नई दुनिया और नवभारत टाइम्स के संपादक रहे मूर्धन्य पत्रकार राजेंद्र माथुर ने यह आलेख 23 मार्च, 1977 को जनता पार्टी की जीत की घोषणा के ठीक बाद लिखा था.
रविवार रात दो-ढाई बजे खबर आई कि रायबरेली में दोबारा मतदान और मतगणना की अर्जियां मतदान अधिकारी ने नामंजूर कर दी हैं. रात साढ़े तीन बजे के करीब कार्यवाहक राष्ट्रपति वासप्पा दानप्पा जत्ती ने आपातकाल हटा लेने की घोषणा कर दी.
आपातकाल की समाप्ति का एक नतीजा यह हुआ है कि संविधान की धारा 19 में वर्णित जो बुनियादी आजादियां खत्म कर दी गई थीं, वे दोबारा कायम हो गई हैं. मीसा की वे धाराएं भी अपने-आप गायब हो गई हैं, जो सरकार को बिना कारण गिरफ्तारी के अपार अधिकार देती थीं. अत: मीसा बंदियों को गिरफ्तार रखना अब संभव नहीं होगा.
नवंबर, 1976 में लोकसभा कार्यकाल एक साल और बढ़वा लिया गया था. संजय गांधी चाहते थे कि जब तक उनका संगठन भारत-भर में न फैल जाए तब तक चुनाव रुके रहें
आपातकाल 26 जून, 1975 को लगाया गया था. उसका कारण यह बताया गया कि प्रतिपक्ष ने अंदरूनी उपद्रव द्वारा सरकार का कामकाज असंभव बना दिया है. लेकिन 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देकर रायबरेली से श्रीमती गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था. उम्मीद थी कि इस फैसले के तुरंत बाद श्रीमती गांधी इस्तीफा दे देंगी. लेकिन कांग्रेस कार्यकारिणी, संसदीय दल, वरिष्ठ नेता, और चौराहे की आयोजित भीड़ें- सब एक स्वर से यह कहते पाए गए कि श्रीमती गांधी में उन्हें विश्वास है.
श्रीमती गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की. न्यायालय ने उन्हें अंतिम फैसला होने तक वोट के अधिकार से वंचित व्यक्ति की तरह लोकसभा की कार्रवाई में भाग लेने की इजाजत दी. उधर प्रतिपक्ष ने उनके इस्तीफे के लिए बुलंद आवाज उठाई, और 25 जून को जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान में एक लड़ाकू भाषण दिया.
25-26 जून की दरम्यानी रात को जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई तथा हजारों प्रतिपक्षी नेता तथा कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए. सुबह रेडियो पर एक भाषण देते हुए श्रीमती गांधी ने आपातकाल का ऐलान कर दिया, और कहा कि वह बहुत कम अरसे के लिए होगा.
आपातकाल के 19 महीनों तक देश में अजीब-सी खामोशी रही, जिससे श्रीमती गांधी को लगा कि प्रतिपक्ष एक फिजूल का गुब्बारा था, जिसे अखबारों और आंदोलनकारियों ने हवा भर-भरकर फुला दिया है
आपातकाल के एक हफ्ते के अंदर एक जुलाई को प्रधानमंत्री ने एक 20 सूत्री आर्थिक कार्यक्रम का ऐलान  किया. विनोबा ने तब आपातस्थिति को अनुशासन-पर्व बताया. लेकिन जब श्रीमती गांधी ने फरवरी, 1976 में चुनाव कराने से इनकार कर दिया तो विनोबा भी श्रीमती गांधी से खिन्न हो गए.
आपातकाल के कदमों को भारतीय राजनीति का स्थायी अंग बनाने के लिए श्रीमती गांधी की सरकार ने नवंबर, 1976 में संविधान का 42वां संशोधन मंजूर किया, जिसने इस किताब की शक्ल बदल दी. एक प्रेस कानून भी पास हुआ जो अखबारों को दंडित करने का स्थायी अधिकार सरकार को देता है. लेकिन इस दौरान इंडियन एक्सप्रेस और स्टेट्समैन जैसे पत्रों ने जोखिम उठाकर सरकार की ज्यादती के खिलाफ लगातार संघर्ष किया.
