जो बेहतर है, उसकी चर्चा होनी चाहिए. ख़ास तौर पर उस समय तो ज़रूर, जब वह प्रासंगिक हो. और हर साल सर्दियों की शुरूआत में ही दिल्ली में प्रदूषण की समस्या चर्चा के लिए एक प्रासंगिक विषय होता है. इस बार भी है, जिसकी शुरूआत हो चुकी है. इस प्रदूषण के लिए हर बार एक बड़ा कारण यह बताया जाता है कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों के किसान अपने खेतों में बड़े पैमाने पर पराली (फसल कटने के बाद खेतों में बचा उनका हिस्सा) जलाते हैं. उसके धुएं की चपेट में दिल्ली प्रदूषित होती है. इस कारण के निदान के लिए तमाम बातें होती हैं. फिर भी समस्या जस की तस बनी रहती है. लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की मानें तो पंजाब के ही कुछ किसानों ने इस समस्या के निदान के लिए बातों से आगे जाकर समाधान की मिसाल पेश करने की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं.

अख़बार के मुताबिक मिसाल पेश करने वाले ऐसे ही किसानाें में एक हैं गुरबचन सिंह. तरन तारन के बुर्ज देवा सिंह गांव में रहते हैं, 57 साल की उम्र है. अभी बीते साल ही उन्होंने अपने बेटे की शादी की है. उस वक़्त अपनी होने वाली बहू के पिता के सामने उन्होंने दो शर्तें रखी थीं. पहली- वे अपने लड़के की कोई बारात लड़की वालों के घर नहीं लाएंगे. यानी शादी में इस तरह का कोई तामझाम नहीं चाहेंगे. दूसरी- लड़की वालों को भी यह वचन देना होगा कि वे आगे से कभी अपने खेतों में पराली नहीं जलाएंगे.

ख़बर के मुताबिक इन दोनों ही शर्तों को मानने में लड़की के पिता सतनात सिंह को एक मिनट भी नहीं लगा. इस तरह गुरबचन सिंह ने अपनी एक सकारात्मक पहल के साथ उनके भी परिवार को जोड़ लिया. यह एक सिलसिले की शुरूआत थी. बताया जाता है कि बीते साल भर के भीतर उन्होंने 40 किसान परिवारों को अपने साथ इस अभियान में जोड़ लिया है. ये सभी किसान अब न तो खेतों में पराली जलाते हैं और न ही रासायनिक खाद तथा कीटनाशक आदि का इस्तेमाल करते हैं.

इन प्रयासाें का ही नतीजा है कि आज पराली जलाने के ख़िलाफ़ कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा चलाए गए अभियान में गुरबचन एक प्रमुख चेहरा बन चुके हैं. वे अख़बार से बातचीत के दौरान कहते हैं, ‘लोगों तक अपनी बात पहुंचाने से काफी पहले मैंने अपने खेतों पर यह प्रयोग शुरू किए थे. मैं जानता था कि लोग मेरी बात से तभी सहमत होंगे जब मेरे प्रयासों में मेरी ही ज़मीन पर नतीज़े देखेंगे. और आज ये दिख भी रहे हैं. दो साल में मेरी ज़मीन की उत्पादकता में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है.

गांव के एक अन्य किसान हरदेव सिंह भी यही कहते हैं, ‘गुरबचन के खेतों में जब मैंने असर देखा तो मैंने भी वही किया जो वह करता है. पराली जलाना बंद किया. उर्वरक और कीटनाशकों को इस्तेमाल धीरे-धीरे बंद किया. आज मेरे खेत की मिट्‌टी में भी उसका अच्छा नतीज़ा धीरे-धीरे नज़र आने लगा है.’ यानी यह सिलसिला आगे बढ़े तो नतीजे दिल्ली तक भी दिख सकते हैं.