महात्मा गांधी के डेढ़ सौवें वर्ष में उन पर विचार, पुनर्विचार, व्याख्या-दुर्व्याख्या का एक नया दौर शुरू हुआ है. ऐसे कई हैं जो गांधी से उकता चुके हैं, ऐसे भी बहुत हैं जो सुनी-सुनाई बातों के आधार पर उन्हें खारिज करते रहते हैं. पर, सौभाग्य से, ऐसे बहुत हैं जिनके लिए गांधी आज की विकट परिस्थिति में, जिसमें हिंसा और हत्या को एक वाजिब नागरिक शैली का मुक़ाम हासिल हो गया है, गांधी को एक अजेय, कालजयी और अनिवार्य विकल्प के रूप में देखते और बरतते हैं.

यों तो सभी के लिए पर विशेष रूप से इनके लिए मोहनदास करमचंद गांधी की आत्मकथा का विख्यात विशेषज्ञ त्रिदीप सुह्रद द्वारा संपादित और तैयार आलोचनात्मक संस्करण एक सुखद और उत्तेजक संयोग है. लगभग 800 पृष्ठों की यह बड़ी पुस्तक पेंगुइन ने प्रकाशित की है और पीईएन इंटरनेशनल के पुणे अधिवेशन में उसके हर सदस्य को उपहार में इसकी प्रति दी गयी. यह याद किया जा सकता है कि भारत से जिन ग्रंथों का सारे संसार में अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है उनमें ‘महाभारत’ आदि के साथ यह आत्मकथा भी शामिल है. मूल गुजराती में लिखी इस अनोखी कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद गांधी जी की देखरेख में महादेव देसाई ने किया था. उस मूल अनुवाद को देखते हुए हर पृष्ठ पर सुहृद ने हाशिये में मूल गुजराती से मिलान कर विकल्प या छूट गये शब्द या अभिव्यक्तियां दिये या दी हैं. भारत में किसी आत्मकथा का ऐसा सघन सुपठित संस्करण इससे पहले नहीं हुआ.

चिंतक आशीष नंदी ने अपनी संक्षिप्त भूमिका में गुजराती कवि उमाशंकर जोशी का इतिहासकार अर्नोल्ड टायनबी के हवाले से यह वक्तव्य उद्धृत किया है कि गांधी, बाक़ी बाबाओं और तथाकथित महात्माओं से अलग एक ऐसे संत थे जिन्हें राजनीति की गंदी बस्ती में रहना स्वीकार था. स्वयं टायनबी का वक्तव्य था कि आगे से मनुष्यता अपने मसीहाओं से यह सवाल करेगी कि क्या वे राजनीति की गंदी बस्ती में रहने को तैयार हैं. नंदी बताते हैं कि गांधी का पश्चिमी चिंतन के असहमतिमूलक विचारकों से अच्छा परिचय और सहानुभूति थी. गांधी ने सड़कों पर जनांदोलनों में केवल दो बार भाग लिया और बाक़ी वक़्त सोचने और लिखने में बिताया. उनके लिखे को 97 ज़िल्दों में गांधी वाङ्मय के रूप में प्रकाशित किया गया है.

इसमें संदेह नहीं कि यह संस्करण गांधी-अध्ययन में एक नया आयाम जोड़ता है और इसके बाद उसे नज़रांदाज कर विद्वत्ता अपने को अप्रामाणिक ही सिद्ध करेगी. यह आत्मकथा अपनी प्रासंगिकता में अनोखी है. वह एक ऐसा क्लैसिक है जो एक साथ राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व का है. प्रतापभानु मेहता ने महात्मा और आत्म की प्रकृति को समझने के लिए उसे अनिवार्य और सुहृद् की विद्वत्ता को एक स्वर्ण-प्रतिमान क़रार दिया है.

ज़रूरी है कि इस गौरवग्रन्थ का जल्दी ही हिंदी अनुवाद हो. सुहृद् रज़ा फ़ाउण्डेशन की एक फ़ेलोशिप के अंतर्गत जल्दी ही यह काम शुरू करने जा रहे हैं.