आपातकाल के दौरान स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार सेंसरशिप लागू हुई. संसद की कार्रवाई को रिपोर्ट करने पर भी पाबंदी लगाई. कई मुख्यमंत्रियों के बयान भी नहीं छपने दिए गए; मसलन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य कि खेती को संविधान की समवर्ती सूची में रखने का वे विरोध करते हैं.
आपातकाल संजय गांधी की सलाह से लगाया गया था. संकट के समय संजय की सलाह से प्रभावित होकर श्रीमती गांधी अपने पुत्र के प्रति ममता और कृतज्ञता से भर गईं. दबाव डालकर उनके नाम अखबारों के पहले पन्ने पर छपवाए जाने लगे, और मुख्यमंत्री उनकी राजकुमार की तरह अगवानी करने लगे. सारे देश को लगा कि श्रीमती गांधी अपने पुत्र को भावी प्रधानमंत्रित्व के लिए तैयार कर रही हैं.
विनोबा ने तब आपातस्थिति को अनुशासन-पर्व बताया. लेकिन जब श्रीमती गांधी ने फरवरी, 1976 में चुनाव कराने से इनकार कर दिया तो विनोबा भी श्रीमती गांधी से खिन्न हो गए
संजय गांधी को युवक कांग्रेस का काम सौंपा गया. उन्होंने अपने वफादारों की एक नई सेना संगठित की; जिसका बड़ा जलसा गुवाहाटी में अभी नवंबर में हुआ. उसी समय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन भी वहीं हो रहा था. प्रधानमंत्री ने तब हर्ष के साथ कहा कि कांग्रेस की काफी गरज युवक कांग्रेस ने छीन ली है. गुवाहाटी के बाद इरादा यह था कि पुरानी कांग्रेस का कायाकल्प करके उसे संजय गांधी का राजतिलक करने वाली कांग्रेस बना दिया जाए.
संजय गांधी की नाराजगी के कारण श्रीमती गांधी के कई पुराने साथी अलग छिटक गए और उनका महत्व कम हो गया. नंदिनी सत्पथी और हेमवती नंदन बहुगुणा को जाना पड़ा. सिद्धार्थ शंकर राय को हटाने की कोशिश शुरू हुई. रजनी पटेल अलग कर दिए गए. गुवाहाटी में कांग्रेस अध्यक्ष बरुआ को एक युवक नेता ने खुलेआम भला-बुरा कहा.
सूचना और रेडियो मंत्री मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने आजादी के दीये बुझाने में उल्लेखनीय रोल अदा किया. फिल्मी गीतकारों और अभिनेताओं के उन्होंने सरकार की प्रशंसा में गीत गाने के लिए मजबूर किया और किशोर कुमार जैसे कलाकार ने जब इनकार कर दिया तो रेडियो से उनके गाने न बजाने के आदेश दे दिए गए. कई ख्यातिप्राप्त अखबार बंद हो गए, जैसे रमेश थापर का सेमिनार, साने गुरूजी का साधना, राजमोहन गांधी का हिम्मत, अंग्रेजी त्रैमासिक क्वेस्ट, एडी गोरवाला का ओपीनियन.
दिल्ली में कुलदीप नैयर ने, गुजरात में भूमिपुत्र ने और मीनू मसानी के फ्रीडम फर्स्ट ने न्यायालयों में ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ीं. लेकिन सरकार ने अदालतों के फैसलों को छापने पर भी पाबंदी लगा दी
सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जजों के तबादले आपातकाल में शुरू हुए. दिल्ली में कुलदीप नैयर ने, गुजरात में भूमिपुत्र ने और मीनू मसानी के फ्रीडम फर्स्ट ने न्यायालयों में ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ीं. लेकिन सरकार ने अदालतों के फैसलों को छापने पर भी पाबंदी लगा दी. जनसंघ का अखबार मदरलैंड बंद हो गया और कम्यूनिस्टों के दैनिक पैट्रियट ने जब संजय गांधी की तसवीरें छापने से इनकार कर दिया तो सरकार ने उसके विज्ञापन बंद कर दिए. विद्याचरण शुक्ल ने बार-बार कहा कि पुरानी आजादी फिर कभी लौटने नहीं दी जाएगी.
