दिल्ली में जब एमजे अकबर के इस्तीफे की हवा उड़ी और न्यूज़ चैनल्स पर सूत्रों के मुताबिक इस्तीफा देने की ब्रेकिंग न्यूज़ चली तब सुनी-सुनाई है कि एमजे अकबर बड़े आराम से अपने घर पर कॉफी पी रहे थे. या यूं कहें कॉफी पी नहीं रहे थे सिर्फ कॉफी की खुश्बू का आनंद ले रहे थे. उस दिन ‘एमजे’ के घर जाने वाले कुछ खास लोगों में से उनके एक करीबी रिश्तेदार बताते हैं कि एमजे अकबर की एक पुरानी आदत है - वे जब भी कुछ लिखने बैठते हैं उनके बगल में गरमागरम कॉफी रखी जाती है जिसे वे पीते नहीं हैं बस सुगंध का लुत्फ उठाते हैं और कलम चलाते रहते हैं. जैसे ही कॉफी ठंडी होने लगती है नई कॉफी आ जाती है.

बस 14 अक्टूबर को फर्क इतना था कि एमजे अकबर संपादकीय या खबर नहीं लिख रहे थे, वे अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब तैयार कर रहे थे. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि वे जब विदेश में थे उसी वक्त तय हो गया था कि वे इस्तीफा नहीं देंगे. अकबर ने एक बड़े नेता से बात की थी और अपना पक्ष रखने की इच्छा जताई थी. उस बड़े नेता ने उन्हें अपना पक्ष मजबूती से रखने की सलाह दी थी. यही वजह थी कि जब वे दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे तो वे परेशान नहीं दिख रहे थे. विदेश में रहते ही उन्हें उन 10 महिलाओं के आरोपों का पूरा ब्योरा मिल चुका था और उन्होंने उन पुराने पत्रकारों से बात भी कर ली थी जो उनके पक्ष में गवाही देने के लिए तैयार थे. एमजे अकबर ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया और अब आगे क्या होगा, इसके पीछे तीन बाते हैं जिनमें से कुछ सुनी-सुनाई और कुछ उससे ज्यादा हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार में इस्तीफे नहीं होते?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, दोनों के करीबी बताते हैं कि इस सरकार में इस्तीफा नहीं होता. ऐसा कभी नहीं होगा जब मीडिया के दबाव में आकर किसी मंत्री की कुर्सी जाएगी. यह इस सरकार का सीधा संविधान है जिसका पालन किया जा रहा है. भाजपा के एक बड़े नेता से जब कुछ महिला पत्रकारों ने गुस्से में पूछा कि आपको महिला वोट नहीं चाहिए? इसके जवाब में उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘चुनाव में अभी 6-8 महीने हैं. तब तक ये मामला ठंडा हो जाएगा और आप लोग भी इसके बारे में दो शब्द नहीं लिखेंगे. लेकिन अगर चुनाव से ठीक पहले मंत्री का इस्तीफा हो गया तो एक नया सिलसिला शुरू हो जाएगा. जो गलती मनमोहन सिंह सरकार में राहुल गांधी की वजह से हुई थी वो मोदी सरकार में नहीं होगी. पब्लिक मीटू भूल सकती है, लेकिन जब मंत्री इस्तीफा देने लगते हैं तो फिर सरकार की छवि पर बट्टा लग जाता है.’

इन्हीं बड़े नेता महोदय ने पत्रकारों को समझाते हुए यह भी बताया, ‘अगर एक मंत्री का इस्तीफा हो गया तो कल कांग्रेस किसी और मंत्री का इस्तीफा मांग लेगी. सोशल मीडिया में कोई भी आरोप लगा सकता है. इसलिए सबसे आसान रास्ता है अदालत जाना. जैसे ही मामला सबज्यूडिस हो जाएगा, ये मुद्दा ही खत्म हो जाएगा.’

क्या एमजे अकबर के मंत्री बने रहने में फायदा है?

भाजपा में एक बात और सुनाई दे रही है. नरेंद्र मोदी सरकार में एक मुस्लिम मंत्री का इस्तीफा सबने मांगा, लेकिन उसे हटाया नहीं गया. यह बात भाजपा देश के मुस्लिम समाज तक अपने तरीके से पहुंचाना चाहती है. संघ से आकर भाजपा में काम करने वाले एक नेता से बात हुई तो उन्होंने बताया कि इस मुश्किल वक्त का भी अपना महत्व है. मुस्लिम समाज में यह बात चल रही है कि अगर कांग्रेस होती तो मुसलमान नेता को मंत्री की कुर्सी से हटा दिया जाता, लेकिन भाजपा ने उस मंत्री को कुर्सी पर बनाए रखा. दिल्ली के कुछ मौलानाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं से भाजपा नेताओं की बातचीत हुई है. चुनाव से पहले अकबर को मुस्लिम नेता की तरह प्रचारित किया जाएगा और उन्हें कुर्सी पर बनाए रखने का फायदा भाजपा को दिलाने की कोशिश होगी. अगर मीटू के मामले में थोड़ी छवि खराब होगी तो अल्पसंख्यक के साथ बर्ताव के मामले में थोड़ी सही भी हो सकती है.

एमजे अकबर का आगे क्या होगा?

मोदी सरकार कुछ दिनों में मंत्रियों के विभागों में फेरबदल करेगी. इस सरकार का यह आखिरी फेरबदल माना जा रहा है. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि इस में एमजे अकबर को विदेश मंत्रालय से हटाया जाएगा. इस फैसले की वजह विपक्ष नहीं है. दरअसल सरकार को खबर मिली है कि विदेश मंत्रालय कवर करने वालीं महिला पत्रकार अकबर का बहिष्कार कर सकती हैं. सरकार में विदेश मंत्रालय ऐसा विभाग है जिसे कवर करने वालों में ज्यादातर महिलाएं हैं. ‘मी टू’ अभियान में इन महिलाओं ने सोशल मीडिया के जरिए अपने मन की बात जगजाहिर भी कर दी है. इसलिए सरकार ऐसा मौका नहीं देना चाहती जब किसी विदेशी मेहमान के सामने महिला पत्रकार अपने देश के विदेश राज्यमंत्री का बायकॉट कर दें. अगर ऐसा हुआ तो ये विदेशी अखबार की भी सुर्खियां बन जाएगी.

मोदी सरकार के साढ़े चार साल के वक्त में ‘अकबर संकट’ काफी मुश्किल वक्त लाया था. सरकार की खबर रखने वाले एक प्रभावशाली पत्रकार बताते कि सरकार और पार्टी में इसे लेकर दो राय थीं. कुछ वरिष्ठ मंत्री और नेता इस पक्ष में थे कि एमजे अकबर से किनारा कर लेना चाहिए. वैसे भी वे भाजपा के पुराने नेता नहीं हैं. नए-नए आए हैं जितनी जल्दी इनसे दूरी बना लें उतना अच्छा. लेकिन चुनाव नजदीक है, पहले विधानसभा और फिर लोकसभा. इसलिए सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने फैसला किया कि अकबर की गद्दी बनी रहेगी बस उनके मत्रालय में बदलाव हो सकता है.