तकरीबन महीने भर दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती रहने के बाद गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर रविवार को गोवा लाए गए. एम्स के डाॅक्टरों की सलाह के हिसाब से गोवा में पर्रिकर का इलाज चलता रहेगा. पिछले कुछ महीने से बीमार चल रहे पर्रिकर के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे को लेकर भी तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.

गोवा सरकार के कई मंत्रियों ने पर्रिकर के गोवा पहुंचने के बाद प्रसन्नता जाहिर की है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि मुख्यमंत्री को अभी दिल्ली के एम्स में रहकर अपना इलाज पूरा कराना चाहिए था. केंद्रीय मंत्री और गोवा भाजपा के वरिष्ठ नेता श्रीपद नाइक ने भी यही कहा है कि पर्रिकर को एम्स में इलाज जारी रखना चाहिए था. वैसे भी इस बात को लेकर हैरानी जताई जा रही है कि अगर रविवार की सुबह तबीयत बिगड़ने की वजह से मनोहर पर्रिकर को आईसीयू में रखना पड़ा था तो फिर आखिर किस आधार पर दोपहर में उन्हें एम्स ने डिस्चार्ज कर दिया. बीते शुक्रवार को पर्रिकर ने अपने मंत्रियों के साथ एम्स में ही एक बैठक की थी. इसमें वे भाजपा मंत्रियों से अलग से भी मिले और फिर उन्होंने अलग से सहयोगी दलों के और निर्दलीय मंत्रियों से भी मुलाकात की थी.

अभी गोवा की पूरी राजनीति मनोहर पर्रिकर के स्वास्थ्य के आसपास केंद्रित हो गई है. कोई कहता है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं तो कोई कहता है कि नेतृत्व परिवर्तन का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन गोवा सरकार में शामिल लोगों से बातचीत करने पर कुछ अलग ही तस्वीर सामने आ रही है.

गोवा की भाजपा सरकार को समर्थन दे रहे एक निर्दलीय विधायक से बातचीत करने पर पता चलता है कि खुद पर्रिकर अपनी खराब सेहत की वजह से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना चाहते हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ऐसा नहीं चाहता. भाजपा के आला नेताओं को यह लगता है कि अगर पर्रिकर हटते हैं तो गोवा की सरकार चला पाना आसान नहीं होगा.

2017 में हुए गोवा विधानसभा चुनावों में 40 में से 17 सीटें कांग्रेस को मिली थीं. भाजपा को सिर्फ 13 सीटें मिली थीं. विजय सरदेसाई की गोवा फाॅरवर्ड पार्टी को तीन सीटें और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को भी तीन सीटें मिली थीं. इन दोनों पार्टियों और कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से भाजपा गोवा में फिर से सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी.

गोवा में कांग्रेस से भी कम सीटें होने के बावजूद भाजपा की सरकार मनोहर पर्रिकर के नाम पर ही बनी थी. जो भी निर्दलीय विधायक और छोटी पार्टियों के विधायक भाजपा के साथ आए, उनमें से ज्यादातर की शर्त यही थी कि पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाया जाए. गोवा में भाजपा सरकार बनवाने में सबसे सक्रिय भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सार्वजनिक तौर पर माना है कि पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त सबसे पहले विजय सरदेसाई ने रखी और इसके बाद कुछ दूसरे विधायकों ने भी यही शर्त रखी. इन्हीं विधायकों के दबाव में मनोहर पर्रिकर से केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री का पद छुड़वाकर उन्हें वापस गोवा भेजा गया था.

2014 में मनोहर पर्रिकर से गोवा के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. उस वक्त यह बात आई थी कि प्रधानमंत्री अपनी शुरुआती टीम में ही मनोहर पर्रिकर को शामिल कर उन्हें दिल्ली लाना चाह रहे थे. यानी मई 2014 में. लेकिन उस वक्त पर्रिकर तैयार नहीं हुए. लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में पहली बार फेरबदल किया तो पर्रिकर केंद्र सरकार में आ गए और उनकी जगह गोवा का मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर को बनाया गया.

गोवा भाजपा और वहां सरकार का साथ दे रहे विधायकों के हवाले से यह सूचना मिल रही है कि अभी गोवा में मनोहर पर्रिकर का कोई ऐसा विकल्प नहीं है, जो हर पक्ष को स्वीकार्य हो. केंद्रीय मंत्री श्रीपद नाइक को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर कुछ सहयोगियों को दिक्कत है. वहीं नाइक के आने के बाद किसी विधायक से इस्तीफा दिलाकर उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा के लिए निर्वाचित कराने का भी झंझट है. सूत्रों के मुताबिक 13 विधायकों वाली भाजपा अभी ऐसा कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं.

मौजूदा विधायकों में हर पक्ष के लिए कोई स्वीकार्य चेहरा नहीं दिख रहा. सोमवार को गोवा भाजपा कोर कमेटी की बैठक में भी इस मामले में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हो पाया. भाजपा को एक डर यह भी सता रहा है कि अगर मनोहर पर्रिकर के हटने के बाद गोवा में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है तो 17 विधायकों वाली कांग्रेस की सरकार बनने की संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं और लोकसभा चुनावों के छह महीने पहले भाजपा किसी भी कीमत पर बगैर किसी चुनाव के एक राज्य में अपनी सरकार नहीं गंवाना चाहती. अभी पर्रिकर सरकार 23 विधायकों के समर्थन से चल रही है. इनमें भाजपा के 14 विधायक ही हैं. ऐसे में भाजपा को लगता है कि अगर चूक हुई तो बाजी पलट भी सकती है.

इस वजह से भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अभी बीमार मनोहर पर्रिकर के जरिए गोवा में खुद को सत्ता में बनाए रखने की योजना पर काम कर रहा है. भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी बताते हैं, ‘एक प्रस्ताव यह है कि मनोहर पर्रिकर के पास जो विभाग हैं, वे उन विभागों को छोड़ दें और ये विभाग दूसरे मंत्रियों को सौंप दिए जाएं. इससे इन विभागों का सरकारी काम सामान्य गति से होता रहेगा. पर्रिकर मुख्यमंत्री भी बने रहेंगे. इससे गठबंधन के सहयोगियों का भरोसा भी बना रहेगा और सरकार भी चलती रहेगी. संभव है कि दिवाली तक पार्टी इसी रास्ते पर चले. उसके बाद भी अगर पर्रिकर की तबियत ठीक होने की दिशा में नहीं बढ़ती है तो नेतृत्व परिवर्तन पर विचार किया जा सकता है.’