नाना पाटेकर-तनुश्री दत्ता प्रकरण के बाद बड़ी हस्तियों पर लग रहे यौन उत्पीड़न के आरोपों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा. यह मी टू अभियान का भारतीय संस्करण है. मी टू अभियान पिछले साल हॉलीवुड की एक अभिनेत्री के द्वारा वहां के बड़े फिल्म निर्देशक पर लगाए गए यौन शोषण के गंभीर आरोपों के बाद शुरू हुआ था. उसके बाद इस अभियान के तहत अन्य बहुत सी महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन हिंसा के ऐसे अनुभवों को साझा किया था.

मी टू अभियान के इस देसी संस्करण से प्रभावित होकर कई महिला पत्रकारों ने भी अपने साथ काम करने वाले कई पत्रकारों पर इसी तरह के अारोप लगाए हैं. बॉलीवुड अभिनेताओं, निर्देशकों, संगीतकारों, गीतकारों, पत्रकारों और नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है.

इस अभियान के तहत महिलाओं द्वारा किए जा रहे खुलासों पर बॉलीवुड और समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. कुछ लोगों का मानना है कि यह महिलाओं के लिए एक पब्लिसिटी स्टंट है. कुछ अन्य का कहना है कि इन अारोपों में निश्चित तौर पर कहीं न कहीं सच्चाई है. कुछ अन्य इसे आपसी संबंध खराब होने पर बदले की भावना से किया जाने वाला काम भी मान रहे हैं.

सबसे पहले तो मी टू अभियान से जुड़ी कुछ बातों/बयानों/तर्कों का खंडन किए जाने की जरूरत है. मसलन नाना पाटेकर ने अपने बचाव में तर्क दिया है कि ‘सेट पर सौ-डेढ़ सौ लोग थे, ऐसा होता तो कोई तो देखता!’ निश्चित तौर पर नाना पाटेकर का पक्ष भी धैर्य से सुना जाना चाहिए. लेकिन क्या वे नहीं जानते कि इस देश में लगभग 85 प्रतिशत बच्चे अपने घरों में परिवार वालों के साथ रहते हुए, अपने परीचितों द्वारा ही यौन उत्पीड़न का शिकार होते हैं...और अक्सर ही पीड़ित बच्चों के मां-बाप को इसकी भनक तक नहीं लगती. क्या हम सच में उन मासूम बच्चों को ऐसा कह सकते हैं, कि ‘कुछ हुआ होता तो घर में किसी ने तो देखा होता?’ नहीं न! खुद को बचाने का यह बेहद खोखला कुतर्क है.

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों की शिकायत के लिए मीडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बजाय थाने में जाकर पुलिस रिपोर्ट करानी चाहिए. निःसंदेह पुलिस रिपोर्ट भी कराई जानी चाहिए. लेकिन हर कोई जानता है कि सालों बाद ऐसे किसी केस के सबूत इकट्ठे करना बहुत दूर की कौड़ी है. बल्कि लगभग असंभव ही है. असल में इस तरह के खुलासों का मकसद सिर्फ कुछ मुट्ठी भर लोगों को जेल भिजवाने से कहीं ज्यादा बड़ा है. इन खुलासों का बड़ा मकसद चंद लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचाने से ज्यादा, लंपटों की लंपटई पर लगाम कसना और संस्थाओं के भीतर महिलाओं के लिए सहयोगी और सम्मानजनक माहौल बनाना ज्यादा है.

मी टू अभियान का समाज में क्या प्रभाव पड़ रहा है या पड़ सकता है?

1. यह अभियान पीड़िताओं के मन में यौन शोषण की घटनाओं से जुड़ी शर्मिंदगी और अपराधबोध को दूर करता दिख रहा है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में पीड़िताएं अपने साथ हुई यौन हिंसा के बारे में बिना अपना नाम और चेहरा छिपाए बता रही हैं. ‘इज्जत लुटने’ के बहुप्रचलित मुहावरे का प्रयोग अब पीड़िता की बजाय दोषी व्यक्ति के लिए प्रयोग होने की संभावना दिख रही है.

2. बॉलीवुड में यौन शोषण के कई आरोपितों को उनके प्रोजेक्ट्स से हटाया जा रहा है. इससे अन्य सामाजिक संस्थाओं, विभागों के ऊपर यह दबाव बनने की शुरुआत होगी कि वे भी यौन शोषण के आरोपितों का बहिष्कार करें. अबसे पहले समाज में बलात्कारियों या यौन शोषण के अपराधियों का इतने खुले और व्यापक तौर बहिष्कार करने का माहौल कभी नहीं रहा, जैसा कि अब बनता दिख रहा है.

