मीटू कैंपेन बीते करीब एक साल से भारत में भी चर्चा का विषय बना हुआ है. तब से ही छोटे-मोटे खुलासों के होते रहने और बड़ों के होने की सुगबुगाहट के बीच यह अपनी संभावनाओं के पर तोल रहा था. शायद इसीलिए बीते महीने जब तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर के बारे में बोलना शुरू किया तो इसने तुरंत अपनी जरूरी रफ्तार पकड़ ली. इस क्रम में सोशल मीडिया पर सिनेमा और मीडिया से जुड़ी कई महिलाओं ने अपनी आपबीती कह सुनाई. इसका नतीजा यह हुआ कि अर्श पर चमक रहे कई नाम, जिनकी तरफ दुनिया बड़ी हसरतों से ताकती थी, फर्श पर अपनी जगह ढूंढ़ते नजर आए.

कथित रूप से यौनशोषण के आरोपितों की इस फेहरिस्त में फिल्म और टीवी कलाकार आलोक नाथ, पूर्व पत्रकार और विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर, लेखक चेतन भगत, फिल्म निर्देशक विकास बहल और विवेक अग्निहोत्री जैसे कई चर्चित और प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं. यह लिस्ट अभी जारी है और जब तक मीडिया का मन इससे नहीं भर जाता, तब तक मीटू आंदोलन अपना पूरा जोर लगाकर इसे बढ़ाने की कोशिश करता दिखने वाला है. और मीडिया का मन इससे तब तक नहीं भरेगा जब तक यह कैंपेन उसे बड़े-बड़े नाम देता रहेगा.

यह सुखद है कि इस बार लड़कियां बोल रही हैं और जमाना सुन रहा है. लेकिन सोशल मीडिया जैसे नाकाबिले-यकीन माध्यम पर जो कुछ भी कहा जा रहा है क्या उसे पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ कहा और उतनी ही समझदारी के साथ सुना जा रहा है? यह सवाल इसलिए क्योंकि जितनी आवाजें मीटू आंदोलन के समर्थन में सुनाई देती हैं, लगभग उतनी ही इसकी तरफ सवालों की बौछार भी करती दिखती हैं. और यह बौछार केवल फंसे हुए लोगों या सिर्फ पुरुषों की तरफ से नहीं आ रही है. यह बात जरा दुखी करने वाली है कि सोशल मीडिया पर किये जा रहे कुछ दावे मीटू जैसे गंभीर आंदोलन में फिट बैठते नजर नहीं आते हैं. उदाहरण के लिए वरुण ग्रोवर पर लगा आरोप, जिसका उन्होंने पूरे तथ्यों के साथ खंडन किया है.

इस बात से इंकार नहीं है कि इस आंदोलन ने बहुत सी महिलाओं को बीते वक्त में अपने साथ हुए अन्याय को सामने लाने की हिम्मत दी है. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा भी लग रहा है कि कुछ लोग इसलिए भी मीटू का हिस्सा बन रहे हैं ताकि वे सोशल मीडिया पर पीछे न रह जाएं. ऐसे लोगों के लिए यह कैंपेन लाइक्स और कमेंट्स के जरिए इंपॉर्टेंस पाने या हैशटैग का इस्तेमाल कर अपनी रीच बढ़ाने का जरिया बन गया लगता है.

ऐसे में सत्याग्रह ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर ज्यादा या बिलकुल सक्रिय न रहने वाली पांच महिलाओं से बातचीत की. इनसे बात करके हमने यह जानने की कोशिश की कि ये सभी सोशल मीडिया पर चल रहे इस आंदोलन के बारे में क्या सोचती हैं और उनके हिसाब से यह उनकी लड़ाई को कौन सी दिशा देने वाला है?

बंगलौर की आईटी कंपनी में काम करने वाली पुष्पा चौधरी कहती हैं ‘मीटू कैंपेन को देखकर मुझे लगता है जैसे सब एक-दूसरे को देख-देखकर अपना-अपना सिर पटक रहे हों. पहला ही तर्क यह हो सकता है कि ऐसे कैसे इतने साल आप चुप रह गए. तभी बोलना चाहिए था. पर ठीक है कोई बात नहीं ये आपकी चॉइस है कि आपको कब बोलना है. लेकिन अब समस्या है कि सबके साथ जो हुआ वह 10 या 20 साल पहले ही हुआ. कोई आज की भी तो बात करो. क्या आज सबकुछ सही हो गया है. एक भी नाम ऐसा नहीं आया जिसने कहा हो कि पिछले हफ्ते या पिछले महीने मेरे साथ कुछ गलत हुआ है.’

