निर्देशक : राही अनिल बर्वे

लेखक : आनंद गांधी, राही अनिल बर्वे,मितेश शाह, अादेश प्रसाद

कलाकार : सोहम शाह, मोहम्मद समद

रेटिंग : 3.5/5

लोककथाओं के पास एक वरदान होता है - समय के अनंत चक्र में सैकड़ोंं साल घूमते रहने के बावजूद उनमें किस्सा अपने पूरे आदिम स्वरूप में जिंदा रहता है. न जाने इन लोकगाथाओं का कथा-शिल्प किसने रचा है कि इन्हें घर की दादी-अम्मा भी सुना सकती हैं, रास्ते में घूमता फकीर भी आधुनिक दुनिया के बड़े-बड़े तजुर्बेकार भी और अलग-अलग माध्यमों का सहारा लेकर कहानी कहने वाले भी. बस होता यह है कि हर सुनाने वाला कहानी को अपने तरीके से ग्रहण करता है और सुनने वाला अपने तरीके से. लोक में प्रचलित कहानी जितने लोगों को छूकर गुजरती है, उसके उतने पाठ होते हैं. अनिल बर्वे की फिल्म तुम्बाड भी एक लोककथा का सहारा लेती है और उसमें थोड़ी सी कल्पना, हॉरर और दर्शन मिलाकर जीवन के रूपकों को पर्दे पर उतारती है.

मानव मन में छुपे दैवीय डर और लालच जैसे भाव. कभी सोचा है कि मानव मन के अंधेरे कोने में जब-तब चमक उठने वाले इन भावों का रंग क्या होता है? कहानी और किरदार की व्याख्या करने वाले परंपरागत तरीकों में हम इन्हें ग्रे (धूसर) कह देते हैं. तुम्बाड में लगातार होती बारिश के बीच जब वह अभिशप्त घर - जिसमें खजाना छुपा होने की बात कही जाती है - का दृश्य पर्दे पर उतरता है तो दर्शक को भय, लालच का कोई रंग नहीं दिखता. उसे एक अनुभूति होती है. डर का रंग यही है और लालच का भी. और इस रंग को महसूस कराने के लिेए फिल्म संवादों या तमाम दूसरी चीजों से ज्यादा विजुअल्स का सहारा लेती है, स्तब्ध कर देनेे की हद तक. सिनेमा विजुअल्स के सहारे अपनी बात कहने वाला माध्यम है. तुम्बाड के निर्देशक इस बात में पुख्ता यकीन करते हैं ऐसा यकीन के साथ कहा जा सकता है.

अगर मोटे तौर पर कहानी की बात करें तो फिल्म महाराष्ट्र के तुम्बाड गांव से शुरु होती है. अंग्रेजों का शासन है. लोगों के बीच एक दंतकथा प्रचलित है कि सभी देवी-देवताओं का जन्म एक प्राचीन देवी की कोख से हुआ है. देवी को अपना बड़ा बेटा हस्तर सबसे प्रिय होता है. लेकिन हस्तर लालची है और वह अपनी मां की सारी संपत्ति पाना चाहता है. हस्तर सोना तो चुरा लेता है, लेकिन जब वह अनाज पर कब्जा करना चाहता है तो बाकी देवता उसे श्राप दे देते हैं. हस्तर को देवताओं का श्राप है कि उसकी कभी पूजा नहीं होगी.

लेकिन तुम्बाड गांव का एक परिवार हस्तर का मंदिर बनवाता है और लगातार उसकी कई पीढि़यां उस सोने की खोज में लगी रहती हैं, जिसे हस्तर ने चुराया था. यह लोककथा है, जिसका मजमून फिल्म में एक नरेशन के जरिये ही आपको पता चल जाता है. लेकिन असल कहानी शुरु होती है, जब इस दंतकथा से एक गरीब विधवा ब्राह्मणी और उसके दो छोटे बच्चों जुड़ते हैं.

विधवा मां उस परिवार के एक वृद्ध शख्स की देखभाल करती है, जिसकी कई पीढ़ियां हस्तर का खजाना ढूंढने की कोशिश कर रही हैं. उसका अपना लालच है, लेकिन बहुत छोटा सा. वह सिर्फ एक स्वर्ण मुद्रा चाहती है. लेकिन उसका बड़ा बेटा हस्तर की कहानी जानकर पूरा खजाना पाना चाहता है. हालात कुछ एेसे बनते हैं कि विनायक और उसकी मां को तुम्बाड गांव छोड़ना पड़ता है. दोनों पुणे शहर अा जाते हैं और उसकी मां उससे कभी भी तुम्बाड न जाने का वचन लेती है.