गांधी-कथा

महात्मा गांधी ने अपनी कथा तो कही है पर दूसरे उनकी पूरी कथा कहते नहीं थक सकते. इसलिए इतिहासकार रामचंद्र गुहा की विशालकाय पुस्तक ‘गांधी दि इयर्स दैट चेंज्ड दि वर्ल्ड’ (पेंगुइन द्वारा प्रकाशित) आधुनिक भारत के एक बेहद सजग-सक्रिय-मुखर इतिहासकार द्वारा कही गयी 1914 से 1948 तक की कथा है. अपने आयतन में विशाल, अपने रेंज में विस्तृत, अपने इरादे में महत्वाकांक्षी, अपनी शैली में निहायत पठनीय, अपनी सहानुभूति में गहरी, अपने विचार में प्रखर. इस समय जब अपने डेढ़ सौवें वर्ष में गांधी भारत का राजनीति, समाजनीति, धर्मनीति और अर्थनीति में सबसे सशक्त प्रतिपक्ष है, यह पुस्तक मानो इस प्रतिपक्षता का बखान करती और उसे पुष्टि भी देती है.

गुहा ने अपनी भूमिका में बताया है कि गांधी की भारत में ज़िंदगी अकसर लंबी चलनेवाली और बहुत सघन बहसों की तरह थी. 1934 में गांधी के एक लंदन के दोस्त ने कहा था कि गांधी एक समस्या हैं. शासकों और सत्ताधारियों को वे कांटे की तरह चुभते हैं. तर्कवादियों के लिए वे मूर्ख हैं. अर्थशास्त्रियों के लिए वे एक नीचट अज्ञानी हैं. भौतिकवादियों के लिए वे एक स्वप्नदर्शी हैं. कम्युनिस्टों के लिए वे चक्के पर आयी बाधा हैं. संविधानवादियों के लिए वे क्रांतिकारी हैं. गुहा इसमें जोड़ते हैं कि वे मुसलमान नेताओं के लिए सांप्रदायिक हिंदू थे. हिंदू ध्रुवांतकारियों के लिए वे मुसलमानों के बदनाम तुष्टिकर्ता थे, अछूतों के लिए वे उच्च जाति की दकियानूसी का बचाव करनेवाले थे और ब्राह्मणों के लिए वे बहुुत हड़बड़ी वाले थे. गुहा ने इस पुस्तक में राजनीति, समाज सुधार, धार्मिक सम्बन्धों और आत्मविकास के क्षेत्रों में गांधी के तर्कों का अवगाहन किया है.

गुहा ने उचित ही कहा है कि आधुनिक काल में ऐसा और कोई नेता नहीं है जो अपने देश और उसके लोगों को इतनी आत्मीयता से जानता है जितना गांधी. उन्होंने भारत में हज़ारों मील की यात्राएं कीं जिनमें ट्रेन, कार, बैलगाड़ी और पैदल सब शामिल थे. वे रेगिस्तान, पहाड़, मैदान, कछार, डेल्टा, समुद्रतट आदि सभी जगह गये और कई रातें कस्बों, गांवों, खुले आसमान के नीचे बितायीं. इस दौरान उनका कोई अंगरक्षक नहीं होता था. वे निहत्थे और कई बार निपट अकेले पदयात्री थे.

गुहा के यहां इतिहासकार की वस्तुनिष्ठता है और वे गांधी से अभिभूत होते हुए भी उनके निजी या सामाजिक विचलनों को नज़रंदाज नहीं करते बल्कि उन्हें उचित परिप्रेक्ष्य में रखते हैं. गांधी की विफलताओं का भी बखान हुआ है और उनके समय में ही विकसित उन्हें लेकर ग़लतफ़हमियों का भी. कई बार लगता है, और यह इस जीवनी को एक नये क़िस्म की चमक देता है, कि गुहा स्वयं अपने को समझने की भी चेष्टा कर रहे हैं. गुहा का गद्य वस्तुनिष्ठ है पर खुद उनकी तलाश से दीप्त भी. उसमें सच्चाई और समझ दोनों हैं. गुहा सही कहते हैं कि सत्याग्रह, धर्मों के बीच अमन-चैन, पर्यावरण के लिए ज़िम्मेदारी, अस्पृश्यता की अवैधता और ब्रिटिश साम्राज्य के अंत के परे सत्य की सफल खोज गांधी की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि है.

