बीते गुरुवार को बिहार के एक नामचीन कारोबारी गुंजन खेमका की पटना में दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह वारदात तब हुई जब वे अपनी फैक्ट्री पहुंचे ही थे. मोटरसाइकिल पर सवार हमलवार ने उनकी कार पर गोलियों की बौछार कर दी. अस्पताल पहुंचाए जाने से पहले खेमका की मौत हो गई. इस घटना के बाद हड़कंप मच गया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शीर्ष पुलिस अधिकारियों को जल्द से जल्द इस हत्या में शामिल अपराधियों को पकड़ने के निर्देश दिए हैं.

जब इस सदी के शुरुआती सालों में जब नीतीश कुमार बिहार में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे तो उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा बना था कानून-व्यवस्था. बतौर मुख्यमंत्री पहले लालू प्रसाद यादव और बाद में उनकी पत्नी राबड़ी देवी के कार्यकाल में बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद लचर थी. अपहरण और फिरौती एक उद्योग का शक्ल लेता जा रहे थे. कई जिले नक्सल समस्या से बुरी तरह प्रभावित थे.

नीतीश कुमार ने बेहद चतुराई से लालू यादव की जात और जमात की राजनीति की काट के तौर पर कानून-व्यवस्था के मसले को चुनावी मुद्दा बना दिया. 2005 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार, उनके जनता दल यूनाइटेड और सहयोगी भारतीय जनता पार्टी ने कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर लड़ा. लेकिन उन्हें बहुमत नहीं मिला. बाद में जब 2005 में अक्टूबर में दोबारा चुनाव हुआ तो उसमें नीतीश कुमार और भाजपा को मिलकर बहुमत मिला. उन नतीजों का जो विश्लेषण हुआ, उसमें यह बात सामने आई कि कानून-व्यवस्था एक चुनावी मुद्दा रहा और बहुत सारे लोगों ने इस आधार पर लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से दूरी बनाई.

लेकिन पिछले कुछ समय से बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार खराब हुई है. आम लोग तो अब यह बात भी करने लगे हैं कि नीतीश कुमार की पूरी राजनीति जिस मुद्दे पर खड़ी हुई और खराब कानून-व्यवस्था की स्थिति के मुकाबले जिस तरह से उन्होंने सुशासन के साथ अपनी छवि गढ़ने की कोशिश की, आज वही खतरे में है.

मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब के बीच में तकरीबन दो साल का समय रहा है जब नीतीश कुमार ने लालू के जंगलराज का भय नहीं दिखाया है. यह वही दौर है जब भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश कुमार राजद के साथ रहे और मिलकर सरकार भी चलाई. तकरीबन दो साल के इस दौर को छोड़ दें तो नीतीश कुमार ने बिहार के लोगों को हमेशा लालू के जंगलराज की वापसी का भय दिखाकर अपने प्रति लोगों को समर्थन बनाए रखने की कोशिश की है.

लेकिन अब एक वर्ग को को लगता है कि बिहार में कानून-व्यवस्था की जो स्थिति बन गई है, उसमें ऐसा लगने लगा है कि लालू यादव के जंगलराज का भय दिखाना अब राजनीति तौर पर अप्रासंगिक होता जा रहा है. क्योंकि तथाकथित जंगलराज में जिस तरह की घटनाएं हो रही थीं, उसी तरह की घटनाएं नीतीश कुमार के सुशासन में भी हो रही हैं.

अपने खिलाफ होने वाले आपराधिक व्यवहार की शिकायत करने पर छात्रावास में रह रही महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर हमला हो रहा है. राजधानी पटना से बलात्कार की घटनाएं आ रही हैं. मुजफ्फरपुर आश्रय गृह की शर्मनाक घटना और इससे संबंधित लोगों के तार सत्ता में बैठे लोगों से जुड़ना भी नीतीश के सुशासन को लालू यादव के जंगलराज के करीब ही लाने का काम कर रहा है. अभी बीते 30 नवंबर को ही मुजफ्फरपुर से ही एक महिला कैदी के साथ सामूहिक बलात्कार की खबर आई है. अब गुंजन खेमका की हत्या ने फिर से प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल उठा दिया है.

