यह अक्टूबर विखंडित हुई मूर्तियों की पहचान के नाम रहा. वैसे तो पत्रकारिता में भी पूजने का चलन सिनेमा बराबर ही मौजूद है, इसलिए इस लेख में पत्रकारिता में विखंडित हुई शख्सियतों को छोड़कर सिर्फ सिनेमा के बारे में बात करना अखरता तो है. लेकिन जो सवाल शीर्षक के मार्फत हिंदी सिनेमा पर लागू हो रहा है, वह पत्रकारिता और उसके दागदार युग पुरुषों पर भी लागू होगा ही. और इसका जवाब भी, सिनेमा और पत्रकारिता के लिए ‘एक’ होने वाला है – नहीं!

हिंदुस्तानी ‘मी टू’ आंदोलन ने अपने शैशवकाल में ही कई जाने-माने चेहरों को अविश्वास से देखने पर मजबूर कर दिया है. गीतकार-लेखक वरुण ग्रोवर जैसे ‘मी टू’ आंदोलन के समर्थकों ने खुद पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों का मजबूती से सिलसिलेवार जवाब देकर उन पर विश्वास करने की वजहें दी हैं, तो दूसरी तरफ नाना पाटेकर और विकास बहल जैसी बॉलीवुड की ताकतवर शख्सियतों ने कई-कई मौके होने के बावजूद न अपना पक्ष रखा न कोई मजबूत सफाई दी है. रजत कपूर जैसे कई निर्देशकों, कलाकारों ने ट्विटर के माध्यम से रखा और दिया भी है तो उनका माफी मांगना एक ‘पैटर्न’ की तरह उभरकर सामने आ रहा है. पीयूष मिश्रा, उत्सव चक्रवर्ती, रघु दीक्षित जैसी कई मशहूर हस्तियों को लगने लगा है कि सार्वजनिक रूप से माफी मांग लेना खुद को और खुद की छवि को बचा लेने का सबसे आसान तरीका है. और इसलिए इन दिनों ट्विटर पर धड़ल्ले से माफीनामे ट्वीट किए जा रहे हैं.

फिर कुछ हैं जो आरोपों का खंडन करके खुद के बेगुनाह होने की दलील दे रहे हैं, लेकिन कुछ वक्त बाद ही वकीलों की फौज को महिलाओं के पीछे दौड़ा कर डराने-धमकाने का बरसों पुराना हथकंडा अपना रहे हैं. नाना पाटेकर, सुभाष घई से लेकर विवेक अग्निहोत्री, और खासकर आलोक नाथ ने मानहानि का मुकदमा दायर कर पीड़ितों को थोड़ी और पीड़ा पहुंचाने का जिम्मा उठा लिया है.

हॉलीवुड में 2017 में तेजी पकड़ने वाले ‘मी टू’ मूवमेंट और हमारे यहां आखिरकार अक्टूबर, 2018 में शुरू हुए उसके प्रतिरूप में कई समानताएं मौजूद हैं. कई पैटर्न वही उभरकर आ रहे हैं जो हॉलीवुड में एक साल पहले बन चुके हैं. ताकतवर कलाकार और निर्देशक यहां भी हॉलीवुड (व वाइनस्टीन) की तर्ज पर ही अदालती कार्रवाई का डर खुलासे करने वालों को दिखा रहे हैं. जेम्स फ्रेंको, टीजे मिलर, अजीज अंसारी, बेन एफ्लेक, डस्टिन हॉफमैन जैसी हॉलीवुड हस्तियों की ही तरह हमारे यहां भी कई मशहूर सेलिब्रिटी तुरंत माफी मांगकर गंभीर आरोपों को वहीं का वहीं निपटा रहे हैं. हॉलीवुड की ही तरह कई मशहूर कलाकारों-निर्देशकों के खिलाफ एक नहीं कई महिलाएं सामने आ रही हैं जिस वजह से उनके दावों में झूठ की गुंजाइश खत्म हो जाती है.

