निर्देशक : प्रदीप सरकार

लेखक : आनंद गांधी

कलाकार : काजोल, ऋद्धि सेन, तोता रॉय चौधरी, नेहा धूपिया, ज़ाकिर हुसैन

रेटिंग : 2/5

एक डकैत अपने ही गांव की लड़की को जबरन उठा ले जाने की कोशिश करता है. किसी की हिम्मत नहीं होती जो उसे रोक पाए. तब उसकी मां सामने आती है और गांव की इज्जत बचाने के लिए अपने लाड़ले बिरजू को गोली मार देती है, फिल्म - मदर इंडिया (1957). एक दूसरी फिल्म में गांव का ठाकुर अपने रिश्तेदारों के साथ मिलकर विधवा मां के दोनों बेटों को मौत के घाट उतार देता है. लेकिन मां इस बात पर यकीन नहीं कर पाती और दिन-रात उनकी वापसी की बाट जोहती है. एक दिन चमत्कार होता है और दोनों बेटे निर्दयी ठाकुर से बदला लेने के लिए लौट आते हैं, करण अर्जुन (1995). एक अन्य कहानी में एक मां गैरमजहब पति से पैदा हुए अपने कथित नाजायज बेटे को वर्षों तक अपनी हक़ीकत से दूर रख एक दर्द को छिपाने की कोशिश में मर्म को छू जाती है, फिल्म - जख़्म (1998).

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्मों की लंबी फेहरिस्त मौजूद है जिनमें ‘मां’ के अलग-अलग रूपों को बेहिसाब खूबसूरती के साथ उकेरा गया है. संजोग, ममता, दीवार, भावना, पा, जाने तू या जाने ना और निल बटे सन्नाटा जैसी फिल्में इस सूची में सुनहरे अक्षरों में दर्ज़ हैं. मगर अफसोस कि तमाम संभावनाओं के बावजूद ‘हेलीकॉप्टर ईला’ यहां अपनी जगह बनाने में पूरी तरह असफल रही है. इसे फिल्म की घोर नाकामी ही कही जानी चाहिए कि अपने बेटे के लिए एक मां की बेइंतहा प्रीत और फ़िक्र कई बार बेतुकी और बोझिल नज़र आने लगती है.

प्रदीप सरकार के पास मौका था कि वे अपने दौर की मशहूर गायिका बनते-बनते रह गई एक विशुद्ध भारतीय मां और उसके मॉडर्न बेटे के बीच की कैमिस्ट्री को एक मजेदार सुरीली सरगम बनाकर दर्शकों के सामने पेश कर सकते थे. लेकिन उन्होंने इसे एक झिलाऊ, बेसुरी धुन बनाकर छोड़ दिया. हालांकि शुरुआत के अलावा ‘हेलीकॉप्टर ईला’ बीच-बीच में अपने मधुर तान होने की उम्मीद जगाती है. मगर अगले ही पल मानो कोई उस साज़ के तार ही तोड़ देता है जिस पर इसे छेड़ा जाना था.

फिल्म की शुरुआत ईला रायतुरकर बनी काजोल के कॉलेज जाने की तैयारियों से होती है. और जैसा कि ट्रेलर से ही साफ हो चुका था कि वह अपने बेटे विवान यानी ऋद्धि सेन की ही क्लास में एडमशिन लेती हैं. चली बात पर बता दें कि इस फिल्म में तकरीबन वे ही दृश्य बेहतरीन कहे जा सकते हैं जो कुछ मिनट के इस ट्रेलर में दिखाए गए थे.

इसके बाद कहानी फ्लैशबैक में चलती है जहां मॉडल से सिंगर बनी ईला कामयाबी की दहलीज छूने से ठीक पहले घर बसाने का फैसला लेती है. किंतु बाद में अपने पति की सनक की वजह से न सिर्फ सिंगल मदर बल्कि अपने सपनों को भूलकर एक घरेलू महिला बनने के लिए भी मजबूर हो जाती है. इस तरह कहानी के पहले हाफ का दम काजोल के किरदार को जस्टिफाई करने के बोझ तले बुरी तरह घुटता नज़र आता है. और इसका दूसरा हिस्सा अपने बेटे के इर्द-गिर्द किसी हेलीकॉप्टर की तरह मंडराती ईला की खोई पहचान को फिर से हासिल कराने की जद्दोजहद के. साथ ही इस फिल्म के ज़रिए नई पीढ़ी के दर्शकों के जेहन में यह भी स्थापित करने की कोशिश की गई है कि भारत में रैप और रिमिक्स हनी सिंह के बाद नहीं आया है. बल्कि बाबा सहगल जैसे नब्बे के दशक के गायक भी इस विधा में जबर माहिर थे.