असहमति की स्थिति

असहमति इस समय फिर चर्चा में है. सर्वोच्च न्यायालय के दो बड़े फ़ैसलों में बहुमत से असहमत होते हुए दो जजों के अलग से अपने फ़ैसलों में असहमति व्यक्त की है. बहुत सारे क़ानूनी विश्लेषकों ने अल्पसंख्यक असहमति को बहुमत से दिये गये फ़ैसलों से अधिक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक माना है. असहमति का ऐसा सम्मान, भले वह अल्पसंख्यक होकर पराजित है और बहुमत विजयी है, हमारे यहां अन्य क्षत्रों में कम ही नज़र आता है. असहमति हमेशा विवादास्पद होती है और अकसर मोर्चा हार भी जाती है. हमारे यहां विशेषतः समकालीन राजनीति में असहमति को देशद्रोह तक क़रार दिया जा रहा है और बहुत सारे क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी उपाय असहमतों को दंडित करने के लिए अभूतपूर्व बेशर्मी और हेकड़ी के साथ किये जा रहे हैं. बहुसंख्यकवाद का ऐसा आतंक फैलाया जा रहा कि जो सहमत नहीं है उसकी समाज में कोई जगह नहीं हो सकती.

ऐसे माहौल में यह याद किया जा सकता है कि अपने समय में गांधी असहमति के सबसे ज्वलंत प्रतीक और स्रोत थे. वे दो विश्वयुद्धों के दौरान विश्वव्याप्त हिंसा से अलग अहिंसा का आग्रह कर रहे थे. एक बुद्धिमान राजनेता के रूप में उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य से लड़कर भारतीय स्वतंत्रता हासिल करने के लिए अहिंसक आंदोलन चलाया और सफल हुए.

वे भारतीय समाज में बरती जा रही अस्पृश्यता से असहमत थे और उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर कोई वेदों में अस्पृश्यता का औचित्य या बचाव दिखा दे तो वे वेदों को खारिज कर देंगे, अस्पृश्यता स्वीकार नहीं करेंगे. वे बीसवीं शताब्दी में विकसित विकास के प्रायः सभी मॉडलों से असहमत थे और आत्मनिर्भर गांव-केंद्रित अर्थव्यवस्था की हिमायत कर रहे थे. वे धर्मों के बीच सद्भाव और संवाद के पक्षधर थे जबकि सभी धर्म अपनी परम स्वतंत्रता और दूसरे धर्मों के प्रति सहानुभूतिहीन हो रहे थे. वे विचार, आचार आदि में स्वराज के हामी थे जबकि देश का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीयता की चपेट में था.

वे भारत के बंटवारे से असहमत थे पर जब एक बार हो गया तो मुसलमानों और पाकिस्तान के वाजिब हितों की रक्षा करना अपना नैतिक कर्तव्य मानते थे. उसी वजह से एक हिंदू द्वारा उनकी हत्या भी हुई. जिस समय में हम रह रहे हैं उसमें असहमति को लोकतंत्र के लिए स्वस्थ और हितकर मानने के बजाय ऐसी शक्तियां सत्तारूढ़ हैं जो उसे दबाने-नष्ट करने-दंडित करने पर हिंसा और हत्या तक करने पर आमादा हैं. गांधी की असहमति सार्थक और अधिकांशतः सफल हुई तो इसलिए कि उसमें व्यापक भारतीय समाज का समर्थन समाहित था. इस तरह का सामाजिक समर्थन शायद हमारे समय में असहमति को मिल पाना कठिन और दूभर हो गया है.

फिर भी, अल्पसंख्यक होने के बावजूद, असहमति का होना ज़रूरी है. जब झूठ सारे प्रपंचों के साथ नयी तकनीक का सहारा लेकर हर जगह व्याप रहा है तब सत्य की असहमति ज़रूरी है. जब धर्म हिंसक हो रहे और अपनी बहुलता तज रहे हैं, अध्यात्म को धर्म से मुक्त करने की असहमति ज़रूरी है. असहमति बचेगी और लोकतंत्र बचेगा, भारतीय परंपरा बचेगी, गांधी एक विकल्प के रूप में बचे रहेंगे.