और फिर हॉलीवुड की ही तरह हिंदुस्तान में भी ‘मी टू’ व ‘टाइम्स अप’ मूवमेंट का चेहरा एक कम-प्रसिद्ध व गुमनामी में खो चुकी अभिनेत्री (तनुश्री दत्ता) ही बनी है. तनुश्री दत्ता की भूमिका और उनकी वजह से हमेशा के लिए बदलने की राह पर खड़े बॉलीवुड पर हमने विस्तार से इस अक्टूबर की शुरुआत में लिखा था, वक्त मिले तो पढ़िएगा.

इतनी समानता के बाद सवाल उठता है कि क्या अमेरिका की तरह हमारे यहां भी दागदार कलाकारों के साथ-साथ उनकी कला का बहिष्कार होना शुरू होगा? क्या हिंदुस्तानी समाज व दर्शकों के लिए ‘मी टू’ मूवमेंट के इस दौर में दागदार कलाकारों और उनकी कला को अलग-अलग देख पाना मुमकिन होगा? उदाहरण के लिए क्या रजत कपूर की लंपटता के बाद उनकी बनाई ‘आंखों देखी’ को हम वही प्यार दे पाएंगे जो हमने पहले उस पर न्यौछावर किया था? फिल्मों का इतिहास तो कहता है कि हां, बेहद आसान होगा. क्योंकि शक्ति कपूर से लेकर ऑनलाइन यूट्यूब चैनल टीवीएफ तक पर लगे यौन उत्पीड़न के इल्जामों को जल्द भुलाकर दर्शकों ने इन्हें वापस से सराहा है. लेकिन, मौजूदा वक्त में ‘मी टू’ मूवमेंट को मिल रहे समर्थन के बाद लगता है कि इस बार वर्तमान, इतिहास में हुई गलतियों को दोबारा दोहराने से मना कर देगा.

एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में ‘मी टू’ की वजह से अप्रैल 2017 से लेकर अब तक 250 से ज्यादा मशहूर शख्सियतों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लग चुके हैं. क्या नेता, क्या सीईओ और क्या सेलिब्रिटी. इनमें से कई सार्वजनिक रूप से शर्मसार हो चुके हैं, कई के खिलाफ मजबूत अदालती केस शुरू हो चुके हैं, और कई को अपने-अपने क्षेत्र में काम मिलना या तो बंद हो चुका है, या कम हो गया है. हॉलीवुड में खासकर, कई कलाकारों व उनकी कला को एक-दूसरे से अलग करके देखने के लिए लोग तैयार नहीं हैं.

इसका प्रमुख उदाहरण 59 वर्षीय अभिनेता केविन स्पेसी हैं. नाबालिग लड़कों और आदमियों के यौन उत्पीड़न के आरोपों से जूझ रहे इस अभिनेता के उदाहरण से हिंदुस्तान के हुक्मरान व फिल्म मुगल भी यह सीख सकते हैं कि देसी ‘मी टू’ मूवमेंट के आरोपितों को किस दर्जे की कड़ी सजा दी जानी चाहिए. हाल-फिलहाल के दिनों में रॉबिन राइट व जूडी डेंच ने भले ही उनकी वापसी की वकालत करना शुरू कर दिया हो लेकिन 29 अक्टूबर 2017 को पहली बार यौन उत्पीड़न के आरोप से दो-चार होने वाले इस बेहद शानदार अभिनेता को आरोप लगते ही नेटफ्लिक्स ने अपनी सबसे सफल सीरीज ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इन आरोपों के बाद कई सिनेप्रेमियों ने उनके लीड रोल वाले पांचवें सीजन को भी देखना सही नहीं समझा था और नेटफ्लिक्स ने भी इन भावनाओं को सही समय पर समझते हुए छठवें और आखिरी सीजन में उनके महा-मशहूर किरदार फ्रैंक अंडरवुड को एकाएक खत्म कर रॉबिन राइट को सीरीज की लीड एक्ट्रेस बनाया था.

