशाने पर सिर्फ मुसलमान ही थे?

असम आंदोलन का पूरा जोर असमिया पहचान पर था. यानी आंदोलनकारी हर बाहरी के खिलाफ थे चाहे वह बांग्लादेश से आया हो या कहीं और से. यह टकराव असमिया भाषी बनाम बांग्ला भाषी का था और बांग्लादेश से हिंदू भी ठीक-ठाक तादाद में आए थे. हां, यह जरूर है कि जो बाहरी भारतीय थे, उनके खिलाफ गुस्सा बनिस्बत कम था.

दंगे की असली वजह क्या थी?

असम में नदियां अक्सर जमीनों को लीले रहती हैं. अप्रवासियों के आने से उनकी और स्थानीय निवासियों की आबादी बढ़ने से ज़मीनी संसाधनों पर असर दवाब पड़ने लगा. ‘ये ज़मीन तो हमारी है’ इस ख़याल से स्थानीय लोगों में रोष बढ़ गया था और फिर कुछ राजनैतिक पार्टियों ने दोनों तरफ के लोगों को हवा दे दी थी.

स्थानीय निवासियों को अप्रवासी मुसलमान ज़मीन हड़पने वाले लगने लगे थे. लिहाज़ा, उन्हें बाहर निकालने की मुहिम शुरू हो गयी. 1983 में राज्य में विधानसभा चुनावों का ऐलान हुआ. आल इंडिया असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसु) ने इन चुनावों का बहिष्कार करने का फ़ैसला लिया. संगठन को डर था कि मुसलमान चुनावी नतीजे बदल देंगे. 1979 चुनावों से कुछ साल पहले ही आसू और आल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (आमसु) के बीच सड़कों पर खून-ख़राबा शुरू हो गया था.

आसू की मांग थी कि अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों को असम राज्य से बाहर निकाला जाए. उधर, आमसु चुनाव चाहता था. इंदिरा गांधी और गनी खान चौधरी जैसे कांग्रेस के दिग्गजों ने इन इलाकों के दौरे किये. अप्रवासी मुसलमान अपने आप को ‘बाहरी’ कहलाये जाने को लेकर परेशान थे. उन्हें उम्मीद थी कि कांग्रेस के जीतने के बाद उनके हालात में कुछ बदलाव आएगा.

दंगों का आंखों देखा हाल

नौगांव में मुस्लिम आबादी लगभग 40 फीसदी थी जिला प्रशासन को हिंसा की आशंका थी जिसके मद्देनज़र पुलिस बल की सहायता की मांग की गयी. 18 फ़रवरी को सबसे पहले नेली के उत्तर-पूर्व में बसे बोरबोरी में फ़साद शुरू हुआ. यहां मारकाट के बाद, दंगाइयों ने कपोली नदी के किनारे दक्षिण में मुस्लिम बहुल गांवों को तीन तरफ़ से घेर लिया. इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार हेमेन्द्र नारायण घटनास्थल पर मौजूद थे. अपनी एक रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है, ‘सुनियोजित तरीक़े से उन्होंने (दंगाइयों) ने डेमलगांव के मुसलमानों के घरों में आग लगाई...जल्द ही डेमलगांव का एक एक घर जलने लगा. पहले सफ़ेद धुआं, फिर काला गाढ़ा धुआं और फिर घरों से लाल लपटें निकलने लगीं. कुछ ही मिनटों में घरों के ढांचे रह गए.’

जब छुपने की जगह नहीं रही, तो हमलावरों ने कत्लेआम शुरू कर दिया. पीड़ित उत्तर की ओर भागे जहां सीआरपीएफ़ मौजूद थी. अन्य गांवों जैसे अलिसिंघा, सिल्चेरी और बाहेती से अप्रवासी लोग इकट्ठा होकर तीरों और पत्थरों के सहारे दंगाइयों से लड़ने लगे. धीरे-धीरे उनकी संख्या कम पड़ने लगी तो वे भागे. भगदड़ में औरतें, बच्चे और बूढ़े पीछे छूटते गए और फ़सादियों के हाथों कटते गए. जो सीआरपीएफ़ कैंप तक पंहुच पाए वही बच गए. मरने वालों में 70 फीसदी महिलाएं और 20 फीसदी बूढ़े थे.

जांच आयोग ने क्या पाया?

जैसा कि ऐसी घटनाओं के बाद होता है, जांच आयोग बिठा दिया गया. आईएएस केपी तिवारी इसकी अध्यक्षता कर रहे थे. उन्होंने पाया कि हमले की सूचना नज़दीक के जागीरोड पुलिस स्टेशन पर पंहुच चुकी थी पर कार्रवाई में देर हुई. अगर पुलिस मुस्तैदी से काम करती तो शायद यह नरसंहार टाला जा सकता था. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि इन दंगों को कौमी कहना ग़लत होगा. उसके मुताबिक इसका लेना-देना ज़मीन, भाषा और जनजातीय दरारों से था जिसका मुख्य उद्देश्य था अप्रवासियों को बाहर निकलकर होमलैंड की स्थापना करना.

बाद में क्या हुआ?

इस घटना के तुरंत बाद इंदिरा गांधी ने इन इलाकों का दौरा किया था. जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत सरकार इन दंगों के लिए ज़िम्मेदार है तो उन्होंने साफ़ कहा, ‘नहीं, बिलकुल नहीं. छात्र संगठन और आंदोलनकर्ता इस घटना के लिए ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने केंद्र के साथ चल रही बातचीत को बंद कर दिया.’ जब 1983 के विधानसभा चुनावों की ज़रूरत पर प्रश्न खड़े किये गए तो वे बोलीं, ‘आर्टिकल 356 के तहत एक समय तक ही राष्ट्रपति शासन लागू रह पाता, चुनाव कराना जरूरी था.’

हालांकि, राजनीत के जानकार कुछ और ही कहते हैं. चर्चित राजनीति विज्ञानी आशुतोष वार्ष्णेय के मुताबिक़ इंदिरा गांधी ने सेकुलरवाद की अवधारणा को बदलकर सेकुलर अहंकार में तब्दील कर दिया था. अपनी किताब ‘अधूरी जीत’ में वे लिखते हैं, ‘सेकुलर अहंकार मानता है कि राजनैतिक सत्ता का इस्तेमाल आस्थावान को अपने पाले में करने या उसे ठिकाने लगाने के लिए किया जा सकता है.’

नेली नरसंहार को लेकर बाद के सालों में 588 एफ़आईआर दर्ज़ हुई, 299 चार्ज शटें पेश की गईं. पर नतीजा वही रहा जो अक्सर होता है. कोई कार्रवाई नहीं हुई.

चक्का फिर वहीं

नेली नरसंहार को आज 35 साल से ऊपर हो गए हैं. मारने वाले और मरने वाले फिर साथ-साथ रहने लगे हैं. केंद्र की सरकार बदल गयी है, पर राजनीति वहीं है. पहले अप्रवासियों को आश्रय देकर स्थानीय लोगों के खिलाफ खड़ा किया गया था. अब, अप्रवासियों को दीमक की संज्ञा देकर एक बार और ध्रुवीकरण किया जा रहा है. माहौल गरमाने लगा है. अप्रवासियों ने अपने भारतीय होने के सुबूत देते कागज़ों को हवाओं में लहराना शुरू कर दिया है. यही उन्होंने 1983 में भी किया था. क्या उससे बच जाएंगे? और जाएंगे भी तो कहां? जावेद अख्तर की पंक्तियां याद आती हैं,

‘दुःख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे-मारे लोग,

जो होता है सह लेते हैं, कैसे हैं बेचारे लोग.’