इस आंदोलन से आने वाले बदलावों की उम्मीदों को नकारते हुए पुष्पा दोटूक कहती हैं कि ‘मीटू से मुझे नहीं लगता कि जमीनी स्तर पर कुछ होने वाला है. यह सिर्फ वाहवाही और लाइक्स बटोरने या मीडिया में हाइलाइट्स पाने तक सीमित होकर रह गया है. इन आवाजों में भी वो महिलाएं कहीं दब कर रह गई हैं जिन्हें सच में इस आंदोलन की और इससे आगे आने की जरूरत थी. पहले भी इस तरह के मामलों में औरतें नहीं बोलती थीं. पहले भी कॉर्पोरेट्स की वीमेन कमेटी के पास जो केसेज आते भी थे उनमें 80 प्रतिशत महिलाओं के ईगो की वजह से रिपोर्ट होते थे. यानी कभी असली कारणों से कमेटीज का असल इस्तेमाल होते, कम से कम मैंने तो नहीं देखा. असली विक्टिम्स तब भी चुप थीं, अब भी चुप हैं. अगर बोल भी रही हैं तो फालतू का शोर इतना है कि उन्हें कोई सुन नहीं पा रहा है. और इसके अलावा इस कैंपेन से सिर्फ और सिर्फ मर्दों को डराया है. ऐसा रहा तो लोग महिलाओं को नौकरी देना बंद कर देंगे.’

इंदौर में रहने वाली साहित्यकार और महिला उद्यमी अंतरा करवड़े के अनुसार मीटू कोई अभियान ही नहीं है, वे कहती हैं ‘यह लगता है कि जैसे बिना तैयारी एक बात हो गई है. भारतीय समाज अभी उस स्थिति में नहीं लगता कि इस अभियान की गहराई को समझ पाता. इसलिए इसका अच्छा या बुरा कैसा भी असर हो सकता है और जिस तरह से यह हो रहा है उससे पता चलता है कि इसमें भविष्य का विचार ज्यादा नहीं किया गया है.’ करवड़े भारतीय जनमानस की एक अलग दुर्बलता की तरफ ध्यान दिलाती हैं, ‘मैंने कई बार यह महसूस किया है कि लोग इस बात से ज्यादा कि लड़की से साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ, इस पर ध्यान देते हैं कि यह कैसे हुआ. बहुत बार सोशल मीडिया पर लोग रुचि लेकर इसलिए भी पढ़ते हैं कि यह उनकी व्यक्तिगत कुंठा, कल्पना को शब्दरूप देता है.’

सोशल मीडिया हमेशा किसी ट्रेंड को फॉलो करने की जल्दी में रहता है और मीटू के मामले में उसने कोई अतिरिक्त समझदारी दिखाई हो ऐसा नहीं लगता. खासकर महिलाओं की हां में हां मिलाने वाला इसका रवैया इस आंदोलन के गलत दिशा में चले जाने या इसकी असफलता की वजह बन सकता है. यह बात अंतरा कुछ इन शब्दों में कहती हैं, ‘लड़कियां यह बात नहीं समझ रही हैं वे एक बार फिर से मोहरा बन रही हैं. सोशल मीडिया पर लोगों को महिलाओं का जबरन सपोर्ट करने की अजीब सी आदत है. यह अगर कोई आंदोलन है भी तो इसका हाल वैसा ही है जैसा सरकारी योजनाओं का होता है, यह असल हितग्राही तक पहुंच ही नहीं पा रहा है. आप जरा गहरे जाकर सोचिए कि शोषण के हर रूप को क्या इतनी ही दिलचस्पी से सुना जा रहा है. बालश्रम, मानवाधिकार, संवेदना के स्तर पर क्यों इतना नहीं हिलाते हैं आपको?’

इंद्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली से पढ़ाई करने वाली वैदेही त्रिवेदी, हमारे सवालों के जवाब में उल्टे सवाल करती हैं, ‘क्या होगा इससे! कम उम्र में शादी होना रुक जाएगी या मम्मियों का घर में खटना-पिटना कम हो जाएगा. अभी हमारे देश में बहुत सी बेसिक समस्याएं, जो मर्दों औरतों दोनो के लिए हैं, ऐसी हैं जिनसे निपटना बाकी है. हां फिर भी, मुझे लगता है इससे आटे में नमक के बराबर फर्क आएगा. सफेद शर्टों के पीछे जो छिछोरापन करते थे, वे लोग अब थोड़ा डरेंगे.’

इसके साथ ही वैदेही अपनी ही बात का नकारात्मक पक्ष बताते हुए कहती हैं कि ‘लेकिन यह सोशल मीडिया पर जिस तरह से घट रहा है न, और जिस तरह के उदाहरण चर्चा बटोर रहे हैं, उसने मीटू को कमजोर ही किया है. मान लो लोग डरने भी लगे न, तो इस डर का बदला वे महिलाओं से ही निकालेंगे. उनके लिए कहीं काम करना और ज्यादा मुश्किल हो जाएगा. या तो उन्हें नौकरी पर रखेंगे नहीं और रखेंगे तो अपनी शर्तों पर. अब यहां पर लोग कह सकते हैं कि हमने महिलाओं को नौकरी देने का जिम्मा पुरुषों को दिया ही क्यों है. तो थिंक प्रैक्टिकल बॉस. ऐसा है ही. पोजिशन्स उनके पास पहले से हैं और अब तुम अपनी सुरक्षा का जिम्मा देने को भी तैयार हो! हमारे यहां मीटू को गलत तरीके से इंटरप्रेट किया गया है. इसलिए इससे कोई फर्क पड़ने वाला बदलाव आने की उम्मीद करना शेखचिल्ली के सपने देखना है. बस.’