केविन स्पेसी
केविन स्पेसी

इसके अलावा स्पेसी की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘ऑल द मनी इन द वर्ल्ड’ की शूटिंग पूरी होने के बावजूद उन्हें फिल्म से हटाकर क्रिस्टोफर प्लमर को लाया गया था, और उनके हिस्से के सीन दोबारा शूट करने के बाद ही फिल्म रिलीज की गई थी (आगे चलकर क्रिस्टोफर प्लमर इस भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-कलाकार के ऑस्कर्स के लिए नॉमिनेट भी हुए). यही नहीं, जब उनकी ‘छोटी’ भूमिका वाली ‘बिलेनियर बॉयज क्लब’ अगस्त 2018 में रिलीज हुई तो न सिर्फ बुरी तरह फ्लॉप रही बल्कि सारे अमेरिका के थियेटरों को मिलाकर इस फिल्म ने पहले दिन केवल 126 डॉलर का कारोबार किया! अमेरिकी समाज की तरह अगर हिंदुस्तानी दर्शक भी दागदार फिल्म स्टारों और निर्देशकों का बॉयकाट करना शुरू कर दें, तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सूरत बदलते देर नहीं लगेगी.

‘द डिजास्टर आर्टिस्ट’ के लिए प्रतिष्ठित गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड जीतने के तुरंत बाद जनवरी 2018 में कई महिलाओं ने ‘टाइम्स अप’ मूवमेंट के समर्थक व बेहद मशहूर अभिनेता जेम्स फ्रेंको पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. कुछ वक्त बाद ही वेनिटी फेयर मैगजीन ने अपने हॉलीवुड विशेषांक के कवर पर से – जिसमें टॉम हैंक्स, ओफ्रा विनफ्रे जैसे कई हॉलीवुड सेलिब्रिटी मौजूद थे - फ्रेंको की फोटो को ‘फोटोशॉप’ करके हटा दिया. बेस्ट एक्टर का गोल्डन ग्लोब जीतने के बावजूद आने वाले ऑस्कर पुरस्कारों के लिए बेस्ट एक्टर के नॉमिनेशन में से उनका नाम गायब रहा और वे ऑस्कर अवॉर्ड फंक्शन में भी नजर नहीं आए. एचबीओ पर प्रसारित होने वाले पॉर्न इंडस्ट्री आधारित उनके बेहद प्रशंसित शो ‘द ड्यूश’ के हाल ही में प्रसारित होना शुरू हुए दूसरे सीजन में उनकी दोहरी मुख्य भूमिका को किनारे किया गया और शो की कमान महिलाओं के हाथों में सौंपी गई. महिला निर्देशकों से लेकर शो की कहानी के केंद्र तक में महिला कलाकार आ गईं, लेकिन फिर भी फ्रेंको को पूरी तरह बाहर का रास्ता न दिखाने पर एचबीओ की आलोचना हुई.

हॉलीवुड के चर्चित निर्देशक जेम्स फ्रेंको पर इस साल की शुरुआत में यौन-उत्पीड़न के आरोप लगे थे
हॉलीवुड के चर्चित निर्देशक जेम्स फ्रेंको पर इस साल की शुरुआत में यौन-उत्पीड़न के आरोप लगे थे

एमेजॉन की बहुचर्चित सीरीज ‘ट्रांसपेरेंट’ में ट्रांसजेंडर की मुख्य भूमिका बेहतरीन अंदाज में निभाने वाले वयोवृद्ध पुरुष कलाकार जेफ्री टेम्बोर को भी दो ट्रांसजेंडरों के साथ उत्पीड़न करने के आरोपों के चलते उनके भरोसे चलने वाले शो से ही बाहर कर दिया गया. नवम्बर 2017 में दिग्गज स्टेंड-अप कॉमेडियन लुइस सी.के. पर कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न व उनके सामने हस्तमैथुन करने के आरोप लगाए जिसे उनके द्वारा अगले दिन स्वीकार करने के बाद एफएक्स नेटवर्क और नेटफ्लिक्स ने उनके साथ वाले कई शो रद्द कर दिए. एचबीओ ने भी अपने नेटवर्क पर पहले से मौजूद उनके कार्यक्रम हटा लिए. अगले 10 महीने तक लुइस सी.के. स्टैंड-अप कॉमेडी करते हुए कहीं नजर नहीं आए और जब अगस्त 2018 में पहली बार स्टेज पर कम-बैक करते हुए आए तो उनकी चौतरफा आलोचना हुई.