3. यह अभियान पुरुषों द्वारा सहजता से किए जाने वाले ऐसे व्यवहार पर भी जरूरी सवाल उठा रहा है जो अक्सर ही महिलाओं को असहज करने का काम करते हैं. ऐसे तमाम व्यवहार पुरुषों के एक बड़े तबके के लिए इतने सहज हैं कि जिन्हें करने के लिए उन्हें सोचना तक नहीं पड़ता कि करें या न करें. ऐसे व्यवहार वे स्वभाव वश जब-तब करते ही रहते हैं. वे ऐसी कोई कल्पना भी शायद नहीं कर सकते कि उनकी ऐसी हरकतें महिलाओं को बेहद असहज महसूस करवाती हैं. संभव है कि इस दिशा में कुछ बिंदु निकल कर सामने आएं कि वे कौन से व्यवहार हैं जिन्हें अब पुरुषों को सहजता से करना बंद कर देना चाहिए.

कौन सी चीजें मी टू का हिस्सा कतई नहीं बननी चाहिए?

1. बहुत सारी लड़कियां/महिलाएं अब यह समझ गई हैं कि उनकी देह सिर्फ पुरुष द्वारा शोषित होने के लिए ही नहीं है, बल्कि यह एक बहुत कारगर हथियार भी है जिसका प्रयोग वे अपने हित में कर सकती हैं. ऐसी भी लड़कियां/महिलाएं अब समाज में हैं जो अब स्वेच्छा से अपनी देह को कम समय में ज्यादा तरक्की/सुविधा/पद/पैसा पाने के लिए प्रयोग कर रही हैं. ऐसी महिलाएं मी टू अभियान का समर्थन जरूर कर सकती हैं, लेकिन नैतिक तौर पर उन्हें अपने केस को इस अभियान का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए.

2. कास्टिंग काउच को भी सीधे तौर पर इस अभियान का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वहां भी मामला परस्पर लेन-देन का है. लड़की ने कोई कीमत अदा की (चाहे वह संबंध बनाना ही क्यों न हो), जिसके बदले उसे कोई सुविधा मिली. निःसंदेह विकल्पहीनता के दबाव में कोई अनचाहा निर्णय लेने की बाध्यता भी एक किस्म का मानसिक उत्पीड़न ही है. लेकिन चूंकि यहां कुछ पाने के लालच में कुछ देने की मौन सहमति का मसला है, इसलिए इसे भी नैतिक तौर पर मी टू अभियान का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि मी टू अभियान शुद्ध रूप से बलात बनाए गए संबंधों या बिना किसी पूर्व सहमति या सूचना के महिला के साथ किए गए दुर्व्यवहार से जुड़ा है.

3. किसी व्यक्ति से आहत करने वाले व्यवहार का बदला लेने, पूर्व प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर उसे सबक सिखाने, किसी अन्य लालच में या कोई काम निकलवाने के लिए दबाव बनाने के लिए किसी भी पुरुष पर यौन उत्पीड़न का झूठा आरोप लगाना एक किस्म का गंभीर अपराध है. इसके लिए निश्चित तौर पर कोई कठोर सजा तय होनी चाहिए. क्योंकि किसी व्यक्ति पर झूठे आरोप लगाना न सिर्फ उसकी बल्कि उसके पूरे परिवार की सामाजिक हत्या करने जैसा है!

मी टू की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

1. इस अभियान की पहली चुनौती इसे पुरुष विरोधी या पुरुष बनाम महिला बनाने से बचाना है. इस अभियान का उद्देश्य यौन उत्पीड़कों के साथ महिलाओं को एक इंसान न समझकर उनके साथ एक भोगी जाने वाली वस्तु की तरह पेश आने वाली सोच का विरोध होना चाहिए. मी टू को पुरुष विरोधी माहौल बनाने के लिए प्रयोग करना उन पुरुषों का अपमान करना होगा जो कि हर स्तर पर स्त्री सहयोगी होते हैं.

2. इस अभियान की एक बड़ी चुनौती सही आरोपित को सजा दिलवाना और यौन शोषण के झूठे आरोपों का सामना कर रहे लोगों को उत्पीड़न के आरोपों से बाइज्जत बरी करना भी है.

3. मी टू का मुख्य उद्देश्य महज कुछ दोषियों को सजा दिलवाना भर नहीं है. बल्कि इसकी असली चुनौती इस बात में है कि यह हमारी संस्थाओं को महिलाओं के प्रति कितना अनुकूल या ‘विमन फ्रेंडली’ बना पाता है? यह भी कि यह पुरुषों में महिलाओं को एक स्वाभाविक सहयोगी की तरह लेने की भावना कितनी भर पाता है?

इस अभियान के तेजी से फैलने के साथ महिलाओं के ऊपर यह जिम्मेदारी बहुत ज्यादा बढ़ गई है, कि वे इस मंच का निजी हित में दुरुपयोग न करें. ऐसा करने से झूठे आरोपों का सामना करने वाले पुरुषों के साथ-साथ असली पीड़िताओं का भी बहुत नुकसान होगा. क्योंकि इससे मंच की और उन पीड़िताओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो जाएंगे.

बहुत संभव है कि सालों पुराने मामलों में सबूतों के अभाव में सभी आरोपित बाइज्जत बरी रहेंगे, लेकिन निश्चित तौर पर नए फिराकियों के रास्ते पहले से ज्यादा तंग होंगे! समाज का पहले की अपेक्षा ज्यादा स्त्री सहयोगी बनना यह इस अभियान की बड़ी सफलता होगी.