विनायक की मां का एक स्वर्ण मुद्रा का लालच उसकी जिंदगी के संघर्षों से जुड़ा था, लेकिन विनायक का लालच बड़ा था. मां की मौत के बाद वह फिर तुम्बाड आता है और खजानेे की खोज में लग जाता है. विनायक के लालच की भूख लगातार बढ़ती जाती है. और फिर विनायक को पता चलता है कि उसका किशोर बेटा ( मोहम्मद समद) इस मामले में उससे भी आगे है. और अंत में यह लालच सब कुछ खत्म कर देता है.

इसके अागे की कहानी स्पॉइलर तो होगी ही उसे विजुअली देखने का मजा भी अलग है. खजाना खोज रहे विनायक का डर धीरे-धीरे उसके बढ़ते लालच के साथ इतनी जुनूनी क्रूरता में ढल जाता है कि वह हस्तर से भी आगे निकल जाता है. लेकिन शब्दों में लिखी इस बात को ठीक-ठीक तभी समझा जा सकता है जब विनायक के किरदार में सोहम शाह का अभिनय और कैमरे की जुगलबंदी देखेंगे. बीच-ंबीच में फिल्म अंग्रेजी शासन काल और तत्कालीन ब्राह्मण समाज के सामंती रवैये और महिलाओं की खराब स्थिति के बारे में भी बात करती है, लेकिन तभी जब कहानी को कहीं थोड़ा सा धक्का देने की जरुरत होती है.

सिमरन, तलवार जैसी फिल्मों में दिख चुके सोहम शाह को यहां अभिनय के लिए सलाम कहना चााहिए. डर और लालच को दर्शाने में उन्होंने अपनी आंखों का जो इस्तेमाल किया है, वह लाजवाब है. बाकी अन्य कलाकारों के लिए करने के लिए बहुत कुछ नहीं था. लेकिन विनायक के बेटे के किरदार में मोहम्मद समद (हरामखोर में भी नजर अाए थे) अलग नजर आते हैं और क्लाइमेक्स में तो यह नन्हा कलाकार सोहम शाह को टक्कर देता नजर अाता है.

लेकिन तुम्बाड की सबसे ज्यादा तारीफ जिस बात के लिए बनती है, वह है इसकी प्रोडक्शन क्वालिटी. तुम्बाड से अानंद एल राय जैसे नाम के साथ शिप आफ थीसियस की टीम के बहुत सारे सदस्य जुड़े हुए हैं. शिप आफ थीसियस के निर्देशक अानंद गांधी इस फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर हैं. फिल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी के साथ संपूर्णता में उसके प्रभाव के लिए निर्देशक अनिल बर्वे और अानंद गांधी को सौ में से नब्बे तो मिलने ही चाहिए.

फिल्म में प्रकाश कुमार का कैमरा वर्क इतना शानदार है कि बिना किसी शक-सुुुुबहे के अाप इसे विश्व सिनेमा की टक्कर का कह सकते हैं. फिल्म में कैमरा और लाइटिंग मिलकर एेसा माहौल पैदा करते हैं जो थोड़ी देर तक निहारने के बाद अाप में वैसी ही सिहरन पैदा करता है जो शाम के धुंधलके में किसी जंगल में खामोशी की सांय-सांय पैदा करती है.

तुम्बाड में हॉरर उस तरह नहीं अाता है कि अाप किसी साउंड इफेक्ट और कैमरे के मूवमेंट से एकाएक चौंक जाएं और फिर अगले ही पल आपकी हंसी निकल जाए. तुम्बाड में किसी लंबे लॉंग शॉट को निहारते हुए अाप कुछ महसूस कर रहे होते हैं, तभी डर अाता है. लेकिन अगले पल कुछ ऐसा होता है कि आप कहानी में उलझ जाते हैं. कहानी में क्या होने वाला है इस बात का अंदाजा बिल्कुल नहीं लगता सिवा फिल्म की शुरुआत में लिखेे गांधी जी के उस कथन के जिसमें उन्होंने कहा था कि यह धरती मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम है, उसके लालच की पूर्ति में नहीं. इन लाइनों से अाप यह अंदाजा तो लगा ही लेते हैं कि फिल्म एक लोककथा के सोना चुरा लेने वाले देवता के लालच से लेकर मनुष्य के लालच तक के बारे में है.

समीक्षा-अालोचना की दुनिया में एक मुहावरेनुमा कथन का इस्तेमाल किया जाता है कि जिस लेखक का कथ्य कमजोर होता है,वह शिल्प का सहारा लेता है. लेकिन तुम्बाड देखिये तो लगता है कि शिल्प का बेहतर इस्तेमाल कैसे कथ्य को और मजबूत बना देता है.