सम्मानित अभिनेता मॉर्गन फ्रीमैन पर मई 2018 में प्रकाशित सीएनएन की एक रिपोर्ट में आठ महिलाओं ने उत्पीड़न के आरोप लगाए और तुरंत ही क्रेडिट कार्ड कंपनी वीजा ने अपने विज्ञापनों में उनकी आवाज का उपयोग करना बंद कर दिया. ‘एक्स मैन’ व ‘रश आवर’ फिल्मों से पहचाने जाने वाले ताकतवर निर्माता-निर्देशक ब्रेट रैटनर पर कई महिलाओं व ओलिविया मन, एलन पेज जैसी मशहूर अभिनेत्रियों ने यौन उत्पीड़न तथा अभद्र भाषा के उपयोग के आरोप लगाए जिसको लेकर उनके पुराने पॉर्टनर वॉर्नर ब्रदर्स ने उनसे नाता तोड़ 450 मिलियन डॉलर की डील खत्म कर दी और ‘वंडर वुमन’ का सह-निर्माण करने के बावजूद ‘वंडर वुमन 2’ से उन्हें दूर कर दिया गया. सफल फ्रेंचाइजी ‘रश आवर’ के चौथे भाग को निर्देशित करके कम-बैक करने की उनकी कोशिशें भी अब तक सफल सिद्ध नहीं हुई हैं.

प्रसिद्ध अभिनेता मॉर्गन फ्रीमैन पर इसी साल मई में आठ अभिनेत्रियों ने यौन-उत्पीड़न के आरोप लगाए थे
प्रसिद्ध अभिनेता मॉर्गन फ्रीमैन पर इसी साल मई में आठ अभिनेत्रियों ने यौन-उत्पीड़न के आरोप लगाए थे

क्या बॉलीवुड और बॉलीवुड फिल्मों के दर्शकों को भी इसी तरह का व्यवहार दागदार-विखंडित कलाकारों और उनकी कला के साथ नहीं करना चाहिए? ‘मी टू’ आंदोलन के दबाव और कुछ अपनी भी जागरूकता की वजह से साजिद खान और सुभाष कपूर जैसे निर्देशकों का क्रमश: अक्षय कुमार व आमिर खान द्वारा बॉयकॉट करना प्रशंसनीय कदम तो है, लेकिन क्या यही तत्परता मजबूत छवियों वाले फिल्म सितारों के खिलाफ नहीं दिखाई जानी चाहिए थी? नाना पाटेकर तब तक ‘हॉउसफुल 4’ से अलग नहीं किए गए जब तक उस फिल्म के निर्देशक साजिद खान पर दिल दहला देने वाले आरोप नहीं लगे और नाना भी चपेट में आ गए.

सोना महापात्रा के बाद एक और गायिका ने कैलाश खेर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए लेकिन किसी संगीतकार ने अभी तक नहीं कहा है कि वे कैलाश खेर के साथ भविष्य में काम नहीं करेंगे. संगीतकार अनु मलिक पर सोना महापात्रा के अलावा गायिका श्वेता पंडित ने भी आरोप लगाए हैं लेकिन किसी फिल्मकार ने उन्हें अपनी फिल्मों से प्रतिबंधित करने की बात नहीं कही है. आलोक नाथ पर लगे गंभीर आरोपों के बावजूद इंडस्ट्री के स्थापित नामों ने चुप्पी साध ली और इस चुप्पी ने उन्हें इतना हौसला दिया कि उन्होंने विंता नंदा पर ही मानहानि का मुकदमा कर दिया. इस माहौल में अच्छा ये हुआ कि कई महिला फिल्मकारों ने मिलकर फैसला लिया है कि वे दागदार कलाकारों के साथ काम नहीं करेंगीं और यह साहसिक फैसला चलन बनने के बाद अभूतपूर्व नतीजे सामने ला सकता है.

सोना महापात्रा के बाद एक और गायिका ने पिछले दिनों कैलाश खेर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं
सोना महापात्रा के बाद एक और गायिका ने पिछले दिनों कैलाश खेर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं

बॉलीवुड फिल्मों के हिंदुस्तानी दर्शकों द्वारा इन दागदार कलाकारों के साथ-साथ उनकी कला का बहिष्कार करना भी अहम बदलाव ला सकता है. एक जमाना था जब यौन उत्पीड़न के मामलों को बॉलीवुड फिल्मों का दर्शक भुला देता था, लेकिन देसी ‘मी टू’ मूवमेंट को मिल रहे समर्थन और बाहर आ रहीं हृदय-विदारक आपबीतियों के बाद शायद ही कोई समाज ऐसा होगा जो इनसे विचलित नहीं होगा.

