महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा से जुड़े राजनीतिक मामलों में महाराष्ट्र सरकार की कथनी और करनी में फर्क़ नज़र आता है. इन मामलों पर उसके अब तक रुख़ से ऐसा अनुमान हो रहा है. सूत्रों के हवाले से द इंडियन एक्सप्रेस ने इससे जुड़ी ख़बर प्रकाशित की है.

अख़बार के मुताबिक भीमा-कोरेगांव में इसी साल जनवरी में हुई हिंसा के माामले में महाराष्ट्र पुलिस ने 642 मामले दर्ज़ किए थे. इनमें से अधिकांश राजनीतिक थे. इसे लेकर जब विपक्ष और अन्य संगठनों का राज्य सरकार पर दबाव पड़ा तो राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में आश्वासन दिया कि सभी राजनीतिक मामले वापस ले लिए जाएंगे. यह मार्च के महीने की बात है. लेकिन अब तब फडणवीस की सरकार इस आश्वासन को पूरा नहीं कर पाई है.

बताया जाता है कि जून के महीने में एक अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक की अगुवाई में एक समिति बनाई गई थी. इसने अपनी रिपोर्ट राज्य के पुलिस महानिदेशक को सौंप दी है. इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि 642 में से सिर्फ 54 मामले ही ऐसे हैं जाे गंभीर प्रकृति के हैं. इसके बाद भी अब जैसा कि सूत्र बताते हैं- प्रदेश के गृह मंत्रालय ने फिर पुलिस को एक और समिति बनाने निर्देश दिया है. इस समिति काे यह पता लगाना है कि कितने मामले वापस लिए जा सकते हैं.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘हमने सरकार से कहा है कि राजनीतिक मामलों की वापसी सामान्य संकल्प (जनरल रिज़ॉल्यूशन- जीआर) के जरिए हो सकती है. लेकिन अब तक भीमा-कोरेगांव या उसके बाद दर्ज़ हुए मामलों को लेकर कोई जीआर जारी नहीं हुआ है. पिछली जीआर सरकार ने जनवरी-2015 में जारी किया था. उसके ज़रिए एक नवंबर- 2014 तक के राजनीतिक मामलों को वापस लेने का बंदोबस्त किया गया था.’