‘परिणीता’ जैसा आलास्तरीय सिनेमा गढ़ने वाले निर्देशक प्रदीप सरकार की यह फिल्म मशहूर लेखक आनंद गांधी के गुजराती नाटक ‘बेटा कागड़ो’ से प्रेरित होने के बजाय दूसरी हिंदी फिल्मों की कोरी नकल ज्यादा लगती है. जिन लोगों ने ‘निल बटे सन्नाटा’ में अपनी बेटी के साथ स्कूल जाती मां और ‘इंग्लिश-विंग्लिश’ में अपने सम्मान को हासिल करने की कवायद में जुटी गृहणी को देखा है, वे कह सकते हैं कि किसी कहानी से ‘सत’ के रुप में इन दोनों फिल्मों के निकलने के बाद जो ‘छूछ’ बचता है उसे ही नए अंदाज में परोसने की कवायद भर लगती है, हेलिकॉप्टर ईला. इसके अलावा ‘कभी खुशी कभी गम (के3जी)’ की जया बच्चन की तरह काजोल को अपने बेटे के आने का पहले ही अहसास हो जाना, ‘कुछ-कुछ होता है’ की रानी मुखर्जी की तरह कॉलेज फंक्शन में काजोल के किसी रॉकस्टार की तरह प्रकट होने जैसे दृश्य भी फिल्म को बासी मेलोड्रामा का हैवी डोज़ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

यदि किरदारों की बात करें तो फिल्म में काजोल ने मौका मिलने पर प्रभावित करने की हरसंभव कोशिश की है. लेकिन उनसे यह शिकायत करना भी ज़रूरी है कि वे के3जी की नवेली मां ‘अंजलि’ के किरदार से बाहर निकलने के लिए आज भी जूझती दिखती हैं. जबकि उन्हीं की हमउम्र तब्बू ‘हैदर’ में मां बनकर ऐसा अभिनय रच चुकी हैं जिसे कई लोग इतिहास करार देते हैं. साथ ही काजोल के संवादों में डीडीएलजे की सिमरन की तरह ‘मैंने कहा था न, मैंने कहा था न राज…’ वाली जल्दबाजी भी कई बार अखरती है.

ऋद्धि सेन के अभिनय के बारे में बताने के लिए यह विशेषण ही काफी है कि इस साल उन्हें बंगाली फिल्म ‘नगर कीर्तन’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है. कुछ सिने विशेषज्ञों का दावा है कि उन्नीस वर्ष की आयु में यह सम्मान हासिल करने वाले सेन देश के पहले अभिनेता हैं. इनके अलावा हर गलती पर चप्पल फेंककर मारने वाली म्यूज़िक टीचर ‘लिसा’ बनी नेहा धूपिया यहां एक पीटीआई ज्यादा लगती हैं, ईला के पति ‘अरुण’ बने तोता रॉय चौधरी, प्रिंसिपल बने ज़ाकिर हुसैन और देसी घरेलू पंच-लाइन्स वाली पंजाबी दादी अपने-अपने स्तर पर बढ़िया अदाकारी करने की कोशिश में तकरीबन सफल रहे हैं.

उन लोगों को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए जो सांवली-सलोनी और मासूम, लेकिन उतनी ही चुलबुली काजोल को बार-बार बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं. लेकिन बाकियों के लिए हमारी तरफ से कोई विशेष सलाह नहीं है. और काजोल आपसे यह गुज़ारिश कि कृपया ऐसी फिल्मों को चुनने से बचें जो ‘सिमरन’ और ‘अंजलि’ की हसीन यादों में खोए आपके प्रशंसकों को झकझोर कर होश में लाने का काम करती हैं. वैसे भी आपके कई चाहने वाले रोहित शेट्टी की ‘दिलवाले’ के सदमे से अभी तक नहीं उबर पाए होंगे.