रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों द्वारा मिशन शक्ति को सफलतापूर्वक अंजाम दिए जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलग ही आत्मविश्वास में नज़र आ रहे हैं. वे अपने चुनावी भाषणों में इसे अपनी सरकार की सफलता बता रहे हैं. शुक्रवार को एक चुनावी रैली में उन्होंने मिशन शक्ति को चुनावी चौकीदारी से जोड़ते हुए कहा, ‘अब हम अंतरिक्ष में भी चौकीदारी करने में सक्षम हो गए हैं.’ इसके बाद प्रधानमंत्री ने कहा, ‘वे लोग (विपक्ष) जो हमारे वैज्ञानिकों पर सवाल उठा रहे हैं. वे जो हमारी सशस्त्र सेना पर सवाल उठाते हैं, अब उन्हें सबक़ सिखाने का समय आ गया है.’
बतौर सत्तारूढ़ दल के सबसे बड़े नेता के रूप में नरेंद्र मोदी का विपक्षी दलों को घेरना समझ में आता है. लेकिन उनका यह आरोप, कि कुछ लोग वैज्ञानिकों पर सवाल उठाते हैं, गले नहीं उतरता. देश के किसी भी विपक्षी नेता ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता पर सवाल नहीं उठाया है. उलटा देखा जाए तो मोदी सरकार के मंत्री और भाजपा नेता ही अपनी विचारधारा के आगे विज्ञान को धता बताते रहे हैं. बीते पांच सालों के दौरान कई मौक़े आए हैं, जो भविष्य में इस बात को साबित करने के लिए काफ़ी होंगे कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश में अवैज्ञानिकता को बढ़ावा दिया गया.
यह अच्छी बात है कि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विज्ञान को बढ़ावा देने की बात करते रहे हैं. लेकिन फिर यह क्यों न देखा जाए कि जिन संस्थानों की बदौलत भारत अंतरिक्ष विज्ञान में लगातार प्रगति करता चला जा रहा है, उनके पीछे असली ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति’ किन लोगों की रही है, वहीं मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में देश में वैज्ञानिक अनुसंधान या शोध का काम किस स्तर पर पहुंचा है.
दुनिया के सबसे क़ाबिल शोधकर्ताओं में भारत के केवल 10 वैज्ञानिक शामिल
इस साल के शुरुआत में 106वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आयोजन हुआ था. उसमें प्रधानमंत्री मोदी ने देश को एक नया नारा दिया. उन्होंने दो पूर्व प्रधानमंत्री, लालबहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी के (क्रमशः) ‘जय जवान जय किसान’ व ‘जय विज्ञान’ के नारों में ‘जय अनुसंधान’ जोड़ दिया.
इसके ठीक अगले दिन एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध संगठन (क्लेरिवेट एनालिटिक्स) के हवाले से ख़बर आई कि दुनिया के सबसे क़ाबिल 4,000 शोधकर्ताओं की सूची में भारत के दस वैज्ञानिक शामिल हैं. भारत के लिए यह ख़बर इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण थी कि पिछले साल इसी संगठन की सूची में भारत के केवल पांच वैज्ञानिक शामिल किए गए थे. इस साल यह संख्या दोगुनी हो गई.
लेकिन इसी सूची में चीन का भी नाम शामिल था जो 482 वैज्ञानिकों के साथ तीसरे नंबर था. उससे ऊपर केवल अमेरिका (2,639) और ब्रिटेन (546) थे और भारत से इस मामले में वह 48 गुना आगे कहा जा सकता है. लोगों ने सवाल किया कि एक ऐसे राजनीतिक दौर में जब भारत को हर क्षेत्र में चीन को टक्कर देने वाला देश बताया जा रहा है, देश के वैज्ञानिकों को किस चीज़ की कमी पड़ गई जो वे प्रतिद्वंदी पड़ोसी देश के वैज्ञानिकों से इतना पीछे रह गए!
सूची में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों ने क्या कहा था
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट इसका जवाब देती है. अख़बार ने सूची में शामिल वैज्ञानिकों के हवाले से बताया था कि आख़िर क्यों चीन के मुक़ाबले भारत के वैज्ञानिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रहे. रिपोर्ट के मुताबिक़ सूची में शामिल प्रसिद्ध वैज्ञानिक और भारत रत्न से सम्मानित सीएनआर राव ने कहा कि भारत को अपने शोध व अनुसंधान क्षेत्र के साथ वैज्ञानिक लेखन की गुणवत्ता पर काम करने की ज़रूरत है. यह बात कहते हुए सीएनराव कहते हैं, ‘क़रीब 15 साल पहले भारत और चीन एक बराबर थे. लेकिन आज विश्व विज्ञान के क्षेत्र में चीन का योगदान 15-16 प्रतिशत है और हमारा केवल तीन-चार प्रतिशत.’
इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए सीए की सूची में शामिल एक और भारतीय शोधकर्ता अशोक पांडेय ने कहा था, ‘यह चिंता का विषय है. सरकार समेत वैज्ञानिकों को भी इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है.’ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-कानपुर के अविनाश अग्रवाल भी सीए की सूची में शामिल थे. उन्होंने भारत में शोध व अनुसंधान की हालत पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘भारत जैसे देश में शोध को पर्याप्त सम्मान नहीं मिलता. हमें अपने रिसर्च ईकोसिस्टम में सुधार करने की ज़रूरत है. भारत के अकादमिक सिस्टम में गुणवत्तापूर्ण शोध के प्रति एकाग्रता की कमी है.’