आपातकाल के दौरान रेलें समय से चलीं, बोनस की मांगें या हड़तालें नहीं हुईं, पहली बार हुकूमत ने सख्ती से राज करने का आभास दिया. आर्थिक उत्पादन बढ़ा, अन्न का भंडार एक करोड़ 80 लाख टन हो गया और विदेशी मुद्रा से खजाना भरपूर हो गया. लेकिन सरकार यह कभी समझा नहीं सकी कि इन उपलब्धियों के लिए डेढ़ लाख लोगों को जेल में रखना क्यों जरूरी है, और इन लोगों ने क्या गद्दारी की है.
संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम के अंतर्गत नसबंदी का कोटा हर पटवारी, डॉक्टर, शिक्षक आदि को दिया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि खेतों, खलिहानों और शिविरों में जबरन पकड़-पकड़कर लोगों की नसबंदी की गई. कांग्रेस की हार का यह एक प्रमुख कारण रहा है.
आपातकाल के 19 महीनों तक देश में अजीब-सी खामोशी रही, जिससे श्रीमती गांधी को लगा कि प्रतिपक्ष एक फिजूल का गुब्बारा था, जिसे अखबारों और आंदोलनकारियों ने हवा भर-भरकर फुला दिया है. वे लगातार कहती रहीं कि हमने प्रजातंत्र के रास्ते को छोड़ा नहीं है, और चुनाव होंगे.
सरकार यह कभी समझा नहीं सकी कि उसने आपातकाल में जो उपलब्धियां हासिल की हैं उनके लिए डेढ़ लाख लोगों को जेल में रखना क्यों जरूरी है, और इन लोगों ने क्या गद्दारी की है
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद श्रीमती गांधी ने चुनाव कानूनों में परिवर्तन कर लिया, और राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री आम उम्मीदवार से अलग श्रेणी में रख दिए गए. इस नए कानून के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद के फैसले को रद्द कर दिया. सिर्फ मोहम्मद हमीदुल्ला बेग ने यह अनावश्यक टिप्पणी की कि नए कानून के बजाय हम पुराने कानूनों के आधार पर ही विचार करें तो भी श्रीमती गांधी मुकदमा जीतती हैं. श्री बेग आज भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं और श्री खन्ना की वरीयता की उपेक्षा कर उन्हें यह पद दिया गया है.
हेबियस कॉर्पस (गिरफ्तारी के बाद अदालत में सुनवाई) का अधिकार आपातकाल के दौरान सारी आजादियां स्थगित होने के बाद भी नागरिक को है या नहीं, इस विषय में एक ऐतिहासिक फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने दिया. उसने कहा कि जो अधिकार संविधान में ही नहीं है, वह मौजूद ही नहीं हो सकता. इसके विपरीत न्यायमूर्ति एचआर खन्ना ने कहा कि हेबियस कॉर्पस का अधिकार कानून के राज की बुनियाद है, और वह संविधान के बाहर स्थित एक अलिखित अधिकार है, जिस पर अदालतें अमल करवा सकती हैं.
18 जनवरी, 1977 को प्रधानमंत्री ने चुनाव की घोषणा की. इससे पहले कई लोग कह चुके थे कि चुनाव नहीं होंगे. नवंबर, 1976 में लोकसभा कार्यकाल एक साल और बढ़वा लिया गया था. संजय गांधी चाहते थे कि जब तक उनका संगठन भारत-भर में न फैल जाए तब तक चुनाव रुके रहें.
लेकिन जनवरी 1977 के बाद घटनाचक्र तेजी से घूमा. (23 जनवरी, 1977 को )चार दलों के विलय के बाद एक जनता पार्टी बनी. रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण को सुनने के लिए अभूतपूर्व सभा हुई. दो फरवरी को जगजीवन राम ने इस्तीफा दे दिया. जनता पार्टी का असर एक आंधी की तरह प्रबल होता गया. और अंत में नाराज तथा गुमसुम जनता ने अपना बदला ले ही लिया.