रजत कपूर पर लगे उत्पीड़न के कई आरोपों में से एक तो इतना ज्यादा दिल दहला देने वाला है कि यकीन करना मुश्किल है कि इसी निर्देशक ने ‘आंखों देखी’ (2014) जैसी प्यारी और गहरे अर्थ खुद में समेटने वाली फिल्म बनाई थी. हमेशा से कुशल एक्टर व सेंसिबल निर्देशकों में गिने जाने वाले रजत कपूर ने न सिर्फ ‘मिथ्या’ (2008) के दिलचस्प ट्रीटमेंट से दिल जीता था बल्कि शेक्सपियर के त्रासद प्ले हैमलेट को आलातरीन अंदाज में पागलपन वाली कॉमेडी में सराबोर करके ‘हैमलेट – द क्लाउन प्रिंस’ नामक बेहद शानदार नाटक भी रचा था. लेकिन अब इन सारी बेमिसाल कृतियों की धार बोथरी हो चुकी है और उनकी आने वाली ‘कड़क’ व ‘आरके/आर के’ नामक फिल्मों के प्रति भी सिनेप्रेमियों के दिल में शायद ही उत्सुकता बची है.

विकास बहल की ‘क्वीन’ भी अपने अर्थ खो चुकी है. जिस आजादी की पैरोकार यह फिल्म थी उसी के निर्देशक द्वारा इसके पंख नोंच लिए गए हैं. भले ही सुपरस्टार रितिक रोशन ने बहल को ‘सुपर 30’ से अलग कर अपनी फिल्म बचाने की कोशिश की है, लेकिन क्या कोई पूरी तरह शूट हो चुकी फिल्म अपने निर्देशक की छाप से दूर हो पाई है? और क्या ऐसे दागदार निर्देशक द्वारा रची गई एक प्रेरणादायक फिल्म को थियेटर में देखते वक्त उसके खोखलेपन का एहसास दर्शकों को नहीं होगा?

कयास लगाए जा रहे हैं कि ‘सेक्रेड गेम्स 2’ की टीम में भी कुछ बदलाव हो सकते हैं. ऐसे कयास विकास बहल पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के दौरान सही कदम नहीं उठा पाए फैंटम फिल्म्स के कर्ताधर्ताओं अनुराग कश्यप व विक्रमादित्य मोटवानी के इस सीरीज से बतौर निर्देशक व शो-रनर जुड़े होने की वजह से भी लग रहे हैं, और इसलिए भी कि इसके लेखक वरुण ग्रोवर का नाम भी उत्पीड़कों की सूची में शामिल हो गया है. भले ही इनमें से कोई भी यौन हिंसा का दोषी नहीं है लेकिन नेटफ्लिक्स की सेक्सुअल हेरासमेंट पॉलिसी हमेशा से बेहद सख्त मानी जाती रही है.

हॉलीवुड में ‘मी टू’ मूवमेंट के जोर पकड़ने के बाद जुलाई 2018 में नेटफ्लिक्स ने अपनी सेक्सुअल हेरासमेंट पॉलिसी में कई नए नियम जोड़े थे जो कइयों को अव्यवहारिक भी लगते हैं. नए नियमों के अनुसार नेटफ्लिक्स की फिल्मों व सीरीज के सेट पर कोई किसी को लंबी देर के लिए गले नहीं लगाएगा, बेवजह फोन नम्बर नहीं मांगा जाएगा, डेट पर चलने के लिए केवल एक बार पूछा जा सकता है और कोई भी किसी को पांच सेकेंड से ज्यादा घूर या देख नहीं सकता, वरना ऐसा करना गलत बर्ताव का हिस्सा माना जाएगा. हिंदुस्तानी ‘मी टू’ मूवमेंट के इस दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का हाल देखकर लगता है कि ऐसे ही कुछ सख्त नियम इसकी कार्यप्रणाली का भी हिस्सा होने चाहिए. शायद, बॉलीवुड तभी सुधरेगा!

तब तक न जाने कितनी और मूर्तियां विखंडित होंगी, कितने और श्रद्धालुओं का विश्वास डगमगाएगा.