शोध के लिए न पैसा, न शिक्षक
दुनिया के शीर्ष शोधकर्ताओं में शुमार इन वैज्ञानिकों के बयान विज्ञान क्षेत्र को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की बयानबाज़ी पर सवाल उठाते हैं. रिपोर्टें भी बताती हैं कि उनकी सरकार में न तो शिक्षा के लिए बजट में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और न ही शोध के लिए विज्ञान क्षेत्र को पर्याप्त धन दिया गया. इस संबंध में इंडियास्पेंड की पिछले साल की एक रिपोर्ट ग़ौर करने वाली है. इसके मुताबिक़ भारत (केंद्र और राज्य सरकारों दोनों) में जीडीपी का चार प्रतिशत हिस्सा ज़रूर शिक्षा पर ख़र्च किया जाता है लेकिन, शोध कार्यों के लिए यह आंकड़ा एक प्रतिशत से भी कम है.
पैसे के अलावा संस्थान शिक्षकों की कमी से भी जूझ रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 5,606 शिक्षकों की कमी है जो उनके कुल पदों की संख्या का 33 प्रतिशत है. केंद्र सरकार ने पिछले साल 23 जुलाई को ख़ुद लोकसभा को इसकी जानकारी दी थी. वहीं, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) की बात करें तो वहां यह आंकड़ा 34 प्रतिशत है.
कथनी और करनी में फ़र्क़
पिछले कुछ सालों से भारत अपनी जीडीपी का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा विज्ञान व तकनीक पर ख़र्च कर रहा है. उसमें से भी ज़्यादातर पैसा अंतरिक्ष विज्ञान पर ख़र्च किया जा रहा है, जिसका नतीजा एक के बाद एक सफल उपग्रह प्रक्षेपणों और अब मिशन शक्ति के रूप में सामने आया है.
लेकिन बाक़ी क्षेत्रों के लिए बहुत कम पैसा बचता है. प्रधानमंत्री कभी वैज्ञानिकों की जय-जयकार करते हैं, तो कभी संस्थानों को नई खोजें करने को कहते हैं, लेकिन जब पैसे ख़र्च करने की बात आती है तो उनकी सरकार मुंह फेर लेती है, जबकि 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी ने कहा था कि उसकी सरकार बनने पर भारत की जीडीपी का छह प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर लगाया जाएगा. द हिंदू की 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ उस समय मोदी सरकार ने कहा था कि वैज्ञानिक शोध में शामिल संस्थान अपनी आर्थिक मदद के लिए ‘स्व-वित्तीय परियोजनाओं’ की शुरुआत करें. यानी अगर संस्थानों को शोध करना है तो उसके ख़र्च का जुगाड़ वे ख़ुद ही करें.
अवैज्ञानिक सोच शिक्षा संस्थानों में भी जगह बना रही है
विज्ञान और वैज्ञानिकों को लेकर मोदी सरकार का व्यवहार भी उसकी बातों से मेल नहीं खाता. प्रधानमंत्री की सरकार और उनकी पार्टी के लोग अक्सर अपने धार्मिक व अवैज्ञानिक तर्कों से विज्ञान को नकारने या कमतर साबित करने की कोशिश करते रहे हैं. केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह से लेकर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव तक कई भाजपा नेताओं के बयान इसके उदाहरण हैं.
इस रवैये का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह भी रहा कि अब यह अवैज्ञानिक सोच शिक्षा संस्थानों के स्तर पर भी पहुंच गई है. कुछ समय पहले आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति जी नागेश्वर राव ने दावा किया कि भारत के पास हजारों साल पहले स्टेम सेल अनुसंधान, टेस्ट ट्यूब निषेचन और यहां तक कि गाइडेड मिसाइलों का ज्ञान था. उन्होंने कहा कि इसके सबूत भारतीय महाग्रंथ महाभारत और रामायण में मिलते हैं. जी नागेश्वर ने कहा, ‘स्टेम सेल रिसर्च और टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक के कारण ही एक मां से सौ कौरव पैदा हुए थे. ये कुछ हज़ार साल पहले हुआ था. हमारे देश में यह विज्ञान था.’
जी नागेश्वर यहीं नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा कि भगवान राम ने ऐसे अस्त्र और शस्त्रों या हथियारों का इस्तेमाल किया जो अपने लक्ष्य का पीछा करते थे और उन्हें साधकर वापस लौट आते थे. कुलपति के मुताबिक़ यह इस बात का प्रमाण है कि भारत के पास गाइडेड मिसाइल का विज्ञान हज़ारों साल पहले से मौजूद था. दिलचस्प बात यह रही कि नागेश्वर ने उसी भारतीय विज्ञान कांग्रेस के मंच से ये बातें कहीं, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जय अनुसंधान’ का नारा दिया था.
वैज्ञानिक सोच वाली सरकारों की बदौलत अंतरिक्ष की चौकीदारी संभव हुई
ये तमाम तथ्य बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में विज्ञान क्षेत्र में कितना काम हुआ है. फिर भी, उसे इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि मिशन शक्ति के रूप में भारत की अंतरिक्ष रक्षा क्षमता का वास्तविक उदाहरण उसके कार्यकाल में देखने को मिला. लेकिन इस क्षमता को विकसित करने का श्रेय पूर्व की सरकारों को ज़्यादा जाता है जिनके कार्यकाल में इस क्षेत्र में शोध हुए और भारत ए-सैट मिसाइल तकनीक में महारत हासिल कर सका. बल्कि ज़्यादा बड़ी हक़ीक़त यह है कि भारत ने इस तकनीक का विकास मोदी सरकार के कार्यकाल में नहीं किया. डीआरडीओ और इसरो के पूर्व प्रमुखों ने मोदी सरकार की प्रशंसा करने के साथ यह भी कहा है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने कई साल पहले ही ए-सैट तकनीक हासिल कर ली थी.
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