गुजरात के गांधीनगर में रहने वाली श्रुति श्रीवास्तव जो खुद एक सफल बुटीक चेन चलाती हैं, कहती हैं ‘मीटू का फायदा यह हुआ है कि एक हद तक लड़कियों को पता चल गया है कि जुल्म के खिलाफ कभी भी बोला जा सकता है. इसने गलत के लिए डर पैदा करने का काम तो किया ही है. लेकिन इस बात से इंकार नहीं है कि सोशल मीडिया पर केवल और केवल चालू लोग इसका फायदा उठा रहे हैं.’

श्रुति अपने ऑफिस के एक वाकये का उदाहरण देकर बताती हैं कि ‘एक लड़की जो सोशल मीडिया पर खासी सक्रिय थी उसने अपने आपको इस धारा में बहता दिखाने के लिए मेरे और मेरे कुलीग की बातों को गलत तरीके से सोशल मीडिया पर रखा. यह बात हमारे लिए शॉकिंग थी और दुखी करने वाली भी. बाद में पूछने-समझाने पर उसने अपनी गलती मानी और माफी मांग ली लेकिन तब तक हमारे पनप रहे ब्रांड को डेंट लग चुका था. ऐसे और केसेज होने की संभावना से ही मुझे डर लगता है, एक बार को लगा कि कहीं लड़कियों को रखकर मैंने गलती तो नहीं कर दी है. असल में मीटू के इंटरनेट सेंसेशन बन जाने का नुकसान ये है कि लोग नॉर्मल बातों को भी उस खांचे में फिट करने के लिए बुरा बना रहे हैं. ऐसे तो लड़कों का या लड़कों से बात करना मुहाल हो जाएगा. छोटे शहरों में हम इसके लिए भी लड़ते रहे हैं. हम यह नहीं समझ रहे कि हर पोस्ट को हम हैशटैग के साथ करें ये जरूरी नहीं है. समझ का यही फेर मीटू को कमजोर कर रहा है.’ श्रुति का यह कहना सही लगता है क्योंकि सही तरीके से कही गई बात को अगर गलत प्रसंग के साथ जोड़कर कहा जाए तो उसका अनर्थ होते देर नहीं लगती है. हैशटैग मीटू के साथ किए गए कई सोशल मीडिया पोस्ट इस बात का इशारा दे देते हैं.

सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही श्रेया जयप्रकाश, इंदौर में रहती हैं. वे बताती हैं ‘मीटू कैंपेन ने 16-17 साल की लड़कियों को बोलने की हिम्मत दे दी है. अब उनको ये समझाना हमारा काम है कि वे दस साल का इंतजार किए बगैर बोलें. हालांकि सोशल मीडिया पर ध्यान लगाने पर गलत उदाहरण ही हमारे सामने आते हैं. लेकिन कभी-कभी गलत तरीके से शुरू हुई बातें भी एक सही चीज की शुरूआत कर देती हैं, इसलिए मैं इससे एकदम नाउम्मीद तो नहीं हूं लेकिन मुझे ये नहीं लगता कि यह महिलाओं की असली लड़ाई में कोई बड़ा बदलाव लाने का काम करेगा.’

कुछ ऐसी ही बातें हमसे अंतरा करवड़े भी कहती हैं, ‘यह कितना लंबा चलेगा, इसका तो पता नहीं है. जब भी कोई ऐसी चीज आती है, शुरू में खूब हो-हल्ला होता है और जब हो-हल्ला थोड़ा ज्यादा हो जाता है तो हमें उससे फर्क पड़ना बंद हो जाता है.’ फर्क पड़ने के क्रम में वैदेही इसे एक अलग तरह के उदाहरण के साथ समझाती हैं, वे कहती हैं कि ‘दरअसल ज्यादातर भारतीय महिलाओं को न सबकुछ बिन कुछ किए ही चाहिए. हॉलीवुड में मीटू कैंपेन उनकी खुद की देन थी जबकि यहां तो हमको बना-बनाया मिल गया है. अपनी सुरक्षा हमें मर्दों से चाहिए, मुक्का मार के मुंह तोड़ देने की ताकत तो हम कभी लाएंगे नहीं. हर चीज में प्रिविलिजेज चाहिए, मीटू को यही ले डूबेगा!’