नीतीश कुमार के पहले दो कार्यकाल में अपेक्षाकृत सुरक्षा भाव के मुकाबले पिछले कुछ महीनों में बिहार में ऐसा देखा जा रहा है कि आम लोगों में कानून-व्यवस्था को लेकर असुरक्षा का माहौल बना है. खास तौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या बढ़ी है. बिहार में अपराधियों का हौसला कितना बढ़ा हुआ है और सरकार कितनी रक्षात्मक मुद्रा में है, इसका अंदाजा कुछ समय पहले आए उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के एक बयान से लगाया जा सकता है. इसमें उन्होंने अपराधियों से हाथ जोड़कर कम से कम पितृपक्ष के दौरान अपराध नहीं करने की अपील की थी.

बिहार में गांव-गांव में अब लोग यह बात भी कर रहे हैं कि राजद के साथ सरकार चला रहे नीतीश कुमार के पास कानून-व्यवस्था को लेकर यह बचाव था कि पुराने जंगलराज वाले कुछ लोग सरकार में शामिल हैं और गठबंधन में होने की वजह से वे उनके खिलाफ बहुत कुछ नहीं कर सकते. लेकिन अब तो राजद सरकार में भी नहीं है और वे भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं. इसके बावजूद अपराधों में कमी आने के बजाए इनकी संख्या और बढ़ती ही जा रही है.

आम लोग इसे नीतीश कुमार की प्रशासनिक अक्षमता से जोड़कर देख रहे हैं. वे कह रहे हैं कि पहले जब अपराध बढ़े तो उस वक्त भी नीतीश कुमार और उनके सिपाहसलारों ने राजद का सिर्फ बहाना बनाया, लेकिन सच्चाई यही है कि नीतीश सरकार उस वक्त भी अपराध को काबू में रखने में नाकाम थी और अब भी लगातार नाकाम साबित हो रही है.

अब सवाल यह उठता है कि आखिर नीतीश कुमार कानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक क्यों नहीं कर पा रहे हैं? उनकी पार्टी और भाजपा के नेताओं से बातचीत करने पर यही बात सामने आती है कि उन्हें बिहार की कानून व्यवस्था के साथ कुछ भी गड़बड़ नजर ही नहीं आता. वे बढ़ती आपराधिक घटनाओं को सामान्य तौर पर होने वाली आपराधिक घटनाओं के तौर पर देख रहे हैं और विपक्ष पर इन घटनाओं को अनावश्यक तूल देने का आरोप मढ़ रहे हैं.

प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत करने के बाद खराब कानून-व्यवस्था को लेकर मोटे तौर पर दो वजहें समझ में आती हैं. पहली तो यह कि बिहार में पुलिस के जवानों और अधिकारों की संख्या जरूरत के हिसाब से काफी कम है. दूसरी वजह यह समझ में आती है कि नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने और अब भी भाजपा के साथ लोकसभा चुनावों में टिकटों के बंटवारे में स्पष्टता नहीं होने की वजह से अधिकारियों में लगातार भ्रम की स्थिति बनी हुई है. वे सोच रहे हैं कि पता नहीं कल नीतीश कुमार किसके साथ हों. ऐसे में किसी भी आपराधिक घटना से जुड़े वैसे लोगों के खिलाफ पुलिस रक्षात्मक होकर चल रही है जिसके थोड़े भी राजनीतिक संबंध हों.

इन सबके बीच जमीनी स्थिति यह है कि नीतीश कुमार के तथाकथित सुशासन में लोगों को कानून-व्यवस्था पर भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है. जिस राजद के खिलाफ नीतीश कुमार ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था, हो सकता है वही आने वाले दिनों में नीतीश के खिलाफ इसे चुनावी मुद्दा बना ले.